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पशुपालन करते हैं तो आपके बड़े काम की हैं ये बातें

20 साल से डेयरी फार्मिंग से जुड़े शरद शर्मा ने दीं महत्वपूर्ण जानकारियां

उत्तराखंड के देहरादून जिला के नकरौंदा स्थित जीरो प्वाइंट पर लगभग 20 वर्ष से डेयरी फार्मिंग ( Dairy Farming) से जुड़े शरद शर्मा (Sharad Sharma) बताते हैं, डेयर फार्मिंग में तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं- काफ मैनेजमेंट (Calf Management) , फीड मैनेजमेंट (Feed Management), हेल्थ मैनेजमेंट (Health Management)। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश…

काफ मैनेजमेंट यानी बछिया को तैयार करने का प्रबंधन। दूध देने वाली गाय और बछिया दोनों पर ही ध्यान देना आवश्यक है। बछिया को तैयार करने की तैयार गाय के गर्भाधान से ही शुरू हो जाती है। गाय तंदुरुस्त होगी,  बच्चा भी स्वस्थ होगा। बछिया को समय-समय पर वैक्सीनेशन, संतुलित आहार, उसके मूवमेंट, समय-समय पर हेल्थ चेकअप पर फोकस किया जाना चाहिए।

बताते हैं, बछिया को जन्म देने से दो माह पहले ही गाय से दूध लेना बंद कर देते हैं। गाय को शुष्क अवधि (Dry Period) में लाने के लिए आहार में परिवर्तन करना होता है। ऐसा इसलिए करते हैं, दूध के माध्यम से जो कैल्शियम हमें मिलता है, यदि वो गाय के शरीर में ही रहेगा तो उसके गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए लाभकारक होगा। बच्चे के जन्म के बाद गाय से हमें अधिक मात्रा में और गुणवत्तापरक दूध मिलेगा।

पशुओं के गर्भाधान का पता लगने में तीन माह तक का समय लग जाता है। कई बार ऐसा भी होता है इंतजार के बाद मालूम पड़ता है कि पशु गर्भाधान नहीं हुआ। तकनीकी बदल रही है, रिसर्च हो रही हैं, पर पशुओं के गर्भाधान का पता तीन माह बाद ही लगता है। इसमें कोई डेवलपमेंट नहीं हुआ। कोई तो ऐसा तरीका विकसित होना चाहिए, जिससे मिल्क से या यूरिन से जानकारी मिल जाए। ऐसे में डेयरियों को नुकसान झेलना पड़ता है। पैरावेट्स भी तीन माह बाद ही मैन्युअली चेक करते हैं, तभी गर्भाधान होने या नहीं होने की जानकारी मिल पाती है। यूरोपियन कंट्री में तो डेढ़ माह में कन्फर्म हो जाता है।

खासकर, शहर की डेयरियों में कम जगह में ज्यादा गायों को रखना, उनको टाइट करके बांधना पशुओं के साथ ज्यादती है। जिस तरह से इंसान को फ्री होकर मूव करने के लिए जगह चाहिए। उसी तरह पशुओं को भी। पशुओं को मूवमेंट चाहिए, उनको खुले स्थानों पर रखा जाए। उनके लिए हाउसिंग पर बहुत ज्यादा फोकस होना चाहिए। उनको जहां रखा जाए, वहां ज्यादा स्थान हो, उस हॉल की ऊंचाई अधिक हो, चारों तरफ से खुला हो, हवादार हो, प्राकृतिक रूप से हवा की निकासी हो, उसमें धूप भी आए और गर्मियों में पशुओं को ज्यादा गर्म न लगे, सर्दियों में ठंड से बचाने के उपाय हों।

जगह नहीं होने से पशुओं का मूवमेंट नहीं होगा तो वो भोजन भी नहीं पचा पाएंगे। उनका आहार कम हो जाएगा। वह स्वस्थ नहीं रहेंगे। मिल्क प्रोडक्शन पर असर पड़ेगा।

यह मानना सही नहीं है कि पशु ज्यादा खाएगा तो ज्यादा दूध देगा। पशुओं को संतुलित मात्रा में आहार दिया जाना चाहिए। उनको आहार देने का समय तय होना चाहिए।

सरकार की ओर पशुओं की वैक्सीन की प्रॉपर कोल्ड चैन मैन्टेन होनी चाहिए। परिणाम यह रहता है कि कोल्ड चैन मैन्टेन नहीं होने से मुंहपका एवं खुरपका (Foot and Mouth Diseases- FMD) की वैक्सीन जितना प्रभावकारी होनी चाहिए, वो नहीं हो पाती।

पिछले बैच के लिए सरकार की ओर से FMD की जो वैक्सीन पशुओं के लिए उपलब्ध कराई गई थी, वो उनको लगा दी गईं। पर बाद में पता चला कि जो बैच हम पशुओं को लगा चुके हैं, उसको सरकार ने डिस्कार्ड यानी बिना प्रभाव वाला घोषित कर दिया। जब सरकार स्वयं घोषणा कर दे कि उस वैक्सीन का कोई प्रभाव नहीं होगा तो नया वैक्सीन उपलब्ध कराना भी तो सरकार का ही काम है।

वैक्सीनेशन तो पशुओं की इम्युनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को बढ़ाने के लिए होता है, ताकि उनको मुंहपका एवं खुरपका जैसे रोग न हो सकें। स्थिति यह है कि पिछले वर्ष पशुओं को प्रभावी वैक्सीन नहीं लग पाई, जबकि वैक्सीनेशन समयबद्ध होना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोल्ड चैन मैन्टेन होनी अनिवार्य है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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