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घोंघे और कछुए की दौड़

Rajesh Pandey
Last updated: July 8, 2021 9:44 pm
Rajesh Pandey
6 years ago
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राजेश पांडेय

घोंघे और कछुए में बहस हो गई। घोंघा कह रहा था कि कछुआ जी में तुमसे तेज दौड़ता हूं। कछुआ बोला, मुझे तुम्हारी बात पर हंसी आ रही है। पूरा जंगल जानता है कि मैं तुमसे तेज दौड़ता हूं। यकीन नहीं है तो दौड़ लगाकर देख लो। घोंघे ने कहा, देखो कछुआ जी, घमंड की बात मत करो। मुझे तुम्हारी चुनौती स्वीकार है।

जीत हार का फैसला कौन करेगा, इसके लिए जंगल के ही किसी जीव को चुनना था। घोंघे ने कहा, यह बात तो माननी होगी कि हम पूरे जंगल में सबसे धीमा चलते हैं। हमारी दौड़ के फैसला के लिए चीता या हिरन को तो नहीं बुला सकते। चीटी को बुला लेते हैं, वो भी हमारी तरह ही दौड़ती है।

कछुए ने कहा, बार-बार मत हंसाओ दोस्त। चीटी मेरे मुकाबले की नहीं है। वो भी तुम्हारी तरह ही रेंगती है। चलो, तुम्हारी बात मान लेता हूं। कल रविवार है। चीटी को बुला लो, फैसला हो ही जाए। हां, याद रखना बड़ा वाला मैदान। वो छोटा मैदान, मेरे हिसाब से छोटा ही है। तुम्हारा क्या है, तुम तो किसी पेड़ के चक्कर लगाने में ही पूरा दिन लगा देते हो।

घोंघा बोला, चीटी को बताना होगा कि कल जंगल के बड़े मैदान में पहुंच जाए। कछुआ बोला, यही कहीं होगी चीटी। पूरे जंगल में चीटियां ही चीटियां हैं। लो, मैंने नाम लिया और चीटी दिख गई। घोंघे ने पूछा, कहां है चीटी। कछुआ बोला, तुम्हें नहीं दिखाई देगी। बहुत छोटी है। पेड़ के खोखल से नीचे उतर रही है।

Contents
राजेश पांडेयघोंघे और कछुए में बहस हो गई। घोंघा कह रहा था कि कछुआ जी में तुमसे तेज दौड़ता हूं। कछुआ बोला, मुझे तुम्हारी बात पर हंसी आ रही है। पूरा जंगल जानता है कि मैं तुमसे तेज दौड़ता हूं। यकीन नहीं है तो दौड़ लगाकर देख लो। घोंघे ने कहा, देखो कछुआ जी, घमंड की बात मत करो। मुझे तुम्हारी चुनौती स्वीकार है।जीत हार का फैसला कौन करेगा, इसके लिए जंगल के ही किसी जीव को चुनना था। घोंघे ने कहा, यह बात तो माननी होगी कि हम पूरे जंगल में सबसे धीमा चलते हैं। हमारी दौड़ के फैसला के लिए चीता या हिरन को तो नहीं बुला सकते। चीटी को बुला लेते हैं, वो भी हमारी तरह ही दौड़ती है।कछुए ने कहा, बार-बार मत हंसाओ दोस्त। चीटी मेरे मुकाबले की नहीं है। वो भी तुम्हारी तरह ही रेंगती है। चलो, तुम्हारी बात मान लेता हूं। कल रविवार है। चीटी को बुला लो, फैसला हो ही जाए। हां, याद रखना बड़ा वाला मैदान। वो छोटा मैदान, मेरे हिसाब से छोटा ही है। तुम्हारा क्या है, तुम तो किसी पेड़ के चक्कर लगाने में ही पूरा दिन लगा देते हो।घोंघा बोला, चीटी को बताना होगा कि कल जंगल के बड़े मैदान में पहुंच जाए। कछुआ बोला, यही कहीं होगी चीटी। पूरे जंगल में चीटियां ही चीटियां हैं। लो, मैंने नाम लिया और चीटी दिख गई। घोंघे ने पूछा, कहां है चीटी। कछुआ बोला, तुम्हें नहीं दिखाई देगी। बहुत छोटी है। पेड़ के खोखल से नीचे उतर रही है।घोंघे ने कहा, ठीक है भाई, तुम ही कह दो। कछुए ने आवाज लगाई। चीटी जी, कहां हो आजकल। आप दिखती नहीं। चीटी ने कहा, कछुआ भैया, मैं तो यही हूं। क्यों याद कर रहे हो। कछुआ बोला, घोंघे को तुम जानती ही हो, बहुत बहस करता है। कह रहा था कि वो मुझसे तेज दौड़ता है। तुम ही बताओ, दौड़ना शब्द उसके मुंह से अच्छा लगता है।चीटी ने कहा,ऐसा नहीं कहते कछुआ भैया। आगे बोलो, क्या कह रहे हो। कछुए ने कहा, जंगल का बड़ा मैदान देखा है। चीटी बोली, हां देखा है, बहुत दूर है यहां से। कछुआ बोला, मुझे तो बिल्कुल भी दूर नहीं लगता। कल सुबह, वहां घोंघा और मेरे बीच दौड़ होगी। जीतना तो मैंने ही है, पर घोंघे को तसल्ली हो जाएगी।  चीटी ने कहा, ठीक है, मैं कल सुबह वहीं मिलूंगी।कछुआ बोला, ठीक है कल मिलते हैं। हां, घोंघा और चीटी जी, तुम दोनों अभी से मैदान की ओर चलना शुरू कर दो। मैं तो वहां कुछ देर में ही पहुंच जाऊंगा। पेड़ पर बैठे बंदरों ने घोंघे और कछुए की बातें सुन लीं। बंदरों ने आपस में बात करते हुए कहा, बड़ा मजा आएगा यह दौड़ देखने में। बंदरों ने कुछ ही देर में पूरे जंगल से कह दिया कि कल सुबह बड़े मैदान में घोंघे और कछुए की दौड़ होनी है।घोंघे और चीटी ने अंधेरा होते ही और कछुए ने आधीरात के बाद बड़े मैदान की ओर चलना शुरू कर दिया। सुबह हो गई, पर तीनों मैदान में नहीं पहुंच पाए। दौड़ देखने के लिए बड़े मैदान के चारों ओर बड़ी संख्या में जानवर इकट्ठा हो गए। आधे दिन तक चीटी, घोंघा और कछुआ मैदान तक नहीं पहुंच पाए।भालू ने सभी को समझाया, हम सब उनके इंतजार में अपना समय खराब कर रहे हैं। मुझे तो नहीं लगता कि वो यहां पहुंच पाएंगे। उधर, चल चलकर थक चुकी चीटी ने घोंघे से कहा, तुम दोनों के चक्कर में मेरा समय बर्बाद हो रहा है। मैं तो वापस जा रही हूं अपने घर।घोंघा बोला, मुझसे अब और नहीं चला जाता। वैसे भी दोपहर हो गई है। तुम्हें कछुआ दिखाई दे तो कह देना कि फिर कर लेना मुकाबला। वापस लौटते समय चीटी को कछुआ मिल गया। कछुआ बोला, मैं बहुत थक गया हूं। घोंघा मिले तो कह देना, अभी यह दौड़ नहीं हो सकती। बाद में समय मिला तो हो जाएगा मुकाबला।

घोंघे ने कहा, ठीक है भाई, तुम ही कह दो। कछुए ने आवाज लगाई। चीटी जी, कहां हो आजकल। आप दिखती नहीं। चीटी ने कहा, कछुआ भैया, मैं तो यही हूं। क्यों याद कर रहे हो। कछुआ बोला, घोंघे को तुम जानती ही हो, बहुत बहस करता है। कह रहा था कि वो मुझसे तेज दौड़ता है। तुम ही बताओ, दौड़ना शब्द उसके मुंह से अच्छा लगता है।

चीटी ने कहा,ऐसा नहीं कहते कछुआ भैया। आगे बोलो, क्या कह रहे हो। कछुए ने कहा, जंगल का बड़ा मैदान देखा है। चीटी बोली, हां देखा है, बहुत दूर है यहां से। कछुआ बोला, मुझे तो बिल्कुल भी दूर नहीं लगता। कल सुबह, वहां घोंघा और मेरे बीच दौड़ होगी। जीतना तो मैंने ही है, पर घोंघे को तसल्ली हो जाएगी।  चीटी ने कहा, ठीक है, मैं कल सुबह वहीं मिलूंगी।

कछुआ बोला, ठीक है कल मिलते हैं। हां, घोंघा और चीटी जी, तुम दोनों अभी से मैदान की ओर चलना शुरू कर दो। मैं तो वहां कुछ देर में ही पहुंच जाऊंगा। पेड़ पर बैठे बंदरों ने घोंघे और कछुए की बातें सुन लीं। बंदरों ने आपस में बात करते हुए कहा, बड़ा मजा आएगा यह दौड़ देखने में। बंदरों ने कुछ ही देर में पूरे जंगल से कह दिया कि कल सुबह बड़े मैदान में घोंघे और कछुए की दौड़ होनी है।

घोंघे और चीटी ने अंधेरा होते ही और कछुए ने आधीरात के बाद बड़े मैदान की ओर चलना शुरू कर दिया। सुबह हो गई, पर तीनों मैदान में नहीं पहुंच पाए। दौड़ देखने के लिए बड़े मैदान के चारों ओर बड़ी संख्या में जानवर इकट्ठा हो गए। आधे दिन तक चीटी, घोंघा और कछुआ मैदान तक नहीं पहुंच पाए।

भालू ने सभी को समझाया, हम सब उनके इंतजार में अपना समय खराब कर रहे हैं। मुझे तो नहीं लगता कि वो यहां पहुंच पाएंगे। उधर, चल चलकर थक चुकी चीटी ने घोंघे से कहा, तुम दोनों के चक्कर में मेरा समय बर्बाद हो रहा है। मैं तो वापस जा रही हूं अपने घर।

घोंघा बोला, मुझसे अब और नहीं चला जाता। वैसे भी दोपहर हो गई है। तुम्हें कछुआ दिखाई दे तो कह देना कि फिर कर लेना मुकाबला। वापस लौटते समय चीटी को कछुआ मिल गया। कछुआ बोला, मैं बहुत थक गया हूं। घोंघा मिले तो कह देना, अभी यह दौड़ नहीं हो सकती। बाद में समय मिला तो हो जाएगा मुकाबला।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

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