Featuredimprovement yourself

कहानीः अधिकार पहले या कर्तव्य

एक राजा था, जिसको अपने राज्य की जनता और दरबारियों की परीक्षा लेने के लिए नये-नये प्रयोग करने में आनंद आता था। राजा इन प्रयोगों के माध्यम से सभी को कुछ न कुछ संदेश देना चाहता था। एक बार राजा ने अपने अधिकारियों से कहा कि आपको कर्तव्य और अधिकार में से किसी एक को चुनना है। राजा के निर्देश के अनुसार सभी ने एक पेटी में अपनी-अपनी पर्ची जमा कर दी। राजा ने पेटी को खुलवाकर स्वयं ही एक-एक पर्ची को देखा।

राज्य के महामंत्री से लेकर पद में सबसे छोटे पदाधिकारी तक ने अधिकार का चयन किया था। किसी ने भी कर्तव्य को नहीं चुना था। राजा ने अंदाजा लगा लिया कि उनका राज्य किस दिशा में जा रहा है। राजा चिंता में पड़ गए कि उनके राज्य में सभी अपने अधिकारों को लेकर सजग हैं, लेकिन कर्तव्य को किसी ने भी भाव नहीं दिया। जबकि कर्तव्य पहले और अधिकार बाद की बात है।

दूसरे दिन सुबह राजा ने दरबारियों की सभा बुलाई और एक-एक पदाधिकारी से अधिकार के चयन की वजह पूछी। महामंत्री ने राजा से कहा, महाराज मैं जिस पद की जिम्मेदारी संभाल रहा हूं, उसमें अधिकार सबसे पहले है। अगर मैं अपने अधिकार का इस्तेमाल करके अधीनस्थों को आदेश, निर्देश जारी नहीं करूंगा तो सारी व्यवस्था चौपट हो जाएगी। अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके राज्य हित में काम कराना ही मेरा कर्तव्य है। अधिकार नहीं होगा तो मैं राज्य के विधान को सही तरीके से लागू नहीं करा सकूंगा।

महामंत्री की तरह ही सभी ने अधिकार का चयन करने के पीछे अपने तर्क गढ़ दिए। राजा ने खुद से यह सवाल किया कि आखिर मेरे राज्य से कर्तव्य कहां चला गया। क्या अधिकार मिलने पर ही कर्तव्य का पालन करना चाहिए। इनमें से कौन बड़ा है और कौन छोटा। किसकी महत्ता ज्यादा है। अगर मुझसे कहा जाए तो मैं इनमें से किस का चयन करूंगा।

राजा दिनरात इस सवाल औऱ उस तरीके की खोज में लग गए, जिससे सार्थक जवाब मिल सके। करीब दो माह बाद एक रात अचानक राजा किसी को बताए बिना अकेले ही अपने महल से बाहर निकल गया।  दरबार की ओर आने वाली मुख्य सड़क पर पहुंचकर राजा कुछ देर के लिए रुक गया और वहां रखे पत्थरों के ढेर को सड़क के बीच में रखने लगा। पत्थरों को सड़क के बीचोबीच रखकर वह वापस महल लौट आया।

दूसरे दिन राजा ने देखा कि उनके सभी दरबारी, पदाधिकारी, सेवक और फरियादी उसी रास्ते से होकर आ रहे हैं, लेकिन किसी ने भी इन पत्थरों को न तो हटाने के संबंध में नहीं सोचा और न ही किसी पदाधिकारी ने अधीनस्थों को निर्देश दिए। राजा के समक्ष इस बात को लेकर शिकायत आने लगी कि राजमहल के मुख्य मार्ग पर पत्थरों को ढेर लगा है, लेकिन कोई अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा। राजा के शासन को यह कहकर कोसा जाने लगा कि जब राजमहल के पास सड़क की यह हालत है तो राज्य के दूरस्थ स्थानों का क्या हाल होगा। एक दिन के भीतर ही पत्थरों का छोटा सा ढेर बड़ी चर्चा बन गया।

उसी शाम एक किसान अपने परिवार के साथ  बैलगाड़ी से उस रास्ते से होकर कहीं जा रहा था। ये लोग दो दिन बाद शहर से अपने गांव लौट रहे थे। किसान ने सामने पत्थरों का ढेर देखा तो परिवार सहित बैलगाड़ी से उतरकर पत्थरों को हटाया। किसान ने अपने परिवार से कहा, हमें ये पत्थर हटा देने चाहिए। कहीं ये हमारे बैलों को जख्मी न कर दें। सभी ने पत्थरों का ढेर हटा दिया और आगे निकल गए। राजा को अपने गुप्तचरों से यह बात मालूम हुई तो उन्होंने किसान का पता लगाकर उनको परिवार सहित राजमहल आने को कहा।

राजा के सैनिकों ने किसान के घर पहुंचकर उनको और परिवार को आमंत्रित किया। दूसरे दिन किसान को परिवार सहित राजमहल में सम्मानित किया गया। राजा ने किसान के परिवार को इनाम में बहुमूल्य वस्तुएं देते हुए अपने सभी दरबारियों से कहा कि, किसान ने अपने कर्तव्य को निभाया और आज ये सम्मान के हकदार बने। कर्तव्य का पालन करके ही अधिकार की बात की जाए। ये अपने बैलों की सुरक्षा के अपने कर्तव्य को नहीं भूले। अपना कर्तव्य पूरा करने के बाद ही ये बैलों से कार्य कराने के अधिकारी हैं। इसलिए ध्यान रहे कि पहले कर्तव्य है और फिर अधिकार।

Rajesh Pandey

newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button