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Reading: Uttarakhand horticulture history: सेब और आलू का अतीत बहुत सुनहरा था
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NEWSLIVE24x7 > Blog > Agriculture > Uttarakhand horticulture history: सेब और आलू का अतीत बहुत सुनहरा था
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Uttarakhand horticulture history: सेब और आलू का अतीत बहुत सुनहरा था

Rajesh Pandey
Last updated: August 30, 2025 7:59 pm
Rajesh Pandey
8 months ago
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सांकेतिक चित्र
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कृषि एवं औद्यानिकी विशेषज्ञ डॉ.राजेंद्र कुकसाल। फोटो- विशाल लोधा

Uttarakhand horticulture history: देहरादून, 30 अगस्त, 2025: कृषि एवं औद्यानिकी विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र कुकसाल ने एमएससी करने के बाद 1971 में उद्यान विभाग में सेवाएं शुरू की थीं। आपकी पहली पोस्टिंग उत्तराखंड (उस समय उत्तर प्रदेश) के अल्मोड़ा जिला स्थित चौबटिया गार्डन में हुई थी। लगभग नौ साल आपने चौबटिया गार्डन में शोध एवं अनुसंधान कार्यों में सेवाएं दीं और इसी दौरान पीएचडी की उपाधि हासिल की। लगभग 37 वर्ष की राजकीय सेवा के बाद 2008 में आप सेवानिवृत्त हुए। कई जिलों में जिला उद्यान अधिकारी के पद पर सेवाएं दीं। आपने उत्तराखंड में औद्यानिकी के अतीत और आजकल को बड़े करीब से देखा है। डॉ. कुकसाल ने उत्तराखंड में सेब और आलू का स्वर्णिमकाल देखा है। प्रस्तुत है उनके लेख के प्रमुख अंश…

Contents
सेब की बागवानी का परिचय (Uttarakhand horticulture history)चौबटिया गार्डन और वैज्ञानिक खेतीउद्यान विभाग की स्थापनाआलू का इतिहास

सेब की बागवानी का परिचय (Uttarakhand horticulture history)

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सेब, नाशपाती, आड़ू और खुबानी जैसे फल पारंपरिक नहीं हैं। इनका परिचय और व्यावसायिक खेती का श्रेय ब्रिटिश सरकार को जाता है।

  • कुमाऊं मंडल: 1855 में, हेनरी रैमजे के प्रयासों से नैनीताल के रामगढ़ और अल्मोड़ा जिलों में सेब की बागवानी शुरू हुई।
  • गढ़वाल मंडल: 1859 में, फ्रेडरिक विल्सन ने हर्षिल क्षेत्र (उत्तरकाशी) में टिहरी के राजा से जमीन लीज पर लेकर इंग्लैंड से सेब के पौधे मंगवाए और बागवानी शुरू की।

Also Read: Climate change impact on agriculture: जलवायु परिवर्तन के कृषि पर प्रभाव को कम करने के उपाय बता रहे डॉ. कुकसाल

चौबटिया गार्डन और वैज्ञानिक खेती

उत्तराखंड में फलों की वैज्ञानिक और व्यावसायिक खेती की नींव चौबटिया गार्डन की स्थापना के बाद रखी गई।

  • स्थापना: 1869 में, कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन के नाम से इसकी स्थापना हुई। डब्ल्यू. क्रो इसके पहले सुपरिटेंडेंट बने। उन्होंने यूरोप और जापान से विभिन्न फलों के पौधे मंगवाकर रोपित किए।
  • विकास: 1914 में, यह गार्डन कुमाऊं कमिश्नर के अधीन आया और इसमें अन्य बागानों को भी शामिल किया गया। नॉर्मन गिल को सुपरिटेंडेंट बनाया गया। उनके कार्यकाल को कुमाऊं बागवानी का ‘स्वर्णिम काल’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने फलों के साथ-साथ जड़ी-बूटियों की खेती पर भी काम किया। इस कार्य में रामलाल साह ने एक सहयोगी के रूप में कार्य किया।
  • कुमाऊं गवर्नमेंट गार्डन चौबटिया में गवर्मेंट हाउस गार्डन, कचहरी गार्डन , डिस्प्ले गार्डन नैनीताल तथा डगलस डेल हार्टिकल्चर गार्डन ज्योलिकोट को भी शामिल कर दिया गया।
  • शोध केंद्र: 1932 में, ब्रिटिश शासकों ने चौबटिया में ‘हिल फ्रूट रिसर्च स्टेशन’ (पर्वतीय फल शोध केंद्र) की स्थापना की, ताकि फलों के उत्पादन से जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सके। इस केंद्र का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों में शीतोष्ण फलों के उत्पादन संबंधी ज्ञान- जैसे पौधों को लगाना, पौधों का प्रसारण , मृदा की जानकारी, खाद पानी देने, कटाई छंटाई, कीट व्याधियों से बचाव आदि का निराकरण करना था।

उद्यान विभाग की स्थापना

  • भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने 1953 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए पर्वतीय क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए रानीखेत में ‘फल उपयोग विभाग उत्तर प्रदेश’ की स्थापना की।
  • 1990 में, इसका नाम बदलकर ‘उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग उत्तर प्रदेश’ कर दिया गया।

आलू का इतिहास

आलू का मूल स्थान दक्षिण अमेरिका का पेरू है। वहाँ से यह स्पेन के रास्ते ब्रिटेन और फिर पूरी दुनिया में फैला।

  • भारत में आगमन: गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने 1782-85 के दौरान भारत में आलू की खेती को बढ़ावा दिया।
  • उत्तराखंड में आगमन:
    • 1823 में, मेजर यंग ने सबसे पहले मसूरी, देहरादून में आलू की खेती शुरू की।
    • हेनरी रैमजे ने ब्रिटिश कुमाऊं में इसे लोकप्रिय बनाया।
    • 1864 में, श्रीमती हैरी बर्जर ने यूरोप से आलू के बीज मंगवाकर नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों में रोपे।
    • उत्तराखंड में फलों और आलू की खेती का विकास ब्रिटिश काल में शुरू हुआ और इसने राज्य की अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • डॉ. कुकसाल बताते हैं, उत्तराखंड के काठगोदाम रेलवे स्टेशन से बोगियों में भरकर आलू देश के विभिन्न राज्यों में जाता था। पूरे देश में पहाड़ के आलू की मांग थी।

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ByRajesh Pandey
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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

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