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तेजपत्ताःएक आदर्श मसाला

  • डॉ. राजेंद्र डोभाल
  • महानिदेशक -UCOST उत्तराखंड

उत्तराखण्ड को हर्बल राज्य की संज्ञा भी दी जाती है क्योंकि राज्य में उपलब्ध पौधे विभिन्न उपयोगों में लाये जाते है। इनमें से एक तेज पत्ता या दालचीनी का पौधा भी है जो प्रायः मसालों की श्रेणी में रखा जाता है तथा भारतीय रसाई में तो इसे एक अलग ही स्थान प्राप्त है। अपने उष्ण प्रकृति के देखते हुये दालचीनी की छाल तथा पत्ते को गर्म मसालों के रूप में प्रयोग किया जाता है।

खास बात यह है कि आज हम एक ऐसे पौधे की बात कर रहे हैं जिसका उत्तराखण्ड राज्य को जियोग्राफिकल इंडिकेटर (GI) भी प्राप्त है। हाल ही में 31 मई, 2016 को तेज पत्ता का GIG एक्ट 1999 के अन्तर्गत रजिस्टर किया गया जो कि उत्तराखण्ड में तेज पत्ता की गुणवत्ता, पर्याप्त उत्पादन तथा अन्य महत्वपूर्ण विशेषताओं का सूचक है।विश्व भर में दालचीनी की कुल 350 प्रजातियों में से लगभग 20 प्रजातियां भारत में पायी जाती हैं। दालचीनी का वैज्ञानिक नाम सिनामोमम तमाला (Cinnamomum tamala L.) जो कि लाउरेसी (Lauraceae) जाति का पौधा है। एशिया मूल का यह पौधा उत्तर, मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका, एशिया, ओसीमिया, आस्ट्रेलिया आदि स्थानों पर भी पाया जाता है। समुद्र तल से 900-2000 मीटर तक की ऊँचाई में पाये जाने वाला

यह पौधा भारत के हिमालयी राज्यों, विशेषकर उत्तराखण्ड के जंगलों में बहुतायत मात्रा में स्वतः ही उग जाता है तथा उत्तराखण्ड के जंगलों से एकत्रित कर बाजारों में उपलब्ध कराया जाता है।

विश्व विख्यात दालचीनी का आयुर्वेद एवं अन्य भारतीय ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन मिलता है। लगभग 2000 ई0पूर्व के इतिहास में इसको मसालों तथा औषधीय के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। दालचीनी की पत्तियों को हिन्दी तथा नेपाली में तेज पत्ता, आसामी में तेजपात, मराठी में तामलपत्रा तथा सामान्यतः इसे इण्डियन बे लीफ के नाम से भी जाना जाता है। अपनी एक अलग सुंगध की वजह से इसकी पत्तियों तथा छाल का भारतीय मसालों में प्रयोग किया जाता है जो कि विश्व विख्यात है। सिनामल्डिहाइड तथा यूजिनौल रासायनिक अवयव के कारण इसकी एक अलग सुगंध होती है।

आयुर्वेद में दालचीनी के पौधे का उपयोग पैरालाइटिक, बवासीर, उल्टी, एनोरेक्सिया तथा साइनोसाईटिस आदि में बताया गया है। इसकी पत्तियों को स्केबीज, कफ, हीमोप्टाईटिस, गठिया, एनीमिया, त्वचा रोड तथा हृदय विकार में प्रयोग किया जा सकता है। अनेकों फार्माकोलॉजिकल अध्ययन में दालचीनी के एक्सट्रेक्ट को हाइपोग्लाइसीमिक में प्रभावी बताया गया है।

तेजपत्ता एक आदर्श मसाला

विभिन्न शोध पत्रों में प्रकाशित दालचीनी के पौधे की छाल तथा पत्तियों पर हुये अलग-अलग शोध में इसे विभिन्न औषधीय में प्रयोग में लाया जा सकता है। पौधे में मुख्य रूप से फैलोड्रेन, यूजिनॉल, लीनालूल, एल्फा व बीटा पाइनीन, साइमीन, सिनामल्डिहाइड, लीमोनीन, फीनाइलप्रोपानॉइड आदि औषधीय रसायन होने की वजह से अच्छा प्रयोग है। इसके अलावा पौधे को पोष्टिक तथा प्राकृतिक तत्वों का स्रोत व अच्छा विकल्प भी माना जाता है।

इसमें कार्बोहाईड्रेड 74.97 ग्राम, प्रोटीन 7.61 ग्राम, फाइवर 26.3 ग्राम, फोलेट 180 माइक्रो ग्राम, नियासीन 2.0 मि0ग्रा0, विटामिन ए 6185 आई0यू0, विटामिन सी 46.5 मिग्रा0, सोडियम 23 मिग्रा0, पोटेशियम 529 मिग्रा0, कैल्शियम 834 मिग्रा, आयरन 43 मिग्रा, मैग्नीशियम 120 मिग्रा0, मैग्नीज 8.16 मिग्रा0, फास्फोरस 113 मिग्रा0, सेलेनियम 2.2 माइक्रोग्राम तथा जिंक 3.70 मि0ग्रा0 प्रति 100 ग्राम में पाये जाते हैं।

दालचीनी का भारतीय बाजार में मसालों के अलावा फार्मा, फरफ्यूमरी, फूड, ऑयल तथा कॉस्मेटिक आदि उद्योगों में काफी डिमाण्ड है। दालचीनी की छाल तथा पत्तियों के अलावा इसके इसेंसियल ऑयल की पूरे विश्व में अच्छी मांग है, जो कि लगभग 120 से 150 टन प्रति वर्ष है जिसकी पूर्ति श्रीलंका द्वारा सबसे अधिक की जाती है।

श्रीलंका द्वारा 120 टन प्रति वर्ष दालचीनी के ऑयल का निर्यात किया जाता है जिसकी इसकी अच्छी खासी कीमत भी प्राप्त होती है। आयुर्वेद औषधि बाजार में इससे निर्मित विभिन्न उत्पाद उपलब्ध हैं जैस चन्द्रप्रभा वटी, दसमूलारिस्ट, कच्नार गुगुल, योगराज गुगुल आदि। विश्व के यूरोपियन देशो में इसके ऑयल की मांग काफी अधिक है, मुख्य रूप में फ्रांस में, जबकि वर्तमान में यू0एस0ए0 सबसे ज्यादा आयात करने वाला देश है।

उपरोक्त सभी विशेषताओं के साथ-साथ तेज पत्ता का GI होने के कारण प्रदेश के लिये एक अच्छा व्यवसायिक विकल्प है। GI होने से पहले तेज पत्ते की कीमत लगभग 60-65 रूपये प्रति किलोग्राम थी जो इसके बाद लगभग 150 से 200 रूपये प्रति किलो तक होने की संभावना है।

फिलहाल प्रदेश में 10,000 कास्तकार तेज पत्ते के उत्पादन से जुड़े है जो लगभग 1,000 मीट्रिक टन का प्रतिवर्ष उत्पादन करने हैं। विश्व में तेज पत्ते की अधिक मांग को देखते हुये प्रदेश में उच्च गुणवत्तायुक्त तेज पत्ते का उत्पादन कर देश-दुनिया में स्थान बनाने के साथ राज्य की आर्थिकी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पलायान को रोकने का अच्छा विकल्प बनाया जा सकता है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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