Dr. Ruchika Sah Ganga Conservation: देहरादून, राजेश पांडेय, 23 अप्रैल, 2026ः भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की प्रोजेक्ट साइंटिस्ट डॉ. रुचिका साह ने गंगा नदी की स्वच्छता, जैव विविधता और प्रदूषण के स्तर पर विस्तार से चर्चा की। नमामि गंगे परियोजना के साथ पिछले आठ वर्षों से जुड़ीं डॉ. साह ने स्पष्ट किया है कि गंगा का संरक्षण एक मिशन होने के साथ ही वैज्ञानिक प्रमाणों और सामुदायिक भागीदारी का समन्वय है। रेडियो केदार के लिए एक विशेष वार्ता में उन्होंने नदी की वर्तमान स्थिति, प्रदूषण के अदृश्य खतरों और भविष्य की चुनौतियों पर विस्तार से बात की।
Dr. Ruchika Sah Ganga Conservation: डॉ. रुचिका साह गंगा और उसकी सहायक नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecology) पर शोध कर रही हैं। उनका मुख्य कार्य नदी और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) में प्रदूषण का आकलन करना और यह समझना है कि रासायनिक तत्वों का जलीय जैव विविधता पर क्या प्रभाव पड़ता है। डॉ. साह बताती हैं कि उनकी टीम मिट्टी, पानी और जलीय जीवों के नमूनों का सूक्ष्म विश्लेषण करती है ताकि नदी की वास्तविक सेहत का पता लगाया जा सके।
साक्षात्कार के दौरान डॉ. साह ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान आकर्षित किया, इंडिजीनस नॉलेज यानी परंपरागत ज्ञान। उन्होंने कानपुर के अपने एक अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे स्थानीय नाविकों (बोटमैन) को बिना किसी वैज्ञानिक शिक्षा के नदी की शुद्धता का सटीक अंदाजा होता है। वे नाविक उस स्थान का पानी नहीं पीते जहां से बुलबुले (Bubbles) उठ रहे होते हैं। डॉ.साह ने इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण समझाते हुए कहा कि जब नदी के तल की मिट्टी (Sediment) की प्रदूषकों को सोखने की क्षमता खत्म हो जाती है, तो वे बुलबुलों के रूप में ऊपर आने लगते हैं। यह इस बात का संकेत है कि मिट्टी का सैचुरेशन लेवल आ चुका है। यह अनुभव सिद्ध करता है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों का अनुभव वैज्ञानिकों के लिए भी सीखने का बड़ा जरिया है।
Dr. Ruchika Sah Ganga Conservation: आम धारणा है कि केवल फैक्ट्रियां ही गंगा को प्रदूषित कर रही हैं, लेकिन उन्होंने इस भ्रम को तोड़ा। उन्होंने बताया कि हमारे घरों में उपयोग होने वाले रोजमर्रा के उत्पाद, जैसे शैम्पू, सनस्क्रीन, हैंडवॉश और साबुन…नदियों के लिए गंभीर खतरा बन गए हैं। गांवों में जहां सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की सुविधा नहीं है, वहां से यह घरेलू कचरा सीधे नालों के जरिए नदियों में पहुंच रहा है। इसके अलावा, अस्पतालों का कचरा (Pharmaceutical waste) भी एक बड़ा स्रोत है।
डॉ. साह ने ‘एंडोक्राइन डिसरप्टर कंपाउंड्स’ (Endocrine Disruptor Compounds) का उल्लेख किया, जो ‘पार्ट्स पर बिलियन’ जैसे सूक्ष्म स्तर पर भी इंसानों और जलीय जीवों के हार्मोनल सिस्टम को बिगाड़ सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जो नदी ऊपर से साफ और निर्मल दिखती है, वह भी रासायनिक रूप से प्रदूषित हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने हर्षिल में गंगा जल की वर्षों पहले की जांच का जिक्र किया, जहां गंगोत्री के करीब होने के बावजूद पानी में प्रतिबंधित कीटनाशकों की मौजूदगी पाई गई। इसका मुख्य कारण सेब और राजमा की खेती में रसायनों का अनियंत्रित उपयोग है।
नदी पारिस्थितिकी तंत्र में वेटलैंड्स (Wetlands) की भूमिका को डॉ. साह ने ‘मानव शरीर की किडनी’ के समान बताया। जिस तरह किडनी रक्त को साफ़ करती है, वैसे ही वेटलैंड्स प्राकृतिक फिल्टर के रूप में काम करते हैं। वे अपनी मिट्टी और पौधों की जड़ों के माध्यम से रसायनों को सोख लेते हैं और बाढ़ नियंत्रण में भी मदद करते हैं। वर्तमान में भारत में लगभग 98 रामसर साइट्स (अंतरराष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स) हैं। उनकी टीम सुंदरबन (पश्चिम बंगाल), काबर ताल (बिहार), आसन (उत्तराखंड) और उधवा (झारखंड) जैसे महत्वपूर्ण वेटलैंड्स की सेहत की निगरानी कर रही है। उन्होंने ‘नेचर बेस्ड सॉल्यूशंस’ के तहत कृत्रिम वेटलैंड्स (Constructed Wetlands) बनाने पर भी जोर दिया, ताकि गाँवों के कचरे को नदी में जाने से पहले प्राकृतिक रूप से शुद्ध किया जा सके।
डॉल्फिन और ऊदबिलाव पर प्रदूषण का प्रभाव
जैव विविधता के संरक्षण पर बात करते हुए डॉ. साह ने बताया कि डॉल्फिन (सुंस) और ऊदबिलाव (Otters) जैसे जीव नदी के स्वास्थ्य के सूचक (Indicators) हैं। क्योंकि ये प्रजातियां थ्रेटेंड (Threatened) श्रेणी में हैं, इसलिए उन पर सीधे परीक्षण करना संभव नहीं है। वैज्ञानिकों ने डॉल्फिन के ‘प्रे-बेस’ यानी जिन मछलियों को डॉल्फिन खाती है, उनका परीक्षण किया। जांच में पाया गया कि मछलियों के शरीर में भारी धातुएं (जैसे आर्सेनिक, लेड, कैडमियम) और प्रतिबंधित डीडीटी (DDT) के अंश मौजूद हैं। यह प्रदूषक तत्व खाद्य श्रृंखला के जरिए डॉल्फिन और अंततः मनुष्यों तक पहुँच रहे हैं। इस शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित किया गया है ताकि सरकार उचित संरक्षण नीतियां बना सके।
गंगा एक्वा लैब्स: आत्मनिर्भर वैज्ञानिक शोध
वैज्ञानिक शोध की गति को तेज करने के लिए WII में ‘गंगा एक्वा लैब्स’ (Ganga Aqua Labs) की स्थापना की गई है। इसमें चार प्रमुख विभाग हैं:
स्पेशल एनालिसिस लैब: रिमोट सेंसिंग और GIS के जरिए प्रदूषण के हॉटस्पॉट्स की पहचान।
एक्वेटिक इकोलॉजी लैब: जेनेटिक्स के माध्यम से बांधों और बैराजों का मछलियों की प्रजातियों पर प्रभाव जाँचना।
प्रदूषण असेसमेंट लैब (दो इकाइयाँ): जहाँ अति-आधुनिक उपकरणों के जरिए ‘पार्ट्स पर ट्रिलियन’ के सूक्ष्म स्तर तक रसायनों का परीक्षण किया जाता है।
पहले इन परीक्षणों के लिए बाहरी प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे समय और डेटा की सटीकता की चुनौती बनी रहती थी। अब यह भारत की पहली ऐसी लैब है जहाँ वन्यजीवों और जलीय प्रजातियों पर केंद्रित गहन वैज्ञानिक शोध हो रहा है।
क्षेत्रीय चुनौतियां: उत्तराखंड से पश्चिम बंगाल तक
डॉ. साह ने स्पष्ट किया कि गंगा के पाँचों राज्यों में प्रदूषण की प्रकृति अलग-अलग है। उत्तराखंड में जहाँ कीटनाशक और घरेलू सीवेज बड़ी समस्या है, वहीं उत्तर प्रदेश में चमड़ा उद्योग (Tanneries) और मुरादाबाद की पीतल इंडस्ट्री (Zinc and Copper) का प्रभाव अधिक है। बिहार और पश्चिम बंगाल में ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste) और प्लास्टिसाइज़र एक बड़ी चुनौती हैं। उन्होंने बताया कि कानपुर जैसे क्रिटिकली पोल्यूटेड स्ट्रेच में अब क्रोमियम की मात्रा में उल्लेखनीय कमी आई है, जो नमामि गंगे अभियान की एक बड़ी सफलता है।
भविष्य की राह: अवेयरनेस और सामुदायिक भागीदारी
साक्षात्कार के अंत में डॉ. साह ने ‘डिफ्यूज पोल्यूशन’ (खेतों से आने वाला अनियंत्रित प्रदूषण) को रोकने के लिए किसानों की जागरूकता को सबसे महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि “नदियाँ हमारी हैं” की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाना होगा। उन्होंने शिक्षकों और छात्रों से ‘सिटीजन साइंस प्रोग्राम’ में भाग लेने का आह्वान किया। डॉ. साह का मानना है कि वैज्ञानिक डेटा अपनी जगह है, लेकिन जब तक एक आम आदमी अपनी नदी के प्रति जवाबदेह नहीं होगा, तब तक पूर्ण स्वच्छता का लक्ष्य प्राप्त करना कठिन है।
डब्ल्यूआईआई तक की एजुकेशन और प्रोफेशनल जर्नी
डॉ. रुचिका साह ने उच्च शिक्षा वैश्विक संस्थानों से प्राप्त की है। उन्होंने अपनी पीएचडी भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) से पूरी की, जबकि मास्टर डिग्री थाईलैंड स्थित विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के केंद्र से हासिल की। उनकी यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें जल प्रदूषण और जलीय पारिस्थितिकी के सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण में विशेषज्ञ बनाती है।
उनके पेशेवर अनुभव का दायरा बहुत व्यापक है। नमामि गंगे प्रोजेक्ट से जुड़ने से पहले वे पंजाब सरकार के जल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग में वैज्ञानिक अधिकारी के रूप में कार्यरत थीं। इसके अलावा, उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण केंद्रीय निकायों के साथ भी कई वर्षों तक काम किया है, जिससे उन्हें विभिन्न औद्योगिक और रासायनिक प्रदूषकों की गहरी समझ प्राप्त हुई।
वर्तमान में, पिछले लगभग 10 वर्षों से वे भारतीय वन्यजीव संस्थान में प्रोजेक्ट साइंटिस्ट के रूप में सेवाएँ प्रदान कर रही हैं। उनकी मुख्य जिम्मेदारी गंगा और उसकी सहायक नदियों में ‘पार्ट्स पर ट्रिलियन’ जैसे सूक्ष्म स्तर तक प्रदूषण का आकलन करना और ‘गंगा एक्वा लैब्स’ के माध्यम से जलीय जीवों के स्वास्थ्य की निगरानी करना है। प्रयोगशाला के जटिल परीक्षणों से लेकर ग्रामीण इलाकों में किसानों को जागरूक करने तक, उनका अनुभव इस राष्ट्रीय मिशन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। Source: Radio Kedar
Frequently Asked Questions (Q&A): Insights from Dr. Ruchika Sah on Ganga Conservation
Based on the detailed discussion with Dr. Ruchika Sah, Project Scientist at the Wildlife Institute of India (WII), here are the key takeaways formatted as FAQs:
Question 1: What is the significance of “Indigenous Knowledge” in monitoring river health? Answer: Dr. Sah emphasizes that traditional knowledge, like that of local boatmen, is scientifically vital. For instance, boatmen avoid water where bubbles rise from the riverbed. Scientifically, this indicates that the river sediment has reached its saturation level and can no longer absorb pollutants, causing gases to escape to the surface. This proves that grassroots experience is a crucial learning tool for scientists.
Question 2: Besides factories, what are the “invisible” sources of river pollution? Answer: Common household products are major contributors. Items like shampoos, sunscreens, handwashes, and soaps contain chemicals that reach rivers via drains, especially in areas without Sewage Treatment Plants (STPs). Additionally, pharmaceutical waste from hospitals and the uncontrolled use of pesticides in farming (like in apple and kidney bean cultivation) significantly impact the water chemistry.
Question 3: What are ‘Endocrine Disruptor Compounds’ and why are they dangerous? Answer: These are chemicals that can interfere with the hormonal systems of both humans and aquatic life, even at microscopic levels (parts per billion). Dr. Sah warns that a river might look physically clean and clear but can still be chemically toxic due to these compounds.
Question 4: Why are Wetlands compared to the ‘human kidney’? Answer: Just as kidneys filter blood, wetlands act as natural filters for the ecosystem. They absorb chemicals through their soil and plant roots, purify water before it reaches the main river, and help in flood control.
Question 5: How do scientists check the health of “Threatened” species like Dolphins? Answer: Since direct testing on threatened species like Dolphins and Otters is restricted, scientists test their “prey base” (the fish they eat). Research has shown that these fish contain heavy metals like arsenic, lead, and cadmium, as well as banned DDT. These toxins move up the food chain, eventually reaching dolphins and humans.
Question 6: What makes the ‘Ganga Aqua Labs’ at WII unique? Answer: It is India’s first lab dedicated specifically to wildlife and aquatic species research. It features:
Spatial Analysis Lab: Uses Remote Sensing and GIS to identify pollution hotspots.
Aquatic Ecology Lab: Studies the genetic impact of dams and barrages on fish.
Pollution Assessment Lab: Uses ultra-modern equipment to detect chemicals at the ‘parts per trillion’ level.
Question 7: How does pollution vary across the different states along the Ganga? Answer: The nature of pollution changes geographically:
Uttarakhand: Primary issues are pesticides and domestic sewage.
Uttar Pradesh: Heavy impact from tanneries (leather industry) and brass industries (zinc and copper).
Bihar & West Bengal: Major challenges include solid waste management and plasticizers.
Question 8: What is ‘Nature-Based Solution’ in the context of village waste? Answer: Dr. Sah advocates for Constructed Wetlands. These are man-made systems that mimic natural wetlands to treat village sewage and agricultural runoff naturally before the water enters the river.
Question 9: What is the most critical factor for the future of Ganga conservation? Answer: Beyond scientific data, community participation and awareness are key. Stopping “diffuse pollution” (uncontrolled runoff from farms) requires farmers to be aware. Dr. Sah calls for a “Citizen Science Program” where students, teachers, and common citizens feel accountable for the river’s health.




