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सामाजिक सरोकारों वाले अखबारों में यह किनका विज्ञापन है

Rajesh Pandey
Last updated: November 8, 2021 3:38 pm
Rajesh Pandey
9 years ago
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अखबार समाज का आइना बनकर पाठकों को वह सब जानकारी और सूचनाएं पहुंचाता है, जो उनके लिए जरूरी होती हैं। सामाजिक बुराइयों को प्रश्रय देने वाले चेहरों को सामने लाकर उनकी इस प्रवृत्ति के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का काम भी मीडिया करता रहा है।
मीडिया अक्सर खुद को सामाजिक सराेकार से जुड़ा होने का दावा करता रहा है। वह खुद को व्यवस्थाओं का पालन करने वाला साबित करता है और यदि नियमाें और कानून का उल्लंघन हुआ है, तो उसको सामने लाता है।
महिलाओं की सुरक्षा की बात करते हैं, युवाओं के रोजगार और करिअर पर कैंपेन चलाते हैं।अपराध के खिलाफ जंग लड़ने के लिए जागरूकता के अभियान चलाए जाते हैं।
क्या कोई अखबारों के भीतर के पेजों पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों पर नजर दौड़ाएगा, जहां न तो ये सामाजिक सराेकार दिखते हैं और न ही व्यवस्था का उल्लंघन करने वालों पर कोई बंदिश नजर आती है।
सब पैसे का खेल, पैसे दो और भीतर के एक पेज पर कुछ भी छपवाओ, भले ही वो कानूनन सही है या गलत। क्या इस पेज पर एक वैधानिक सूचना छापनेभर से ही मीडिया की भूमिका खत्म हो जाती है।
आइये मेल और फीमेल फ्रैंड्स बनाने के एक विज्ञापन पर नजर डालते हैं। यहां बाकायदा फोन नंबर देकर दोस्त बनाने का काम किया जा रहा है। इस तरह की दोस्ती के लिए गुड लुकिंग होना जरूरी है। पार्ट टाइम बताते हुए पर मीटिंग एक मोटी रकम मिलने की बात कही गई है।
ऐसे ही तमाम विज्ञापन अखबारों में छपे होते हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति इसको किस रूप में ले, क्या यह विज्ञापन युवाओं को किसी ऐसे कार्य के लिए प्रेरित नहीं करता, जो समाज की मुख्यधारा से हटकर गर्त में ले जाता है। क्या इसको कानून के दायरे में बताया जा सकता है।
सवाल उठता है कि इस तरह के विज्ञापनों को सामाजिक सराेकारों का दावा करने वाले अखबार अपने यहां जगह क्यों दे रहे हैं।
अंधविश्वास से जुड़े विज्ञापनों की संख्या भी कम नहीं होती, इस पेज पर। घर बैठे प्रेम विवाह, जादू टोना, वशीकरण, दुश्मन से छुटकारा जैसे काम करने का दावा करने वाले लोगों को प्रचार देने का काम भी ये अखबार कर रहे हैं।
वहीं दूसरी तरह जादू टोने और तंत्र के नाम पर होने वाले अपराध की खबरें भी इन्हीं अखबारों में पेश होती हैं। क्या यह दोहरापन नहीं है। क्या खुद काे समाज से जुडा बताने वाले मीडिया को इस तरह के विज्ञापनों को हतोत्साहित नहीं करना चाहिए।
मेरे दिल और दिमाग को इस दोहरेपन ने कौंध दिया था, इसलिए मैंने इसको लिख दिया। अब यह निर्णय आपको करना है, मैंने यह सही किया है या नहीं। मैं सही हूं या गलत। अगर मैं गलत हूं तो इस तरह विज्ञापनों को समाज और कानून के दायरे में रहते हुए कैसे सही ठहराया जा सकता है, कृपया बताना होगा।

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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

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