
न्यूजलाइव डेस्क
हर दिन आप फोन उठाते हैं, सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं, और स्क्रॉल करते वक्त कुछ शीर्षक आपका ध्यान खींच लेते हैं, जैसे कि “इस एक ट्रिक से बदल जाएगी ज़िंदगी!” या “ये सच जानकर आपके होश उड़ जाएंगे!”—आप क्लिक करते हैं, लेकिन अंदर जो कंटेंट मिलता है, वो शीर्षक के अनुसार जानकारी नहीं देता। बाद में लगता है कि इस कंटेंट को पढ़ने में समय खराब हो गया। क्या आपने कभी सोचा कि ये क्या है? इसे कहते हैं क्लिकबेट (Clickbait). आइए जानते हैं क्लिकबेट कंटेंट क्या है और यह हमारे डिजिटल अनुभव को कैसे प्रभावित करता है।
हमने यह जो हेडिंग “आपका रोजाना होता है सामना, क्या आप जानते हैं “क्लिकबेट” के बारे में ?” भी आपको लिंक पर क्लिक करने के लिए प्रेरित करता है। पर इस हेडिंग का दूसरा हिस्सा, “क्या आप जानतते हैं, “क्लिकबेट” के बारे में ? यह सीधा सपाट है।
आज की तेज़ रफ्तार डिजिटल दुनिया में हर कोई आपका ध्यान खींचना चाहता है। सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते वक्त अचानक एक शीर्षक नज़र आता है: “इस एक ट्रिक से बदल जाएगी आपकी ज़िंदगी!” या “ये हैं दुनिया के 5 सबसे रहस्यमयी जगहें, नंबर 3 आपको हैरान कर देगा!”, “इस नुस्खे से 7 दिन में वजन कम करें!”, “इस वीडियो को देखने के बाद आप कभी चाय नहीं पिएंगे!”। ऐसे ही कई हेडिंग मोबाइल फोन की स्क्रीन पर रोजाना आपके सामने से होकर गुजरते हैं।
आप उत्सुकता में क्लिक करते हैं, लेकिन जो मिलता है, वो शीर्षक के वादे से कोसों दूर होता है। इसे ही कहते हैं क्लिकबेट कंटेंट—ऐसा कंटेंट जो बड़े-बड़े दावों से आपको लुभाए, लेकिन असल में कुछ खास न दे।
क्लिकबेट कोई पुराना शब्द नहीं है। यह पिछले 15-20 साल में इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ पैदा हुआ। 2010 के दशक में एक इंटरनेट साइट ने इसे मशहूर बनाया, जब “हैरान कर देने वाली” लिस्ट्स और वीडियो हर तरफ छा गए। इसका मकसद? आपका एक क्लिक, जिससे वेबसाइट्स को विज्ञापन की कमाई हो। डिजिटल मार्केटिंग में ये एक आसान तरीका है ट्रैफिक बढ़ाने का। कुल मिलाकर इसका उद्देश्य जानकारी देना कम और वेबसाइट पर ट्रैफिक लाना ज्यादा होता है। लेकिन दिक्कत तब आती है जब शीर्षक और असल सामग्री में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। लेकिन इसका नुकसान ये है कि पाठक बार-बार ठगा हुआ महसूस करते हैं, और धीरे-धीरे इस तरह के हेडिंग वालीं वेबसाइट पर भरोसा कम हो जाता है।
अगली बार जब कोई शीर्षक बहुत सनसनीखेज़ लगे, तो रुकें और सोचें। क्या इसमें “हैरान कर देगा” या “आपको यकीन नहीं होगा” जैसे शब्द हैं?, क्या ये आपको अधूरी जानकारी का लालच दे रहे हैं? अगर हाँ, तो शायद ये क्लिकबेट हो। जैसे-जैसे लोग क्लिकबेट से परेशान हो रहे हैं, वेबसाइट्स को भी समझ आ रहा है कि भरोसा बनाए रखना ज़रूरी है। भविष्य में शायद क्लिकबेट कम हो और कंटेंट क्रिएटर्स सही, उपयोगी जानकारी पर ध्यान दें। लेकिन तब तक, हमें खुद स्मार्ट बनना होगा।
कैसे बना यह शब्द
“क्लिकबेट” अंग्रेजी शब्द “Clickbait” से आया है, जो दो शब्दों “Click” (क्लिक करना) और “Bait” (चारा) से मिलकर बना है। “Bait” का मतलब होता है मछली पकड़ने के लिए चारा, जो मछली को लुभाता है। उसी तरह, “क्लिकबेट” वह कंटेंट है जो लोगों को लुभाने के लिए बनाया जाता है ताकि वे वेबसाइट या लिंक पर क्लिक करें। हिंदी में इसे सीधे “क्लिकबेट” कहकर अपनाया गया है, क्योंकि डिजिटल पत्रकारिता में अंग्रेजी शब्दों का चलन आम है। यह शब्द पुरानी पत्रकारिता में नहीं था, क्योंकि अखबारों या टीवी में “क्लिक” करने का कोई कॉन्सेप्ट नहीं था। यह पूरी तरह से इंटरनेट और वेब मीडिया की देन है।
कैसे और कब हुई शुरुआत
क्लिकबेट की शुरुआत इंटरनेट के लोकप्रिय होने के साथ हुई, खासकर 2000 के दशक में जब वेबसाइट्स और ब्लॉग्स की संख्या बढ़ने लगी। लेकिन इसका असली उछाल सोशल मीडिया और डिजिटल विज्ञापन के दौर में आया—लगभग 2010 के आसपास।
पुराने जमाने में अखबारों में सनसनीखेज़ शीर्षक होते थे, जैसे “शहर में हड़कंप!”। क्लिकबेट को आप उसका डिजिटल संस्करण कह सकते हैं। लेकिन क्लिकबेट खास इसलिए है, क्योंकि यह ऑनलाइन ट्रैफिक और विज्ञापन की कमाई से जुड़ा है।
इंटरनेट पर कंटेंट बढ़ा, और वेबसाइट्स को विज्ञापन से कमाई करने के लिए ज्यादा से ज्यादा लोग चाहिए थे। यहाँ से क्लिकबेट का जन्म हुआ। शुरू में इसे “लिंकबेट” भी कहा जाता था।
सोशल मीडिया के प्रसार से क्लिकबेट एक रणनीति बन गया। सोशल मीडिया पर शेयर होने वाले पोस्ट्स में ऐसे शीर्षक आम हो गए, जो अधूरी बात कहकर आपको क्लिक करने पर मजबूर करते थे।
2015 के बाद लोगों ने इसकी शिकायत शुरू की कि क्लिकबेट से ठगा हुआ महसूस होता है। इसके बाद सोशल मीडिया साइट्स और सर्च इंजन कंपनियों ने अपने एल्गोरिदम में बदलाव किए ताकि सस्ते क्लिकबेट को कम बढ़ावा मिले। फिर भी, यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
यह लेख एआई से प्राप्त जानकारियों पर आधारित है।