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Elephant railway mortality mitigation: “रेलवे पटरियों पर हाथी-ट्रेन दुर्घटनाओं को कम करने के लिए राष्ट्रीय कार्यशाला”

Rajesh Pandey
Last updated: March 12, 2026 1:37 pm
Rajesh Pandey
1 month ago
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देहरादून, 12 मार्च, 2026ः पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रोजेक्ट एलिफेंट डिविजन ने भारतीय वन्यजीव संस्थान के सहयोग से 10-11 मार्च 2026 को देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्‍लूयआईआई) में “रेल पटरियों पर हाथियों की मृत्यु दर को कम करने के लिए नीति कार्यान्वयन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया।
इस कार्यक्रम में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रोजेक्ट एलिफेंट डिविजन, रेल मंत्रालय, हाथी-बहुल राज्यों के वन विभागों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों और प्रमुख संरक्षण वैज्ञानिकों सहित 40 प्रतिभागियों ने भाग लिया। जिन प्रमुख रेलवे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व किया गया, उनमें पूर्वी मध्य रेलवे, पूर्वी तट रेलवे, उत्तर पूर्वी रेलवे, उत्तर पूर्वी सीमांत रेलवे, उत्तरी रेलवे, दक्षिण पूर्वी रेलवे, दक्षिणी रेलवे और दक्षिण पश्चिमी रेलवे शामिल थे।

भारत में वैश्विक एशियाई हाथी आबादी का 60% से अधिक हिस्सा है, जिनके प्रमुख आवास पूर्वी, उत्तरपूर्वी, दक्षिणी और मध्य क्षेत्रों में फैले हुए हैं। हालांकि, आवासों के विखंडन और हाथियों के आवासों के ऊपर रेलवे अवसंरचना के विस्तार के कारण विशेष रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरलम, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में रेल पटरियों पर हाथियों की मृत्यु दर में वृद्धि हुई है। कार्यशाला का उद्देश्य संरक्षण और अवसंरचना क्षेत्रों के बीच समन्वय को मजबूत करना और विज्ञान आधारित शमन रणनीतियों को बढ़ावा देना था।

रेलवे पटरियों पर वन्यजीवों की बढ़ती मृत्यु दर से निपटने के प्रयास में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने डब्‍ल्यूआईआई और रेल मंत्रालय के साथ साझेदारी में, हाथियों के आवासों में 110 संवेदनशील रेलवे खंडों और बाघों के आवास वाले दो राज्यों में 17 अतिरिक्त खंडों की पहचान की गई।

प्रोजेक्ट एलिफेंट, डब्ल्यूआईआई, राज्य वन विभागों और भारतीय रेलवे की टीमों ने व्यापक संयुक्त क्षेत्र सर्वेक्षणों में विशिष्ट स्थलों की पारिस्थितिक स्थितियों का मूल्यांकन किया और प्रत्येक स्थान के अनुरूप लक्षित शमन उपायों का प्रस्ताव रखा।

3,452.4 किमी में फैले 127 रेलवे खंडों के विस्तृत आकलन के आधार पर, वन्यजीवों की आवाजाही के पैटर्न और पशु मृत्यु दर के जोखिम को ध्यान में रखते हुए, 14 राज्यों में फैले 1,965.2 किमी के 77 खंडों को शमन के लिए प्राथमिकता दी गई।

इन प्राथमिकता वाले हिस्सों के लिए अनुशंसित शमन पैकेज में 503 रैंप और लेवल क्रॉसिंग, 72 पुलों का विस्तार और संशोधन, 39 बाड़ या खाई संरचनाएं, 4 निकास रैंप, 65 नए अंडरपास और 22 ओवरपास शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 705 शमन संरचनाओं के बराबर हैं जिन्हें वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन को सुगम बनाने और दुर्घटनाओं को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

इन सक्रिय उपायों के अलावा, कई नई रेलवे लाइनों और विस्तार परियोजनाओं– जिनमें पटरियों को दोहरी और तिहरी करना शामिल है– में वन्यजीवों के अनुकूल बुनियादी ढांचा शामिल किया गया है।

उल्लेखनीय उदाहरणों में छत्तीसगढ़ में अचानकमार-अमरकंटक हाथी गलियारे से गुजरने वाली गेवरा रोड-पेंड्रा रोड रेलवे लाइन; महाराष्ट्र में दरेकासा-सालेकासा रेलवे ट्रैक को तिहरी करने की परियोजना और नागभिड़-इतवारी गेज रूपांतरण परियोजना तथा महाराष्ट्र में कान्हा-नावेगांव-ताडोबा-इंद्रावती बाघ गलियारे को पार करने वाली वाडसा-गडचिरोली रेलवे लाइन शामिल हैं।

असम में अजारा-कामाख्या रेलवे लाइन के 3.5 किलोमीटर लंबे संवेदनशील हिस्से पर एक महत्वपूर्ण परियोजना की योजना बनाई जा रही है। यह हिस्सा रानी-गरभंगा-दीपोर बील हाथी गलियारे को काटता है, जहां अतीत में कई हाथियों की मौत हो चुकी है। इस खंड को ऊंचा किया जाएगा ताकि गलियारे के पार हाथियों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।

वन्यजीवों और ट्रेनों के बीच टक्कर को रोकने के लिए कई तकनीकी समाधानों का परीक्षण और कार्यान्वयन किया जा रहा है। एक उल्लेखनीय नवाचार है डिस्ट्रीब्यूटेड एकॉस्टिक सिस्टम (डीएएस) पर आधारित घुसपैठ पहचान प्रणाली (आईडीएस), जिसे हाथियों के निवास वाले संवेदनशील रेलवे मार्गों पर तैनात किया जा रहा है। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के अंतर्गत चार खंडों में पायलट परियोजनाएं सफलतापूर्वक शुरू की जा चुकी हैं, जिनमें असम के 64.03 किमी हाथी गलियारे और 141 किमी रेलवे ब्लॉक खंड शामिल हैं। अब इस प्रणाली को उत्तर बंगाल के संवेदनशील रेलवे खंडों और पूर्वी तट रेलवे के अंतर्गत ओडिशा के कुछ हिस्सों में भी लागू किया जा रहा है।

एक और आशाजनक पहल तमिलनाडु के मदुक्कराई में स्थापित एआई-आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली है, जो थर्मल और मोशन-सेंसिंग तकनीक से लैस 12 टावर-माउंटेड कैमरों के नेटवर्क का उपयोग करती है। यह प्रणाली रेलवे ट्रैक के 100 मीटर के दायरे में हाथियों की गतिविधि का पता लगाती है और स्वचालित रूप से वन और रेलवे अधिकारियों को सतर्क करती है, जिससे ट्रेनों को धीमा करने और हाथियों को सुरक्षित रूप से पार करने में सहायता मिलती है।

कार्यशाला में हाथी पारिस्थितिकी, अवसंरचना नियोजन और जैव विविधता संरक्षण पर तकनीकी सत्र शामिल थे, जिसमें वन्यजीव गलियारों को पार करने वाली रेल पटरियों के लिए संयुक्त नियोजन की आवश्यकता पर बल दिया गया। प्रतिभागियों ने राज्य स्तरीय आंकड़ों, केस स्टडी और प्रमुख दुर्घटना कारकों– पर्यावास विखंडन, भूमि उपयोग में परिवर्तन, ट्रेनों की गति, रात्रि संचालन और हाथियों के मौसमी आवागमन– का विश्लेषण किया।

क्षेत्रीय कार्य समूहों ने प्रमुख भू-भागों (शिवालिक-गंगा के मैदान, मध्य भारत और पूर्वी घाट, उत्तर-पूर्वी भारत, पश्चिमी घाट) में किए गए शमन प्रयासों की समीक्षा की, कमियों की पहचान की और भू-भाग-विशिष्ट रणनीतियों का सुझाव दिया। साझा की गई सर्वोत्तम प्रथाओं में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सेंसर/एआई पहचान तकनीक, जीआईएस निगरानी और समुदाय-आधारित सतर्कता एवं गश्ती नेटवर्क शामिल थे।

कार्यशाला में रेलवे अधिकारियों, वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय पर बल दिया गया, साथ ही जोखिम मूल्यांकन, निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल पर भी बल दिया गया। चर्चाओं में दुर्घटना के संभावित क्षेत्रों और प्राथमिकता वाले मार्गों पर राष्ट्रीय सहमति को सुदृढ़ किया गया और उन्नत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, समर्पित क्रॉसिंग, बेहतर संकेत और बेहतर डेटा साझाकरण की मांग की गई।

प्रतिभागियों ने अनुसंधान प्राथमिकताओं (एआई डिटेक्शन, रिमोट सेंसिंग) का उल्‍लेख किया और विज्ञान-आधारित, सहयोगात्मक कार्रवाई के माध्यम से हाथी-ट्रेन टक्करों को कम करने के लिए प्रोजेक्ट एलिफेंट और रेल मंत्रालय के अंतर्गत एक राष्ट्रीय रोडमैप के लिए सिफारिशें प्रस्तुत कीं।- PIB

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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