
IISWC Dehradun Skill Development Training: वन कर्मियों को आधुनिक संरक्षण तकनीक और आजीविका सुरक्षा का प्रशिक्षण
IISWC Dehradun Skill Development Training: देहरादून/मसूरी, 20 मार्च, 2026 : भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (IISWC), देहरादून ने मसूरी वन प्रभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए आयोजित तीन दिवसीय विशेष कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया।
18 से 20 मार्च 2026 तक बद्रीगाड़ एवं केम्पटी क्षेत्र में आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य वन कर्मियों को आधुनिक संरक्षण तकनीकों और आजीविका सुरक्षा के गुर सिखाना था।
IISWC Dehradun Skill Development Training: कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान के विभागाध्यक्ष डॉ. जे. एस. एस. तोमर ने किया। उन्होंने बढ़ते जलवायु परिवर्तन के दौर में वृक्षारोपण, कृषिवानिकी और प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल संसाधनों के विकास पर विशेष बल दिया।
प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिए:
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डॉ. जे. जयप्रकाश ने वनाग्नि की रोकथाम के प्रभावी तरीकों पर चर्चा की।
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डॉ. एस. एस. श्रीमाली ने पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण के लिए अभियांत्रिकी (Engineering) उपायों के बारे में बताया।
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डॉ. अनुपम बड़ एवं राकेश कुमार ने मशरूम उत्पादन और मत्स्य पालन के माध्यम से वन-आश्रित समुदायों की आजीविका सुधारने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला।
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मुदित मिश्रा एवं इंजीनियर प्रकाश सिंह ने नर्सरी प्रबंधन और जल संचयन संरचनाओं के तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी।
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डॉ. आर. के. सिंह (पूर्व प्रधान वैज्ञानिक) ने जल संरक्षण संरचनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर अपना अनुभव साझा किया।
IISWC Dehradun Skill Development Training: कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने वन प्रबंधन और जल संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने का आह्वान किया। उन्होंने अपने ऐतिहासिक “मैती आंदोलन” के अनुभवों को साझा करते हुए वन कर्मियों को प्रकृति संरक्षण के प्रति प्रेरित किया।
इस कार्यशाला में बद्रीगाड़ और केम्पटी रेंज के कुल 51 प्रशिक्षुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम में केम्पटी रेंज की वन क्षेत्राधिकारी अमिता थपलियाल और बद्रीगाड़ रेंज के वन क्षेत्राधिकारी जी. एस. चौहान भी मौजूद रहे। समापन अवसर पर सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। आयोजकों के अनुसार, इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों से न केवल वन कर्मियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) के प्रबंधन को भी मजबूती मिलती है।













