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बसंतकालीन गन्ना बुवाई का समय चल रहा है, जानिए कैसे होगी अच्छी पैदावार

उत्तराखंड में गन्ने की खेती का क्षेत्रफल लगभग एक लाख हेक्टेयर रहता है

  • डॉ. संजय कुमार
  • लेखक वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक हैं और कृषि विज्ञान केंद्र, ढकरानी, देहरादून में सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

त्तराखंड राज्य में गन्ने की खेती का क्षेत्रफल लगभग एक लाख हेक्टेयर रहता है, जिसमें 90 हजार हेक्टेयर में गन्ने की व्यवसाय खेती एवं लगभग आठ से दस हजार हेक्टेयर में अन्य उपयोग के लिए खेती की जाती है। यदि पिछले तीन-चार वर्षों की बात करें तो गन्ने की खेती में किसानों का रुझान और अधिक हुआ है तथा प्रति इकाई क्षेत्रफल में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के साथ-साथ में राज्य की औसत उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 829 कुंतल प्राप्त हुई है, इसका श्रेय किसानों की मेहनत एवं नीति निर्धारक निवेश उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं तथा वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयास को जाता है, हालांकि गन्ने से और अधिक उत्पादकता प्राप्त किए जाने की संभावनाएं हैं, जिसके लिए किसानों को नए-नए आयामों, तरीकों तथा कृषि निवेश का प्रयोग करते हुए उत्पादन लागत को कम करके मुनाफा बढ़ाना चाहिए।

यह सर्वविदित है कि फसल से भरपूर उत्पादन तभी मिल पाता है, जब प्रति इकाई क्षेत्रफल में उपज देने वाले पौधों की संख्या पर्याप्त रहे तथा प्रति पौधा अधिक उपज उपलब्ध हो सके, इसके लिए फसल प्रबंधन खेत की तैयारी से ही शुरू हो जाता है। गन्ने की फसल वैसे भी अन्य फसलों से भिन्न है, क्योंकि एक बार बुवाई करने पर गन्ने की फसल कम से कम दो वर्ष तथा अन्य परिस्थितियों में और अधिक समय तक खेत में खड़ी रहती है। अतः इसकी बुवाई करने के लिए विशेष प्रकार की पद्धतियां तथा खेत की तैयारी इस बात पर निर्भर करती है कि फसल का अंकुरण कैसा हो, बढ़वार कैसी हो तथा गन्ने में ऊपरी हिस्से में अधिक वजन होने के साथ-साथ गिरने की भी प्रवृत्ति होती है। अतः खेत की तैयारियां बुवाई की विधि इस प्रकार की जाएगी, जिसमें फसल की बढ़वार होते समय गन्ने गिरने की समस्या बिल्कुल ना हो। इसी के लिए खेत की तैयारी बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है।

गन्ने की बुवाई हेतु खेत की तैयारी करने के मुख्य उद्देश्य:

  • पहली फसल के अवशेषों, जड़ तना एवं अन्य फसल अवशेषों को नष्ट करना तथा भूमि में मिलाना।
  • भूमि में जल धारण क्षमता बढ़ाने के लिए मिट्टी को इस प्रकार से तैयार करना कि वह अधिक जल संचित कर सके।
  • बुवाई के समय क्यारियां मुलायम व मिट्टी इस प्रकार हो कि बीज का अंकुरण भली प्रकार हो सके तथा गहरे कुंड निकाले जा सके।
  • भूमिगत कीटों व रोग फैलाने वाले रोग कारक जीवों को नष्ट करना।
  • गन्ना बुवाई के लिए खेत को समतल करने में मिट्टी को भुरभुरी बनाना।
  • गन्ना फसल के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरकों को भूमि में खेत की तैयारी के समय उपयोग करने में मदद।
  • खेत में क्यारियां अथवा पट्टे बनाना, जिससे सिंचाई करते समय खेत की देखरेख करते समय आसानी रहे।

गन्ने की खेती को किसान भाई कई मौसम में करते हैं। बसंतकालीन गन्ना बुवाई मध्य फरवरी से लेकर मध्य मार्च तक करने का समय उत्तम रहता है, जो किसान भाई गन्ने की खेती गेहूं की कटाई के बाद करते हैं, उसी को ग्रीष्मकालीन बुवाई कहा जाता है। अतः बुवाई के समय के अनुसार ही खेत की तैयारी किया जाना लाभकारी एवं हितकर रहता है।

इस तरह करें गन्ने की फसल बुवाई

बसंतकालीन बुवाई के लिए खेत में जो भी पहली फसल के जड़ तना व अन्य अवशेष को जुताई करके भूमि में मिला देना चाहिए, जिससे वह समय से गल जाएं। बड़ी जड़ें अथवा तनों को नहीं गलने की स्थिति में खेत से बाहर निकालकर कंपोस्ट के गड्ढे में डाल देना चाहिए। जिन खेतों में पहली फसल के अधिक अवशेष जड़ तना इत्यादि या खरपतवार दिखाई दें. वहां पर ट्रैक्टर से चलने वाले रोटावेटर द्वारा जुताई कर देने से इन फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन किया जा सकता है। यहां तक की गोबर की खाद अथवा गन्ने की मैली को संयुक्त रूप से प्रयोग करने पर रोटावेटर द्वारा भली प्रकार मिट्टी के कणों के साथ मिलाया जा सकता है।


खेत की जुताई काफी गहराई पर करनी चाहिए, इसके लिए मिट्टी पलट हल अथवा डिस्क पलाव का प्रयोग करना चाहिए। जुताई इस प्रकार करें की मिट्टी में लगने वाला हल लगभग 20 से 25 सेंटीमीटर की गहराई पर जुताई करें। इस प्रकार जुताई करने से मिट्टी मुलायम एवं अच्छी प्राप्त होगी, जिससे भूमि में वायु एवं जल का संचार भी भली प्रकार होगा। इससे फसल में जमाव एवं फसल का स्थिरीकरण अच्छा हो जाता है। साथ ही साथ. जहां पर धान एवं गेहूं का फसल चक्र अपनाया जा रहा है, यदि वहां पर गन्ने की खेती की जाती है तो धान के खेत में नीचे की सतह काफी खड़ी हो जाती है, उसको भी गहरी जुताई अथवा सब सॉयलर हल से तोड़ा जा सकता है। यह एक ट्रैक्टर से चलने वाला यंत्र होता है, जिसमें केवल एक फाल लगा होता है और यह भूमि में आधा मीटर से लेकर 75 सेंटीमीटर तक गहराई में भूमि को खोल देता है। इससे भूमि में जलधारण क्षमता बढ़ जाती है तथा फसल की जड़ें अधिक गहराई तक जा सकती हैं, जो फसल को गिरने नहीं देतीं।


गहरी जुताई के बाद दो तीन बार डिस्क हैरो से खेत को बारीक एवं मुलायम कर लिया जाता है तथा फाटा लगाकर समतलीकरण का कार्य अवश्य करना चाहिए। खेत को समतल करने का उद्देश्य यह है कि जो भी सिंचाई इत्यादि का कार्य किया जाए, उसमें एक समान नमी का स्तर बना रहे तथा पानी की कम मात्रा प्रयोग करने पर अधिक क्षेत्रफल की सिंचाई की जा सके।


समतलीकरण का कार्य करने के पश्चात फसल में उपयोग की जाने वाले उर्वरकों की उपयोग दक्षता में 25 से 30 फीसदी सुधार हो जाता है। उपलब्ध संसाधनों के आधार पर खेत की तैयारी करते समय लेजर लैंड लेवलर यंत्र का प्रयोग करते हुए बहुत सटीक समतलीकरण का कार्य कर सकते हैं।


इस प्रकार समतलीकरण के बाद यदि सामान्य विधि से बुवाई करनी हो तो प्रति बीघा क्षेत्रफल में 30 से 40 कुंतल कंपोस्ट, जिसमें गोबर की खाद एवं गन्ने की मैली अथवा प्रेसमड बराबर बराबर मात्रा में मिली हो, का प्रयोग करना चाहिए। इसको बराबर मात्रा में खेत में बिखेर कर पिलर अथवा भैरव चलाकर भूमि में मिला देना आवश्यक रहता है।


खाद एवं उर्वरक की मात्रा का निर्धारण करने के लिए समय रहते पहली फसल की कटाई करने के तुरंत बाद खेत से मिट्टी का नमूना लेकर मृदा स्वास्थ्य जांच की प्रयोगशाला में भेज कर भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों का स्तर ज्ञात कर लेना चाहिए। यदि पोषक तत्वों का स्तर मध्यम हो तो गन्ने की बुवाई के लिए प्रति बीघा क्षेत्रफल में 15 किलोग्राम एपीके अथवा 12 किलोग्राम डाई अमोनियम फास्फेट, दो किलोग्राम जिंक सल्फेट, दो किलोग्राम गंधक एवं 5 किलोग्राम यूरिया गन्ना बुवाई करते समय पंक्तियों में देना चाहिए।


खेत की तैयारी करते समय यह अवश्य ध्यान रहे, जिन क्षेत्रों में कुरमुला कीट, जड़ की सूंडी अथवा दीमक की समस्या पाई जाती हो, वहां पर अंतिम जुताई करते समय कीटनाशक जैसे क्लोरपीरिफॉस 20 फीसदी, ईसी की 6 लीटर मात्रा अथवा इमिडाक्लोप्रिड 17.8 फीसदी की 2 लीटर मात्रा को 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर खेत में छिड़काव करने के पश्चात जुताई कर लेनी चाहिए। यदि ऐसा संभव ना हो तो बुवाई करते समय भी इसका प्रयोग गन्ने के टुकड़ों के ऊपर करके मिट्टी को ढंका जाना उत्तम माना जाता है। इन रसायनों के अभाव में फिपरोनिल  3 फीसदी की 20 किलोग्राम मात्रा को खेत में प्रयोग करें।


बुवाई करते समय खेत में नमी का स्तर बहुत अच्छा होना चाहिए, इसके लिए बुवाई करने से पूर्व पलेवा लगा लेना अच्छा रहता है। यदि भूमि में पर्याप्त नमी हो तो पलेवा करने की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि इस बार बारिश होने की अवस्था में खेतों में अच्छी नमी है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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