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केशवपुरी के बाल इंजीनियरों से मिलिए

वेस्ट मैटीरियल पर प्रयोग करके बना रहे इलेक्ट्रिकल प्रोटोटाइप

मां को चूल्हे में आग जलाने के लिए फूंक मारते हुए देखता तो तकलीफ होती। मैंने सोचा क्यों न, एक छोटा सा पंखा बनाया जाए, जो चूल्हे को हवा देकर आग जला दे। दोस्तों के साथ मिलकर छोटा सा पंखा बना दिया। जो चूल्हा भी जलाता है और हवा भी खूब देता है। इसको जेब में रख लो, गर्मी लगे तो हवा कर लो।

यह पंखा बनाने के लिए केशवपुरी के दो भाइयों करण और विकास ने मात्र 20 रुपये खर्च किए। एक छोटी से मोटर इलेक्ट्रानिक्स की दुकान से खरीदी, बाकि सामान घर और आसपास में ही मिल गया, जैसे – मोबाइल फोन की पुरानी बैटरी, छोटी सी डिब्बी, तारों के टुकड़े, प्लास्टिक के टुकड़े, बैटरी को चार्ज करने के लिए जैक।

अभी आपको बाल इंजीनियरों की और भी बहुत सारी क्रिएटिविटी के बारे में बताएंगे। ये सब इंजीनियरिंग वो कैसे सीखते हैं, उनका रूटीन क्या है और इन कार्यों पर खर्च के लिए पैसा कैसे जुटाते हैं, और भी बहुत सारी बातों को हम आपसे साझा कर रहे हैं…।

तकधिनाधिन की टीम रविवार को केशवपुरी बस्ती के बाल इंजीनियरों से मिलने उनके घर पहुंची। शनिवार को हमारी मुलाकात डोईवाला चौक पर बाली इलेक्ट्रानिक्स में हुई थी। बाली इलेक्ट्रानिक्स के स्वामी सुशील बाली ने हमें पवन से मिलवाते हुए बताया कि ये बच्चे उनके यहां से नियमित तौर पर कुछ सामान लेकर जाते हैं। ये बहुत होनहार बच्चे हैं। पवन से बात में तय हुआ कि रविवार को दोपहर एक बजे केशवपुरी में डुगडुगी स्कूल के पास मिलेंगे और फिर उनकी वर्कशॉप और उनकी इंजीनियरिंग पर बात करेंगे। तय समय पर दृष्टिकोण समिति के अध्यक्ष मोहित उनियाल के साथ डुगडुगी स्कूल पहुंचे।

क्लास सात के छात्र पवन, विकास, रामबाबू, अंकित पहले से ही हमारा इंतजार कर रहे थे। ये बच्चे डोईवाला के प्रेमनगर बाजार स्थित कन्या क्रमोत्तर पूर्व माध्यमिक विद्यालय में क्लास सात के छात्र हैं। ये सभी हमसे मिलने के लिए अपनी –अपनी साइकिलों से डुगडुगी स्कूल पहुंचे थे और उनका उत्साह देखते ही बन रहा था। उन्होंने हमें बताया कि आप केशवपुरी चौक पर पहुंच जाओ, हम सभी वहीं मिलेंगे विकास के घर पर। बच्चे हमारे आगे आगे साइकिलों पर और हम बाइक पर उनके पीछे पीछे। हमें विकास के घर पर ले जाया गया।

वहां विकास के भाई करण से मुलाकात हुई, जो डोईवाला के पब्लिक इंटर कालेज में क्लास दस के छात्र हैं। पब्लिक इंटर कालेज से मेरा बहुत पुराना नाता रहा है। मैंने 1991 में यहां से इंटर की पढ़ाई की थी। पवन ने बताया कि करण उन सभी बच्चों के मार्गदर्शक हैं, जिनकी मदद से वो तरह-तरह के इलेक्ट्रिकल उत्पाद बनाने का प्रयास करते हैं।

करण ने बताया कि वो प्रयोग करते हैं, कभी प्रयोग सफल हो जाता है और कभी नहीं, लेकिन उनका काम प्रयास करना है। उनका सोचना है कि कोई भी कार्य करना तब तक कठिन है, जब तक कि आप उसे शुरू नहीं करते। शुरू कीजिए, आप एक से बढ़कर एक आइडिया पर काम कर सकते हैं। उन्होंने यू ट्यूब पर काफी कुछ सीखा है। जब उनको आता है तो दूसरे बच्चों को सिखाते हैं।

करण बताते हैं कि अंकित, रामबाबू, विकास, पवन ने बहुत सारा सामान बनाया है, जिसके लिए कुछ उपकरण बाजार से खरीदे हैं और काफी कुछ घरों में मिल जाते हैं। वेस्ट मैटीरियल में हमारे काम की बहुत चीजें मिल जाती हैं। हमें विकास, पवन, रामबाबू, अंकित ने इमरजेंसी लाइट दिखाई, जो उन्होंने घर में ही फालतू पड़े डिब्बों, तारों, मोबाइल फोन की पुरानी बैटरियों, जैक, बाजार से खरीदी एलइडी लाइट से बनाई हैं।

विकास और करण दोनों भाई हैं। उनके पिता प्रमोद साहनी राजमिस्त्री हैं। बताते हैं कि यह लाइट बिजली जाने पर काम आती है। मुझे इन सभी बच्चों पर गर्व है। कुछ समय पहले ही बच्चों ने अपने-अपने घरों के लिए पानी गर्म करने वाली छड़ी बनाई है। उनके यह कहते ही सभी बच्चे अपने घरों की ओर दौड़े और हमें पानी गर्म करने की छड़ लाकर दिखाई, जिसको उन्होंने पुराने सामान से बनाया है। पूछने पर बताया कि उनके केवल 20 रुपये खर्च करने पड़े।

करण ने होम थियेटर दिखाया, जिसको उन्होंने बाजार से लाए छोटे-छोटे स्पीकर्स से मिलाकर बनाया है। होम थियेटर में उनका प्रयास दिखाई देता है। हमने बच्चों से जानना चाहा कि उनके बनाए सामान में क्या क्या इलेक्ट्रिकल व इलेक्ट्रानिक्स सामान इस्तेमाल होता है। उन्होंने बताया कि वे डायोड, मोटर, रेजीस्टेंस, पावर बैंक (बैटरी), एलईडी बल्ब, जैक, स्विच जैसा सामान इस्तेमाल करते हैं।

बाजार से सामान खरीदने के लिए आप पैसों का इंतजाम कैसे करते हैं। इस सवाल के जवाब ने हमें भावुक कर दिया, आपको बता दें कि इन बच्चों को इन प्रयोगों के लिए कहीं से कोई मदद नहीं मिलती। घर में मां पिता से मिलने वाले पांच, दस रुपयों को जोड़ते हैं और फिर उनसे जरूरत का सामान खरीदते हैं। वो बाजार से अपने लिए कुछ खाने पीने का सामान नहीं खरीदते।

उनका मानना है कि अगर पैसा खाने पीने में खर्च कर दिया तो उनकी इंजीनियरिंग के प्रयोग रूक जाएंगे। दृष्टिकोण समिति के अध्यक्ष मोहित उनियाल ने कहा, बच्चों को अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने का बेहतर मंच मिले, इसके लिए हम सभी को प्रयास करने होंगे।

बच्चे बताते हैं कि उन्होंने वाटर पंप, बिजली का बोर्ड, फैन, होम थियेटर, कूलर, वाटर हीटर(पानी गर्म करने की छड़) , बुलबुला मशीन बनाई हैं। बताते हैं कि एक बार उन्होंने अपने स्कूल में वाटर पंप का मॉडल बनाकर दिखाया था। विकास और करण की मां फूल कुमारी बताती हैं कि ये बच्चे घर से सीधा स्कूल और वहां से सीधा घर आते हैं। पढ़ाई में भी मन लगाकर करते हैं और शाम को सभी अपने घरों में कुछ न कुछ बनाने में मगन रहते हैं।

रामबाबू के पिता जयप्रकाश प्लंबर हैं, उनका कहना है कि वो बच्चों को खूब पढ़ाएंगे। इनको कामयाब इंसान बनाने में हरसंभव प्रयास करेंगे। ये सभी बच्चे अपने प्रयोगों को आगे बढ़ाना चाहते हैं और उनका प्रयास इंजीनियर बनना है। हमने उनसे कहा, आप सभी इंजीनियर हो, बाल इंजीनियर, क्योंकि आप इंजीनियर्स की तरह सोचते हो, उनकी तरह अपने प्रयोगों को जारी रखते हो। इस बात की पूरी संभावना है कि आप कुछ साल बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई करोगे और सफलता हासिल करोगे।

खास बात यह है कि अपने कार्यों के बारे में बताते हुए सभी बच्चों के चेहरों पर ताजगी, मुस्कुराहट और आत्मविश्वास दिख रहा था, जो इस बात का संकेत है कि वो कुछ करना चाहते हैं, आगे बढ़ने चाहते हैं, कुछ बनना चाहते हैं। मानो, आप और हम सभी से कह रहे हो कि हम आगे बढ़ेंगे, हम कुछ करेंगे… एक बार आप हमारा हाथ थामकर तो दिखाओ।

तकधिनाधिन के बाल इंजीनियरों से मुलाकात के इस कार्यक्रम के अंत में सभी से फिर वही सवाल किया, पेड़ घूमने क्यों नहीं जाता। सभी बच्चों ने अपने अपने जवाब दिए और जब पेड़ के योगदान पर बात की, तो बच्चों का जवाब था कि अगर पेड़ घूमने चला गया तो हमें आक्सीजन कौन देगा।

इन पांच बाल इंजीनियरों के लगभग दो साल से चले आ रहे प्रयासों में कोई कमी नहीं है, जरूरत है तो उनके बनाए प्रोटोटाइप को व्यस्थित, सुरक्षित और बाजार के अनुसार बेहतर बनाने की। हम इन भावी इंजीनियर्स को तहेदिल से सलाम करते हैं। हम इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। अगले पड़ाव पर फिर मिलेंगे, तब तक के लिए बहुत सारी खुशियों और शुभकामनाओं का तकधिनाधिन।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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