
बया का गाँव …गाँव की बया !
एक बया ने तिनके- तिनके चुनकर नीड बनाया है,उस पेड़ पर आज अचानक स्मार्ट विकास का साया है।
नदी नाले , तालाब और रोहड और जो वो चरागाह था. गीली मिट्टी, झींगुर के गीत, धान रोपने की मिट्टी का गीलापन।
खेत की मेड़ पर गीली मिट्टी थोपते – चूड़ी भरे हाथ उन पर फंस जाता था अक्सर- धान की रोपाई से पहले.. काटे गए गेहूं का- आधा जला – सड़ा नट्टा ( गेहूं का स्ट्रॉ)।
छोटे छोटे खेत और उन्ही के अनुपात के हल – बैल
पर हमारे सपने छोटे नहीं थे-
रोज सहेज कर रखती माँ और बहन
खेत के किनारे उगे पेड़ों की टहनियां और पत्तियां साल भर के लिए !
तब गांवों में डरावने ठेकेदार, सेठ, मंत्री उनके संत्री और प्रधान….
पीली जेसीबी , बुलडोजर नहीं आते थे-
नहीं आते थे पेड़ काटने वाले कुल्हाड़े ।
पेड़ों के नीचे तब धान की खुशबू- महकती थी..
ऊपर पेड़ पर बया–बुनती थी- जीवन के गीत..
और नीड की हरियाली भरी नीॆव।
तब गाँव थे, लोग थे .
अब लोग हैं और है- पॉश कॉलोनी .
पर गांव नहीं रहे .
गाँव की भावना पेड़ काटने वाले कुल्हाड़े ले गए
बिल्डर के घर
बया ने रुख नहीं किया मुद्दत से
गाँव का ।
जेपी मैठाणी













