Dehradun Domkot Water Crisis: गौरव मिश्रा/राजेश पांडेय, 25 मई, 2026 : पिछले साल 2025 की सितंबर में आई आपदा ने डोमकोट के पानी का स्रोत तबाह कर दिया। गांववालों ने इससे कहीं ऊंचाई पर बड़े बोल्डर और भारी मलबे के बीच दूसरा स्रोत तलाश लिया। यहां तक बर्तन लेकर पहुंचना और वहां से वापस लौटना हर किसी के बस की बात नहीं हैं। कोई रास्ता नहीं है वहां जाने का, जहां बिना बैलेंस खोए मजबूती से पैर टिक जाएं, वहां से आगे बढ़ना होता है। बात केवल मलबे पर चलने की नहीं हैं, इससे बड़ी मुश्किल तो गांव से यहां तक पहुंच वाले खतरनाक रास्ते की है, जो लगभग डेढ़ से दो किमी. है।

Dehradun Domkot Water Crisis: पानी से भरे 15 से 20 लीटर के जरीकैन लेकर ग्रामीण युवा जैसे ही उस सीढ़ीनुमा संकरी चढ़ाई, जिसके एक और पहाड़ी चट्टान है और दूसरी तरफ गहरी खाई, के पास तक पहुंचे, तभी ऊंचाई पर खड़े बच्चों ने आवाज लगाई, वो देखो वहां रीछ पहुंच गया है। हम घबरा गए। यह हमारा पहला अनुभव था कि पर्वतीय ग्रामीण इलाके में हम रीछ यानी भालू को देख पाएंगे। पर, क्या वो हमारी तरफ बढ़ रहा है। पर, कुछ ही समय में युवाओं ने कहा, वो रीछ नहीं है, कोई बड़ा हिरण लगता है। ग्रामीण युवा राजेश सिंह ने कहा, वो देखो सामने उस स्रोत को जहां से हम पानी लेकर आ रहे हैं, वहां वो हिरण आ गया है। अगर वो रीछ भी होता तो कोई हैरानी की बात नहीं है। वहां बहुत सारे जानवर आते हैं। वो उनके ही पानी पीने का स्रोत है। हम भी वहां से मजबूरी में पानी लेने जाते हैं। अभी हम यह बात कर ही रहे थे कि भूस्खलन से प्रभावित स्रोत वाले पहाड़ पर ऊंचाई से एक पत्थर गिरा और बहुत तेज आवाज सुनाई दी। यहां स्थिति यह है कि पता नहीं कब ऊपर से पत्थर गिर जाए।

ग्रामीण सोबन सिंह और विशाल कठैत पानी से भरे जरीकैन लेकर उन संकरी सीढ़ियों पर बैलेंस बनाकर गांव की ओर बढ़ गए। करीब 36 साल के राजेश सिंह की जिम्मेदारी हमें सुरक्षित दूसरे रास्ते, जो कि लंबा है, से होते हुए गांव तक पहुंचाना थी। हालांकि, यह भी सांस फुलाने और जोखिम वाला रास्ता है। यह करीब 20 मीटर आपको मात्र दो से तीन फीट ऐसे संकरे रास्ते पर चलना है, जिसके एक तरफ गहरी खाई और दूसरी तरफ पहाड़ी है। महिलाएं यहां से घास के भारी बोझ लेकर चलती हैं। ये सारी बातें, संस्मरण हम उत्तराखंड के चमोली, पिथौरागढ़ जिलों के दुर्गम गांवों के नहीं बता रहे, यह राजधानी देहरादून से मात्र 30 किमी. दूर डोमकोट गांव की व्यथा है। डोमकोट सरौैना ग्राम पंचायत का हिस्सा है।
Dehradun Domkot Water Crisis: डोमकोट में पानी की कमी ही बड़ी समस्या नहीं है, वहां तक पहुंच भी बहुत चैलेंजिंग है। शुरुआत में तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि रास्ता कहां है। पगडंडी वाला कच्चा उबड़खाबड़ रास्ता, जो कई जगह लैंडस्लाइड से इतना भरभरा है कि पैर फिसलने का जोखिम है। सड़क की कमी, स्कूली बच्चों के सामने पेश होने वाली दुविधा पर बाद में बात करेंगे, पहले पानी की कहानी सुनाते हैं।

24 मई 2026 की कड़ी धूप में सुबह साढ़े दस बजे हमने घुंतु का सेरा स्थित मुकेश कठैत की दुकान से डोमकोट की यात्रा शुरू की। मुकेश और उनके भाई सोबन गांव वाले पहाड़ की तलहटी में चाय, नूडल्स, चिप्स-बिस्किट की दुकान चलाते हैं। वो डोमकोट के रहने वाले हैं। सुबह सात बजे से रात आठ बजे तक दुकान चलाते हैं और फिर रात को ही खतरनाक रास्ते से होते हुए घर लौटते हैं। इन दिनों क्षेत्र में टूरिस्ट का आना जाना लगा है।
हालांकि, तेज धूप में सुबह साढ़े दस बजे, हमारा गांव के लिए चढ़ाई शुरू करना स्वास्थ्य के लिए सही नहीं था, पर एक चौथाई दूरी कवर करने के बाद ठंडी हवा ने काफी राहत दी। गांव की यात्रा के दौरान पानी जरूर साथ में रखना चाहिए।
Dehradun Domkot Water Crisis: हम लगभग साढ़े 12 बजे दस से पंद्रह परिवारों वाले डोमकोट गांव में पहुंच गए और फिर करीब 65 साल के मदन सिंह के जरीकैन लेकर सीधे खड्ड में उतरने का दृश्य हमें पानी के लिए संघर्ष करने की उन कथाओं की ओर ले जाता है, जो शायद 70-80 के दशक की होंगी या मध्यकालीन युग में होगी। यह कहने की वजह है, क्योंकि 26 साल के उत्तराखंड में देहरादून के पास के इस इलाके में पानी के लिए ‘पाताल’ में उतरना पड़ता है।
मदन सिंह इस रास्ते से क्यों उतर रहे थे, वो इसलिए क्योंकि यह उनकी प्रैक्टिस में है और साथ ही, यह कम दूरी वाला है। वो बताते हैं, हमारी चौथी पीढ़ी इस गांव में है। मैं बचपन से ही इसी तरह पानी ढो रहा हूं। इस उम्र में थोड़ा कष्ट होता है। हमारे पास पशु भी हैं, उनके लिए पानी इकट्ठा करने की चिंता रहती है। डर लगता है, वहां बहुत जोखिम है, पर यह सोचने से ही काम नहीं चलेगा। पानी तो चाहिए। इस गांव में बच्चों से लेकर बुजुर्ग और महिलाएं सभी गर्मियों के चार महीने वहां खड्ड से ही पानी ढोते हैं।

करीब 15 साल के सागर 11वीं कक्षा में पढ़ते हैं। वो मालदेवता इंटर कॉलेज के लिए एक तरफा रोजाना 8 किमी. पैदल चलते हैं। दोनों तरफ लगभग 16 किमी. का कठिन सफर है। मालदेवता तक का दो तिहाई रास्ता कच्चा ही है, क्योंकि बांदल नदी में आपदा इन्फ्रास्ट्रक्चर बहाकर ले जाती है। सागर इस कठिन स्कूली यात्रा को शुरू करने से पहले सुबह और वहां से आने के बाद शाम को एक-एक चक्कर पानी के लिए उसी खतरनाक खड्ड, जो पाताल की तरह है, का जरूर लगाते हैं। वो गांव की स्थिति में बदलाव चाहते हैं, पानी और सड़क की जरूरत को प्राथमिकता देते हैं। गांव से 10-12 बच्चे मालदेवता और सरखेत के स्कूलों में जाते हैं। सरखेत प्राइमरी स्कूल पहले है औऍऱ मालदेवता का स्कूल लगभग डेढ़ से दो किमी. आगे है। इनमें कई बालिकाएं भी हैं, जो यहां से स्कूल के लिए कठिन यात्रा करती हैं। गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है, इसलिए छह साल की उम्र तक बच्चों को घर पर ही रहना पड़ता है।
विशाल कठैत रायपुर में रहकर अपनी बिटिया को वहीं अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ा रहे हैं। विशाल समय-समय पर परिवार के साथ गांव आते हैं। कहते हैं, गांव से जुड़ा रहना भी जरूरी है, पर बच्चों की पढ़ाई लिखाई और रोजगार भी महत्वपूर्ण है।
गांव पहुंचने पर ग्रामीण हमें सबसे पहले, गांव के कुलदेवता नागराजा जी के मंदिर के पास स्थित पानी की उस टंकी तक ले गए। जहां दो योजनाओं से पानी पहुंचता है। यह टंकी गांव के सबसे ऊपरी छोर पर इसलिए है, ताकि टंकी में जमा पानी गांव के सभी घरों में भेजा जा सके। पर, यह टंकी खाली है और उसकी तली में मिट्टी जमा है। टंकी के ऊपर दस-बारह जरीकैन रखी हैं। दो जरीकैन में पेयजल योजनाओं के मोटे पाइपों को डालकर रखा गया है। गांव के रखरखाव वाली वर्षों पुरानी योजना के पाइप में बूंद-बूंद पानी आ रहा है, पर करीब दो साल पहले बिछाई गई पेयजल योजना का पानी डोमकोट नहीं पहुंच रहा है। विशाल बताते हैं, ये बर्तन यहां पानी के इंतजार में रखे हैं। हमारी पुरानी योजना से पानी दस से 15 दिन के अंतराल में आ जाता है, वो भी बहुत कम। सर्दियों और बरसात में यहां तक पानी मिल जाता है, तब ज्यादा दिक्कत नहीं होती। इस बार तो मार्च में ही पानी आना बंद हो गया था, यह स्थिति अभी भी है।
Dehradun Domkot Water Crisis: सोबन सिंह बताते हैं, आज हम लोग नई पाइप देखने गए थे। यह कई गांवों को पानी देती है, पर हमारे गांव तक पानी इसलिए नहीं पहुंचता, क्योंकि एक तो यह चढ़ाई पर है और जगह-जगह कुछ लोगों ने पाइप लाइन में प्लास्टिक की बोतलों के ढक्कन बारीक छेद करके इनमें फंसाए हुए हैं। यह आज ही हमने देखा है। ऐसा करके वो लोग यहां तक पानी पहुंचने से रोक रहे हैं। हम पूरी लाइन की निगरानी तो नहीं कर सकते।
ग्रामीण राजेश बताते हैं, सड़क भी बनी होती तो यहां तक नीचे से टैंकरों या खच्चरों से पानी ढुलवा लेते। हम गर्मियों में अपने गांव में कोई समारोह नहीं करते। एक तो यहां तक टैंट, कुर्सियां और जरूरतों का सामान लाना बहुत बड़ी चुनौती है। इसलिए सर्दियों में जब नलों में पानी आता है, तभी समारोह का आयोजन करते हैं। रसोई गैस का सिलेंडर गांव तक पहुंचाना बहुत कठिन काम है।
शाम पांच बज गए…
Dehradun Domkot Water Crisis: हम ग्रामीण युवाओं के साथ पानी के स्रोत से वापस गांव लौट आए। हम बहुत थके हुए थे, समझ नहीं आ रहा था कि ढलान वाली पगडंडी से होकर शहर के रास्ते तक कैसे पहुंचेंगे। हम राजेश सिंह के साथ उनकी गौशाला में पहुंचे, जहां उनकी पत्नी दीपा देवी और भाभी आरती गायों को चारा खिला रही थीं। गौशाला के बाहर गोबर के कंडों को सुलगा रखा था। इन कंडों से निकलने वाला धुआं मक्खी मच्छरों को पशुओं से दूर रखने में मदद करता है।
तभी, आरती के कीपैड वाले छोटे से फोन से आवाज आई। पांच बज गए हैं। इस आवाज ने हमें चौंका दिया। आरती ने बताया, मेरे फोन ने समय बताया है। यह हर एक घंटे में समय बताता है। अब हम दोनों गांव की और महिलाओं के साथ उस स्रोत पर पानी लेने जाएंगे, जहां से आप अभी लौटे हैं। आरती बताती हैं, सुबह पांच बजे उठ जाते हैं। नाश्ता बनाकर बच्चों को स्कूल भेजने, घर के जरूरी काम निपटाकर हम पानी लेने स्रोत तक जाते हैं। दोनों टाइम लगभग तीन से चार चक्कर लगते हैं। एक चक्कर में एक से डेढ़ घंटा लगता है। हमारा अधिकांश समय पानी इकट्ठा करने में ही लगता है। हमें पशुओं के लिए पानी लाना ही पड़ता है। वहां स्रोत पर पानी भरने में समय लगता है।

दीपा बताती हैं, वहां जंगली जानवर हैं, पर हम ग्रुप में जाते हैं, इसलिए डर नहीं लगता। अगर किसी जानवर की आहट होती है, तो हम छिप जाते हैं। हमें स्रोत के पास जानवर दिखे हैं। इसी जंगल से हम घास पत्ती लेने भी जाते हैं। गर्मियों में ज्यादा समस्या है।
स्थितियां पहले से ज्यादा बिगड़ गईं
नवंबर 2022 में पहाड़ी पैडलर्स के संस्थापक सॉफ्टवेयर इंजीनियर गजेंद्र रमोला के साथ इस गांव में पहुंचा था। मौसम ठीक था, थोड़ी ठंडक थी, इसलिए लगभग तीन किमी. की चढ़ाई पार करके गांव तक पहुंच गए थे। हम खाई वाले रास्ते से पानी के स्रोत तक आए थे, तब स्रोत तक रास्ता आज के जितना खतरनाक नहीं था। पर, सितंबर 2025 में आई आपदा के बाद से स्रोत और इस तक पहुंचने का रास्ता तबाह हो गए। पहले वाला स्रोत मलबे में दफन हो चुका है और बहुत ऊंचाई पर मौजूद नये वाले स्रोत तक पहुंचने के लिए बड़े पत्थरों और मलबे के ढेर पर चलना पड़ता है। चार साल पहले स्थानीय ग्रामीण राकेश हमें बता रहे थे कि सड़क का प्रस्ताव हो गया है, उम्मीद है बन जाएगी। पानी का संकट दूर करने का आश्वासन सरकारी सिस्टम से मिला है, हो सकता है पानी भी मिल जाए। हालांकि पानी की नई लाइन गांव तक बिछी है, पर पानी नहीं मिल पा रहा है, खासकर गर्मियों के दिनों की बात करें।



