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उत्तराखंडः मधुमक्खी पालन से 12 दिन में सवा लाख का शहद उत्पादन

मधुमक्खियां फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि परागण से उत्पादन बढ़ा देती हैं

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

राजस्थान के भरतपुर जिले के मोहन सिंह मधुमक्खी पालन से शहद उत्पादन करते हैं। वो उन इलाकों को तलाशते हैं, जहां मधुमक्खियों के लिए संभावनाएं होती हैं। देहरादून का भोगपुर इलाका लीची की पैदावार के लिए जाना जाता है और इन दिनों लीची के पेड़ बोर (फूलों) से लदे हैं, इसलिए यह इलाका मधुमक्खियों की पसंदीदा जगह है।

शहद उत्पादक मोहन सिंह ने मार्च के चौथे सप्ताह की शुरुआत में यहां मधुमक्खियों के लगभग साढ़े तीन सौ बॉक्स रखे हैं। अप्रैल की भरी दोपहरी में मधुमक्खियों के बॉक्स की निगरानी करते हैं। वो बारी- बारी से हर बॉक्स में रखे सभी नौ फ्रेम में रानी मधुमक्खी की मौजूदगी जांच रहे हैं। कहते हैं, रानी मधुमक्खी के बिना बॉक्स अधूरा है यानी जिस बॉक्स में रानी नहीं है, उसमें मधुमक्खियों की पैदावार नहीं हो सकती, क्योंकि रानी मधुमक्खी का काम अंडे देना है। किसी न किसी फ्रेम में रानी जरूर मिलेगी। एक बॉक्स यानी एक छत्ते में एक ही रानी होती है।

यह है शहद उत्पादन का गणित
वो बताते हैं, अभी 26 मार्च यानी 12 दिन पहले ही इस बागीचे में बॉक्स रखे हैं। इस बीच शहद का एक लॉट भी निकाल लिया। मात्र 12 दिन में शहद उत्पादन के सवाल पर उनका कहना था, अभी तक लगभग 40 टिन शहद मिल चुका है। एक टिन में 20 से 22 किलो तक शहद आता है। कुल मिलाकर आठ कुंतल शहद हासिल कर लिया है। वो प्रति किलो शहद की कीमत लगभग डेढ़ सौ रुपये बताते हैं। साथ ही, यह भी कहते हैं शहद की कीमत 160 से 200 रुपये तक भी हो जाती है। और, उत्पादन इस बात पर निर्भर करता है कि पर्यावरण कितना मुफीद है।

हिसाब के अनुसार, उन्होंने अभी तक यानी 12 दिन में लगभग सवा लाख रुपये का शहद उत्पादन कर लिया है। कुल लाभ पर, उनका कहना था कि अभी कुछ दिन और रुककर हिसाब लगाएंगे, तभी कुछ बता पाएंगे। इसमें लागत भी बहुत लगती है। सभी बॉक्स को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने का परिवहन, श्रम आदि में काफी खर्चा आता है। हालांकि उनका कहना है, पूरा निवेश लगभग एक वर्ष में पूरा होने की संभावना है।

“मधुमक्खी पालन के लिए एक बॉक्स चार हजार रुपये में तैयार होता है, जिसमें मधुमक्खियों और मोम के बने नौ फ्रेम की कीमत भी शामिल है। उनके और साथियों ने भी लीची-आम के बागीचों में मधुमक्खियों के बॉक्स रखे हैं। उत्तराखंड, यूपी, राजस्थान समेत अन्य प्रदेशों मधुमक्खी पालन की संभावनाएं तलाशते हैं और वहां बागीचों और खेतों के पास बॉक्स रखते हैं। 20 मार्च से 20 अप्रैल के बीच का समय सबसे अच्छा होता है, इन दिनों पेड़ों पर बोर (फ्लावरिंग) है, जिससे मधुमक्खियां रस इकट्ठा करती हैं,” मोहन सिंह बताते हैं।

मधुमक्खियों के बॉक्स में इस तरह के फ्रेम रखे होते हैं, जो मोम से बनते हैं। फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

उनका कहना है, लीची के बागीचे में रखे इन बॉक्स से मिलने वाले शहद में लीची की खुश्बू आती है। वैसे तो, मधुमक्खियों की बहुत सारी प्रजातियां होती हैं, पर उनके पास इटैलियन मधुमक्खियां हैं। इसके बाद, वो अलीगढ़ जाएंगे,जहां बाजरा के खेतों के आसपास ये बॉक्स रखेंगे। बाजरा से शहद नहीं मिलता, पर मधुमक्खियों को अपने लिए भोजन जरूर मिल जाता है। मधुमक्खियों को जीवित रखना उनके लिए बेहद जरूरी है।

उन्होंने सभी बॉक्स की नियमित रूप से निगरानी पर जोर देते हुए कहा, मधुमक्खियों को सही वातावरण मिलेगा, तभी वो जीवित रह पाएंगी और हमारे लिए शहद उत्पादन कर पाएंगी।

मोम भी मिलता है, जिसकी कीमत 300 रुपये प्रति किलो
मधुमक्खियों के बॉक्स से निकलने वाले सभी फ्रेम को एक मशीन के खांचों में रखते हैं। किसी ड्रम की तरह दिखने वाली इस मशीन में चरखीनुमा स्ट्रक्चर में नौ खांचे बने हैं। इन खांचों में फ्रेम रखकर चरखी को हैंडल की मदद से घुमाते हैं। चरखी घुमने के साथ-साथ फ्रेम से निकलने वाला शहद ड्रम में इकट्ठा हो जाता है। शहद को एक पात्र में इकट्ठा कर लिया जाता है और छत्तों का मोम दूसरे बरतन में इकट्ठा कर लेते हैं। मोहन सिंह बताते हैं, छत्तों के मोम का बहुत उपयोग होता है। यह मोमबत्ती, शूज पॉलिश, मैशन पॉलिश,कार्बन पेपर, मोमजामा, क्रीम तथा मॉडल, बिजली के सामानों में इंसुलेटर बनाने में इस्तेमाल होता है। यहीं नहीं मधुमक्खियों के बॉक्स में रखी शीट बनाने में भी इसका इस्तेमाल होता है। मोहन सिंह बताते हैं, यह लगभग 300 रुपये किलो बिकता है। मधुमक्खी पालन में मिलने वाला हर उत्पाद काम का है, यहां कुछ भी फेंकने के लिए नहीं होता।

मधुमक्खियों के छत्तों से शहद निकालने की मशीन। फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

मोहन सिंह बताते हैं, उन्होंने शहद बेचने के लिए किसी कंपनी से कोई समझौता नहीं किया है। वो सहारनपुर और आसपास के इलाकों के ट्रेडर्स (व्यापारियों) को शहद बेचते हैं, जो उनके पास शहद लेने के लिए यहीं आते हैं।

मधुमक्खियां परागण का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत
द नार्दर्न गैजेट के संपादक एसएमए काजमी, कुछ वर्षों पहले अमेरिका के किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से अपनी मुलाकात का जिक्र करते हैं। उस समय प्रोफेसर ने उन्हें बताया था कि उनके पास मधुमक्खियों के बॉक्स से लदा एक बड़ा ट्रक है। विश्वविद्यालय में पढ़ाने के साथ ही, वो मधुमक्खी पालन भी करते हैं। प्रोफेसर के अनुसार, अमेरिका के किसान उनको अपने खेतों में मधुमक्खियों के बॉक्स से लदा ट्रक कुछ दिन पार्क करने के लिए कहते हैं। इससे उनको और किसानों दोनों को लाभ हुआ। उनकी मधुमक्खियों को रस मिला, जिससे उनके पास शहद उत्पादन हुआ और किसानों की फसल उत्पादन में डेढ़ गुना वृद्धि हुई। मधुमक्खियां परागण का सबसे मह्वपूर्ण स्रोत हैं।

मधुमक्खियों पर बहुत सारी जानकारियां देती एक वेबसाइट के अनुसार,  मधुमक्खियां हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वैज्ञानिक मानते है कि हमारे भोजन का हर तीसरा हिस्सा मधुमक्खियों के प्रयासों का ही नतीजा है। मधुमक्खी इतने सारे खाद्य पौधों को परागित करते हैं, जो हमारे भोजन को स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाते हैं, जिनमें कई फल, सब्जियां और नट्स शामिल हैं। मधुमक्खियों के अपने पूरे जीवन में पराग इकट्ठा करने के कारण छत्ते में मौजूद शिशुओं को आहार में प्रोटीन उपलब्ध हो पाता है। अपने पैरों से पराग इकट्ठा करते समय कुछ पराग फूलों के नर घटक से मादा घटक तक पहुंच जाते है। इस प्रक्रिया से मादा फूलों में निषेचन हो जाता है और पौधे अगली पीढ़ी के लिए बीज बनाने की प्रक्रिया शुरू कर देते है।

परागकण एक फूल से दूसरे में कैसे जाता है? फूल पराग को स्थानांतरित करने के लिए हवा, पानी, पक्षी, कीट, तितलियों, चमगादड़ों, और अन्य उन जानवरों पर निर्भर होते हैं, जो फूलों के पास घूमते हैं। हम उन जीवों या कीटों को “परागणकर्ता” कहते हैं, जो पराग को एक पौधे से दूसरे पौधे तक स्थानांतरित करते हैं। आमतौर पर परागण एक फूल पर एक कीट गतिविधि का अनायास परिणाम है। परागणकर्ता अक्सर फूल से इसके प्रोटीन और अन्य पोषण संबंधी विशेषताओ के लिए पराग को खाता या इकट्ठा करता है। तब परागकण स्वयं ही कीट के शरीर से चिपक जाते हैं। जब कीट किसी अन्य फूल पर जाता है, तो पराग फूल के स्टिग्मा पर गिर जाता है और परिणामस्वरूप फूल का सफल रिप्रोडक्शन हो जाता है।

हालांकि अधिक संख्या में मधुमक्खियां और कई कीड़े और पक्षी परागकण हैं, परन्तु मधुमक्खियां किसानों के पसंदीदा परागकण हैं, क्योंकि उनके छत्ते को विभिन्न स्थानों पर आसानी से ले जाया जा सकता है। परागण प्रक्रिया में मधुमक्खियां बेहद कुशल होती हैं। आपने पढ़ा या सुना होगा कि मधुमक्खियों की संख्या दिन- प्रतिदिन कम होती जा रही हैं और अगर यह सच है, तो हमारी खाद्य आपूर्ति संकट में है।

मधुमक्खिया अच्छी परागणकर्ता क्यों हैं ?
• मधुमक्खियां पराग और शहद इकट्ठा करने के लिए अक्सर, बार-बार, लंबे समय तक फूलो पर मंडराती हैं और विभिन्न जलवायु अपने लिए अनुकूल बना लेती हैं।
• फूलों पर मंडराते समय मधुमक्खी के बालों वाले पैर और पराग बास्केट पराग ले जाने के लिए अनुकूल हैं।
• मधुमक्खियां फूलों की अधिकांश किस्मों से पराग और नेक्टर को इकट्ठा करने में सक्षम हैं।
• मधुमक्खियाँ फूलों पर मंडराने के दौरान उनको नुकसान नहीं पहुंचाती।
• मधुमक्खियों को समूहों में पाला जाता है।
• मौनगृह भ्रमणशील होते हैं और इसे उस फसल के पास ले जाया जा सकता है, जहां परागण की आवश्यकता होती है।

-स्रोत- मधुमक्खी परागण

मधुमक्खियों के बारे में रोचक जानकारियां
छत्ते में तीन प्रकार की मधुमक्खियां होती है – रानी मधुमक्खी, श्रमिक मधुमक्खी एवं ड्रोन मक्खी। रानी मक्खी एकमात्र मादा मधुमक्खी होती है, जो प्रजनन करती है। श्रमिक मधुमक्खियों को रानी मक्खी जन्म देती है। ड्रोन मक्खी नर होते है, जो छत्ते के बाहर जाकर अन्य रानी मक्खियों के साथ प्रजनन करके नये छत्ते बनाते हैं। रानी मक्खी श्रमिक मक्खियों से आकार में बड़ी होती है। ड्रोन मक्खियां डंकविहीन होते हैं।

रानी मधुमक्खी का उदर बड़े आकार का होता है और काफी श्रमिक मधुमक्खियां इसके इर्द गिर्द घूमती हैं। इसलिए एक छत्ते में रानी मक्खी को पहचानना मुश्किल नहीं है। यदि एक छत्ते में दूसरी बाहरी रानी मक्खी आ भी गई तो श्रमिक मक्खियां उसको छत्ते से बाहर करने की कोशिश करेंगी या फिर दोनों रानी मक्खियां तब तक लड़ाई करेंगी, जब तक उनमें से कोई एक ही बचे।

रानी मधुमक्खी छत्ते में सदस्यों की संख्या अधिक बनाए रखने के लिए औसतन डेढ़ हजार अंडे एक दिन में देने होते हैं।

सभी श्रमिक मधुमक्खियां मादा होती हैं। ये किशोर अवस्था में छत्ते के अंदर कार्य करती हैं, जैसे रानी मधुमक्खी एवं लार्वा की देखभाली का काम। ये मोम ग्रंथि से मोम बनाने का कार्य भी करती हैं, जो छत्ते के निर्माण में एक महत्वपूर्ण कार्य है। हर मधुमक्खी के कार्य की अवधि छत्ते की आवश्यकताओं पर निर्भर करती है। सामान्यत: कुछ हफ्ते छत्ते में काम करने के बाद श्रमिक मक्खियां बाहरी कार्यों में जुट जाती हैं। श्रमिक मधुमक्खी का अंतिम कार्य भोजन ढूंढकर लाना होता है। भोजन ढूंढने वाली श्रमिक मक्खियों को ‘फोरेजर’ कहा जाता है, जो छत्ते के लिए पराग, मकरंद एवं जल की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं।

देहरादून के भोगपुर इलाके के एक बागीचे में रखे मधुमक्खियों के बॉक्स । फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com

वयस्क फोरेजर सामान्य रूप से 30 दिन तक भोजन लाने का कार्य करते हैं। इसके बाद उनका जीवन चक्र समाप्त हो जाता है। इस तरह एक श्रमिक मधुमक्खी का जीवन करीब 51 दिनों का होता है। भोजन ढूंढने का कार्य जोखिमपूर्ण होता है, क्योंकि छत्ते की बाहर की दुनिया में काफी खतरा होता है। छत्ते के बाहर मधुमक्खियों को परभक्षी खा सकते हैं। वो घर लौटने का रास्ता भटक सकती हैं। तूफ़ान में फंसने का खतरा भी होता है और वातावरण में बीमारी या कीटनाशकों की उपस्थिति भी इनके लिए जोखिम हैं। सर्दी के मौसम में मधुमक्खियां छत्ते के अंदर ही रहती हैं, जहां तापमान बाहर की तुलना में गर्म होता है एवं इस तरह वो छह महीनो से भी अधिक जीवित रहती हैं।

मधुमक्खियों की एक नहीं, बल्कि कई प्रजातियां होती हैं। वैज्ञानिकों ने हजारों विभिन्न प्रकार की मधुमक्खियों को खोजकर सूचीबद्ध किया है। मधुमक्खियों की 20,000 से अधिक प्रजातियां हैं। अफ्रीकी मधुमक्खी अपनी संबंधित यूरोपीय प्रजाति की तुलना में अधिक आक्रामक होती है। कुछ मधुमक्खियां आम मधुमक्खी की तरह सामाजिक होती हैं, जबकि अन्य मधुमक्खियाँ, जैसे कि खुदाई करने वाली मधुमक्खियाँ (डिगर बी) और रंगबिरंगी मधुमक्खियां (आर्किड बी) एकांत में रहना पसंद करती हैं।

अधिक संख्या में मधुमक्खियां छत्ते के बाहर करीब दो किलोमीटर तक जाकर फूलों से पराग एवं मकरंद इकट्ठा करके लाती हैं। मकरंद का उपयोग शहद बनाने में किया जाता है,  जो वयस्क मधुमक्खियों एवं बढ़ते हुए लार्वे के लिए ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है। पराग प्रोटीन का एक स्रोत है एवं इसका उपयोग लार्वा के भोजन में किया जाता है, ताकि किशोर मधुमक्खियां शक्तिवान होकर निकलें। पराग एवं मकरंद के बदले मधुमक्खियां पौधो में परागण का कार्य करती हैं, जिससे पौधे फल तथा बीजों का निर्माण कर पाते हैं। – स्रोतः मधुमक्खियों की कहानी

उत्तराखंड आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट 2020-21 के अनुसार राज्य में 6162 मौन पालकों ने 2.71 लाख मौन वंशों के माध्यम से लगभग 2200 मैट्रिक टन शहद का उत्पादन किया। उत्तराखंड एकीकृत औद्यानिक विकास परियोजना के तहत राज्य के हर गांव में मधुग्राम विकसित करके किसानों की आय में वृद्धि करने तथा बेरोजगार व्यक्तियों को आजीविका का अवसर उपलब्ध कराने का लक्ष्य है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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