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Reading: Social-Emotional Learning (SEL): सिर्फ एक नया ट्रेंड नहीं, बच्चों को समझदार और सफल बनाता है
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Social-Emotional Learning (SEL): सिर्फ एक नया ट्रेंड नहीं, बच्चों को समझदार और सफल बनाता है

Rajesh Pandey
Last updated: August 9, 2025 3:15 pm
Rajesh Pandey
8 months ago
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Social-Emotional Learning (SEL): आज की तेजी से बदलती दुनिया में, शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं है, बल्कि बच्चों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करना है। यहीं पर सोशल-इमोशनल लर्निंग (SEL) की भूमिका आती है। एसईएल एक ऐसा दृष्टिकोण है जो बच्चों को अपनी भावनाओं को समझने, प्रबंधित करने, और दूसरों के साथ सकारात्मक संबंध बनाने के लिए सशक्त बनाता है। यह वह अदृश्य शक्ति है जो बच्चों को सिर्फ ‘स्मार्ट’ नहीं, बल्कि ‘समझदार’ और ‘सफल’ बनाती है।

Social-Emotional Learning (SEL) के पांच आयाम: जीवन के पांच महत्वपूर्ण सबक

एसईएल पांच प्रमुख आयामों पर आधारित है, जो एक छात्र के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। हर आयाम एक अलग और महत्वपूर्ण जीवन कौशल सिखाता है।

1. आत्म-जागरूकता (Self-Awareness)

यह एसईएल की पहली सीढ़ी है। आत्म-जागरूकता का मतलब है अपनी भावनाओं, विचारों, शक्तियों और कमजोरियों को पहचानना। जब हम यह समझ जाते हैं कि हम कैसा महसूस कर रहे हैं और क्यों, तो हम उस पर बेहतर प्रतिक्रिया दे पाते हैं।

कक्षा में, एक छात्र को यह एहसास हो सकता है कि उसे गणित की समस्याएं हल करने में मजा आता है और वह इसमें अच्छा है, लेकिन उसे कविता लिखने में ज़्यादा मुश्किल होती है।

  • ताकत को पहचानना: “मुझे गणित के सवाल हल करना पसंद है और मैं इसे जल्दी समझ जाता हूं।”
  • कमज़ोरी को स्वीकार करना: “मुझे कविता लिखने में दिक्कत आती है, लेकिन मैं इसमें बेहतर होने की कोशिश कर सकता हूं।”

इस तरह, वह छात्र अपनी ताकत पर काम करके और बेहतर बन सकता है, और साथ ही अपनी कमजोरियों को स्वीकार करके उन्हें सुधारने की कोशिश कर सकता है। इससे वह खुद को ज्यादा अच्छे से समझ पाता है।

2. आत्म-प्रबंधन (Self-Management) 

यह आयाम हमें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने और तनाव से निपटने की क्षमता देता है। यह हमें छोटे-छोटे लक्ष्यों को निर्धारित करने और उन्हें पाने के लिए प्रेरित रहने में मदद करता है।

  • क्लासरूम में: जब कोई बच्चा गुस्सा होता है, तो शिक्षक उसे “तीन गहरी साँसें लेने” या कुछ मिनटों के लिए शांत जगह पर बैठने जैसी तकनीकें सिखा सकते हैं।
  • फायदा: इससे बच्चे बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने के बजाय, शांत होकर बेहतर निर्णय लेना सीखते हैं। यह धैर्य और आत्म-नियंत्रण जैसे गुणों को विकसित करता है।

3. सामाजिक जागरूकता (Social Awareness)

इसका मतलब है, दूसरों की भावनाओं को समझना और उनके प्रति सहानुभूति रखना। यह हमें विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के लोगों का सम्मान करना सिखाता है।

  • क्लासरूम में: शिक्षक छात्रों से पूछ सकते हैं, “अगर आपका दोस्त दुखी है, तो आप कैसा महसूस करेंगे?”
  • फायदा: यह बच्चों में दूसरों के प्रति सम्मान और संवेदनशील होने की भावना जगाता है, जिससे वे बेहतर नागरिक बनते हैं।

4. संबंध कौशल (Relationship Skills)

यह दूसरों के साथ स्वस्थ और सकारात्मक संबंध बनाने का हुनर है। इसमें प्रभावी ढंग से संवाद करना, सहयोग करना, और किसी भी तरह के संघर्ष को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाना शामिल है।

  • क्लासरूम में: शिक्षक ग्रुप प्रोजेक्ट्स के दौरान छात्रों को एक-दूसरे की बात सुनने और सम्मानपूर्वक अपनी बात रखने के नियम सिखा सकते हैं।
  • फायदा: यह टीम वर्क, सहयोग और नेतृत्व जैसे महत्वपूर्ण कौशल विकसित करता है, जो आज के कार्यस्थल में बहुत ज़रूरी हैं।

5. जिम्मेदार निर्णय लेना (Responsible Decision-Making) 

यह हमें अपने कार्यों के परिणामों पर विचार करने और नैतिक निर्णय लेने की क्षमता देता है। यह हमें सुरक्षित और सही विकल्प चुनने के लिए प्रोत्साहित करता है।

  • क्लासरूम में: शिक्षक छात्रों से पूछ सकते हैं, “अगर आपको अपने दोस्त के साथ होमवर्क करना है, लेकिन वह आपसे नकल करने को कहता है, तो आप क्या करेंगे?”
  • फायदा: यह बच्चों को एक समस्या-समाधान करने वाले की तरह सोचने और अपने जीवन की जिम्मेदारी लेने में मदद करता है।

क्यों एसईएल सिर्फ एक ‘अच्छा विचार’ नहीं, बल्कि ‘जरूरत’ है

आज, जब ए.आई. और टेक्नोलॉजी हर काम को आसान बना रही हैं, तब भी ये मानवीय कौशल – दया, सहानुभूति, टीम वर्क और भावनात्मक बुद्धिमत्ता – सबसे महत्वपूर्ण हैं। एसईएल इन कौशलों को विकसित करने की सबसे अच्छी रणनीति है।

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया (UBC) के एक शोध ने इस बात पर जोर दिया है कि जिन स्कूलों में एसईएल कार्यक्रम लागू किए गए, वहां के छात्रों में तनाव और चिंता का स्तर कम हुआ। उन्होंने न केवल बेहतर ग्रेड पाए, बल्कि उनका आत्मविश्वास और सामाजिक जुड़ाव भी बढ़ा। एसईएल के माध्यम से, हम न केवल बेहतर छात्र, बल्कि बेहतर नागरिक भी तैयार कर सकते हैं जो एक स्वस्थ और खुशहाल समाज का निर्माण कर सकें। यह हमारे बच्चों के भविष्य के लिए सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण निवेश है।

बेहतर होता है अकादमिक प्रदर्शन

अगर हम एक इमारत बना रहे हैं, तो हमें न केवल ईंटों की, बल्कि एक मजबूत नींव की भी ज़रूरत होती है। एसईएल बच्चों के जीवन की यही नींव है। कई शोधों से यह साबित हुआ है कि जो बच्चे सामाजिक और भावनात्मक रूप से मजबूत होते हैं, उनका अकादमिक प्रदर्शन बेहतर होता है, वे कम तनाव में रहते हैं और जीवन में अधिक सफल होते हैं।

आइए, इसे दो उदाहरणों से समझते हैं जो हर क्लासरूम में मिल सकती हैं:

1: रोहित की गणित की मुश्किल

रोहित, एक होशियार बच्चा, अचानक गणित में पिछड़ने लगा। वह कक्षा में चुप रहने लगा और टेस्ट के नाम से ही घबराता था।

  • पुराना तरीका: शिक्षक ने उसे बस और ज्यादा अभ्यास करने को कहा। रोहित ने कोशिश की, लेकिन डर और निराशा के कारण वह और भी पीछे छूटता चला गया।
  • एसईएल का तरीका: एक समझदार शिक्षक ने रोहित के व्यवहार को पहचाना। उन्होंने उससे अकेले में बात की और जाना कि उसे गणित का डर सता रहा है। शिक्षक ने उसे बताया कि डर एक सामान्य भावना है। उन्होंने उसे शांत रहने के लिए कुछ आसान साँस लेने के व्यायाम (breathing exercises) सिखाए। फिर, उन्होंने उसे एक ऐसे छात्र के साथ बैठाया, जो गणित में अच्छा था। धीरे-धीरे, रोहित ने न सिर्फ गणित के सवालों को हल करना सीखा, बल्कि अपनी भावनाओं को भी काबू करना सीख लिया। उसका डर दूर हुआ और उसका आत्मविश्वास लौट आया।

निष्कर्ष: एसईएल ने रोहित को सिर्फ गणित नहीं सिखाया, बल्कि उसे यह भी सिखाया कि वह अपनी भावनाओं को कैसे प्रबंधित कर सकता है।

2: राजू का अकेलापन

राजू एक बहुत ही शांत और शर्मीला छात्रा था। वह हमेशा कोने में बैठता और कभी किसी से बात नहीं करता था। वह अपने विचारों को व्यक्त करने से डरता था।

  • पुराना तरीका: शिक्षक ने इसे राजू का स्वभाव मानकर अनदेखा कर दिया। वह अकेला ही रहा और उसकी छुपी हुई प्रतिभा कभी सामने नहीं आ पाई।
  • एसईएल का तरीका: शिक्षक ने एक ग्रुप प्रोजेक्ट शुरू किया। उन्होंने जानबूझकर राजू को ऐसे समूह में रखा जहां कुछ मिलनसार बच्चे थे। उन्होंने समूह को सिखाया कि हर सदस्य की बात सुनना कितना जरूरी है। जब राजू ने पहली बार अपनी राय दी, तो शिक्षक ने उसकी बहुत सराहना की। इस छोटे से प्रोत्साहन ने राजू को अपनी झिझक तोड़ने का साहस दिया।

निष्कर्ष: एसईएल ने राजू को यह एहसास दिलाया कि उसकी राय भी महत्वपूर्ण है। उसने न केवल दूसरों से जुड़ना सीखा, बल्कि उसकी छिपी हुई प्रतिभा भी बाहर आई और वह आत्मविश्वास से भरा एक छात्र बन गया।

सैद्धांतिक रूप से, एसईएल बहुत अच्छा लगता है, लेकिन असल क्लासरूम में इसे लागू करना शिक्षकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। सिलेबस के भारी बोझ के कारण शिक्षक अक्सर ऐसा नहीं कर पाते।

क्यों एसईएल पूरी तरह से लागू नहीं हो पाता

यहाँ कुछ मुख्य कारण दिए गए हैं कि क्यों शिक्षक एसईएल को पूरी तरह से लागू नहीं कर पाते हैं:

1. समय की कमी और सिलेबस का दबाव

शिक्षकों को एक निश्चित समय सीमा में पूरा सिलेबस खत्म करना होता है, ताकि बच्चे परीक्षा के लिए तैयार हो सकें। ऐसे में, एसईएल जैसी गतिविधियों के लिए अलग से समय निकालना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। उन्हें लगता है कि एसईएल को शामिल करने से उनका शैक्षणिक समय बर्बाद हो जाएगा।

2. एसईएल को लेकर प्रशिक्षण की कमी

कई अध्ययनों से पता चला है कि ज़्यादातर शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों में एसईएल पर बहुत कम या बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया जाता। शिक्षकों को यह नहीं सिखाया जाता कि एसईएल को अपने रोजमर्रा के शिक्षण में कैसे शामिल किया जाए। इसलिए, वे इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए खुद को तैयार महसूस नहीं करते।

3. समर्थन और संसाधनों का अभाव

शिक्षकों को अक्सर स्कूलों से पर्याप्त समर्थन और संसाधन नहीं मिलते। उन्हें एसईएल से जुड़ी वर्कशॉप, गाइड या किसी पेशेवर की मदद नहीं मिल पाती, जो उन्हें इस काम में मदद कर सके। इसकी वजह से, वे अकेले ही यह बोझ उठाने की कोशिश करते हैं और तनाव महसूस करते हैं।

4. खुद शिक्षकों का तनाव

शिक्षण एक बहुत ही तनावपूर्ण पेशा है। शिक्षकों को भी अपनी निजी और पेशेवर जिंदगी में कई तरह के तनावों का सामना करना पड़ता है। जब कोई शिक्षक खुद ही मानसिक रूप से थका हुआ और तनावग्रस्त होता है, तो वह छात्रों की भावनात्मक जरूरतों को पूरी तरह से नहीं समझ पाता और न ही उनका मार्गदर्शन कर पाता है।

समाधान क्या है?

अच्छी खबर यह है कि एसईएल को एक अलग विषय के रूप में पढ़ाने की जरूरत नहीं है। इसे मौजूदा सिलेबस में ही शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, विज्ञान की कक्षा में एक प्रोजेक्ट करते समय शिक्षक छात्रों को टीम वर्क और सहयोग के बारे में बता सकते हैं। इसी तरह, साहित्य पढ़ाते समय, वे कहानी के पात्रों की भावनाओं पर चर्चा करके सहानुभूति और सामाजिक जागरूकता विकसित कर सकते हैं। इस तरह, बिना अतिरिक्त समय निकाले भी शिक्षक धीरे-धीरे और प्रभावी तरीके से एसईएल को अपनी शिक्षण पद्धति का हिस्सा बना सकते हैं।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

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