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खेतों की मेढ़ों पर हाथी घास लगाई है तो चारे का संकट नहीं झेलना पड़ेगा

Rajesh Pandey
Last updated: March 30, 2024 11:38 am
Rajesh Pandey
2 years ago
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देहरादून के एक फार्म पर नैपियर ग्रास। फोटो- राजेश पांडेय
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देहरादून। न्यूज लाइव

नैपियर (Napier Grass), जिसे सामान्य बोलचाल में हाथी घास (Elephant Grass) भी कहते हैं, पशुओं के चारे की कमी को पूरा करने के साथ आसपास के जंगलों को होने वाले नुकसान को भी काफी हद तक कम कर रही है। विकासनगर के लांघा गांव में इसका प्रयोग हुआ, जिसके सुखद परिणाम सामने आए।

वरिष्ठ पत्रकार गौरव मिश्रा के साथ एक साक्षात्कार में, भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान ( Indian Institute of Soil and Water Conservation) के मानव संसाधन विकास विभाग एवं पौध विज्ञान विभागाध्यक्ष  प्रधान वैज्ञानिक (वानिकी) डॉ. चरण सिंह बताते हैं, संस्थान ने हाईब्रीड नैपियर, जो बाजरा और जंगली सरू का क्रासब्रीड तैयार किया है। यह कम उपजाऊ मिट्टी में भी पैदा हो जाता है। पशु इसको बड़े चाव से खाते हैं, इसे खेतों की मेढ़ पर लगाकर चारे की जरूरत को पूरा किया जा सकता है। इसको पानी की भी अधिक आवश्यकता नहीं है। ये मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। इसको खेत की मेढ़ पर लगा दिया तो पशुओं के चारे के लिए जंगल जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के मानव संसाधन विकास विभाग एवं पौध विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रधान वैज्ञानिक (वानिकी) डॉ. चरण सिंह। फोटो साभारः iiswc

बताते हैं,  चारा पत्ती की निर्भरता की वजह से वनों में पेड़ पौधों का अवैज्ञानिक तरीके से दोहन होता है। एक स्टडी में पाया गया कि घरों के पास, खेतों में सालभर उत्पादित होने वाली हाथी घास लगाने से आसपास के वन क्षेत्रों पर लगभग 31 फीसदी दबाव कम हो जाता है।

Also Read: खेतीबाड़ी में पिछड़ गया देहरादून के पास का यह गांव

Also Read: यूएस छोड़कर लौटे इंजीनियर ने गोवंश बचाने के लिए गांवों को रोजगार से जोड़ दिया

डॉ. सिंह के अनुसार, शुरुआत में जब संस्थान ने किसानों को नैपियर घास लगाने के लिए प्रेरित किया तो बहुत अच्छे परिणाम नहीं आए। किसानों का मानना था कि नैपियर लगाने से उनके खेतों की उर्वरक क्षमता कम हो जाएगी। हमारे लगाए गए पौधों को किसान ने उखाड़कर जंगल में फेंक दिया था। हमने कुछ पौधे गोबर के ढेर के पास भी लगाए थे। किसान ही बताते हैं, उनके पशु इन पौधों की तरफ आकर्षित हुए और इसको चाव से खाने लगे। तब उनको महसूस हुआ कि जिन पौधों को उन्होंने जंगल में फेंक दिया था, उनके बड़े काम के हैं।

हालांकि अभी तक देहरादून समेत आसपास के जिलों में सहारनपुर और हरियाणा से आने वाली बरसीम, बाजरा और चरी दुधारू पशुओं के लिए उपयोग में आती रही है। स्थानीय स्तर पर उत्पादित होने वाली कई प्रजातियों की घास को ये पशु (गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़) खाते रहे हैं। पर, हाइब्रिड नैपियर पशुपालन के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम है।

भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान का हाइब्रीड नैपियर का प्रयोग पर्वतीय इलाकों में वनों पर निर्भरता को कम कर सकता है, वहीं चारा पत्ती के लिए किए जाने वाले श्रम का बोझ भी कम हो सकेगा। पर्वतीय इलाकों में पशुपालन और कृषि गतिविधियां महिलाओं के ही जिम्मे है। वहीं, सीढ़ीदार खेतों की मेढ़ों पर हाइब्रीड नैपियर लगाने से पानी से मिट्टी का कटाव नहीं होगा और घर के पास चारा मिलने से महिलाओं का समय भी बचेगा।

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TAGGED:Indian Institute of Soil and Water ConservationIs Napier grass good?Napier grass (Pennisetum purpureum)What are 2 uses of elephant grass?What is another name for Napier grass?What is Napier grass used for?
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ByRajesh Pandey
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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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