By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Reading: किस्से मीडिया केः कुछ लोग अपने हित के लिए रिपोर्टर्स को बना देते हैं प्रतिद्वंद्वी
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
Font ResizerAa
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
NEWSLIVE24x7 > Blog > Blog Live > किस्से मीडिया केः कुछ लोग अपने हित के लिए रिपोर्टर्स को बना देते हैं प्रतिद्वंद्वी
Blog LiveFeatured

किस्से मीडिया केः कुछ लोग अपने हित के लिए रिपोर्टर्स को बना देते हैं प्रतिद्वंद्वी

Rajesh Pandey
Last updated: August 1, 2021 7:37 pm
Rajesh Pandey
5 years ago
Share
SHARE

अखबारों के दफ्तरों में बहुत सारी सूचनाओं को गोपनीय रखना होता है। मैं कुछ एक्सक्लूसिव खबरों की बात कर रहा हूं। जिस दिन रिपोर्टर के पास कोई एक्सक्लूसिव खबर होती है, वो पूरे उत्साह में रहते हैं।

बायलाइन और एक्सक्लूसिव के टैग के साथ खबर प्रकाशित होने पर उनको बहुत खुशी मिलती है। यह खबर संपादक की जानकारी में भी प्रमुखता से लाई जाती है। खबर को और पुष्ट बनाने के लिए रिपोर्टर से कुछ अतिरिक्त फैक्ट मांगे जा सकते हैं।

पर,एक्सक्लूसिव खबर उनको ही माना जाना चाहिए, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए महत्वपूर्ण सूचना हो या उनके हितों को प्रभावित करती हो। अगले दिन कोई असर दिखाने वाली हो। कोई बड़ा खुलासा करने वाली हो। रूटीन की ऐसी खबर, जो दूसरे अखबारों के पास न हो। यह दावा तो रिपोर्टर ही कर सकते हैं।

हालांकि, सोशल मीडिया पर खबरों के लगातार फ्लो तथा सूचनाएं प्रसारित करने वाले बहुत से स्रोतों को ध्यान में रखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी खबर मुश्किल से ही एक्सक्लूसिव होगी।

डेस्क भी एक्सक्लूसिव बताए जाने वाली खबरों को बेहतर स्थान देने का प्रयास करती है। इनको अक्सर प्राइम पेजों पर लीड, बॉटम या फ्लायर लगाया जाता है। नहीं तो सेकेंड लीड तय है। कभी कभार जिस खबर को एक्सक्लूसिव कहकर मेहनत और प्लानिंग की जाती है, उसको दूसरे दिन किसी और अखबार में भी छपा हुआ पाओगे तो क्या कहोगे, भले ही दूसरे अखबार में ज्यादा फैक्ट न हों। ऐसी स्थिति में रिपोर्टर को डिफेंसिव होना पड़ेगा और डेस्क व वरिष्ठ अधिकारी उनसे इस संबंध में पूछ सकते हैं।

ऐसा क्यों होता है कि आपकी एक्सक्लूसिव खबर दूसरे अखबार में भी दिखती है। इसकी दो वजह हो सकती हैं, पहली यह कि हर अखबार के रिपोर्टर पूरी सजगता से खबरों के लिए ही दौड़ भाग करते हैं। वो अपनी बीट के स्रोतों के संपर्क में रहते हैं। इसलिए उनको भी यह खबर मिल जाती है।

यह सत्य बात है कि किसी भी विभाग, संस्थान या व्यक्तियों के समूह या व्यक्ति, जिनका नियमित रूप से खबरों से वास्ता रहता है, मीडिया से अच्छे संबंध बनाने की पहल करते हैं। वो सूचनाएं देने में फर्क नहीं करते। पर, कभीकभार किसी एक ही अखबार में ही एक्सक्लूसिव खबर होती है यानि किसी एक रिपोर्टर को ही खास खबर देते हैं, इसकी वजह पर चर्चा करते हैं।

यहां, अगर किसी मीडिया कर्मी से किसी कर्मचारी या अधिकारी का कोई मतभेद होता भी है, तो वो अधिकतर बार केवल वैचारिक हो सकता है। व्यक्तिगत मतभेद बहुत कम होता है।

हां, यह हो सकता है कि कोई अधिकारी या कर्मचारी किसी मीडिया कर्मी को ज्यादा अच्छा मानते हों या किसी से ज्यादा वास्ता नहीं रखते हों। यह राय संबंधित अखबार या रिपोर्टर की खबरों को लेकर भी बनती है। लेकिन, सामान्य सूचनाओं को मीडिया से जरूर साझा किया जाता है।

कई बार मीडिया कर्मियों के अपनी बीट से संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और राजनेताओं से एक दूसरे के प्रति सम्मान और अच्छे व्यवहार की वजह से व्यक्तिगत संबंध भी बन जाते हैं।

इस पर उनको अपनी बीट की खास खबरें मिलती रहती हैं। अधिकारी या कर्मचारी या राजनेता या कोई व्यक्ति या संगठन या संस्था के पदाधिकारी या कोई और आपको खबरों देते हैं।

ये सूचनाएं तब तक तो ठीक हैं, जब तक ये सकारात्मक रूप से व्यापक जनहित पर फोकस करती हैं, लेकिन कई बार खबरें देने या बताने वाले कुछ लोग, रिपोर्टर को अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

राजनीति की खबरों में ऐसा अक्सर होता है। माफ करना ! राजनीति में भितरघात की जो बात कही जाती है, वहां अधिकतर बार रिपोर्टर को ही इस्तेमाल किया जाता है।

ऐसा भी हो जाता है कि अपनी बीट में रिपोर्टर किसी एक पक्ष के पाले में दिखाई देता है। यह जानकारी भी दे दूं कि कुछ रिपोर्टर को खबरों में बैलेंस होने के बाद भी एक पक्षीय करार दिया जाता है। ऐसा कहने वाले लोग मीडिया से भी जुड़े होते हैं।

इनमें प्रतिद्वंद्वी अखबार से जुड़े लोग हो सकते हैं या फिर आपके दफ्तर में बैठने वाले भी। हो सकता है कि कुछ दफ्तरों में ऐसा नहीं होता हो, पर कई जगह ऐसा ही होता है।

मैं यह बात दावे के साथ, इसलिए भी कह सकता हूं, क्योंकि मैं भी इस दौर से गुजरा हूं, पर राजनीति की खबरों में नहीं। मुझ पर तो कुछ लोगों ने आरोप भी लगाए, पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं सही था और आज भी हूं, क्योंकि मैं ईश्वर में आस्था रखता हूं और मैंने वहीं किया जो ईश्वर की नजर में सही है।

ऐसा भी होता है कि प्रतिद्वंद्वी अखबारों का रिपोर्टर किसी अधिकारी या कर्मचारी या राजनेता या किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह या संगठन य़ा संस्था की पसंद या नापसंद हो सकते है। यह पसंद या नापसंद अखबार पर दिखती है।

एक अखबार किसी मामले में जहां किसी पक्ष पर ऑफेंसिव दिखता है, वहीं उसी मामले में उसका प्रतिद्वंद्वी उसी पक्ष के लिए डिफेंसिव जैसा व्यवहार करता है। यह सब रिपोर्टर्स के अपने अपने संबंधों पर निर्भर करता है।

मैं ऐसा कतई नहीं कह रहा कि अखबारों में खबरें बैलेंस नहीं होतीं। अखबारों की डेस्क संपादन में अधिकतर खबरों को बैलेंस करती हैं। ऐसा करना भी चाहिए, क्योंकि किसी भी प्रतिष्ठित अखबार से उसके पाठक यही अपेक्षा करते हैं।

हालांकि डेस्क पर समीक्षा के दौरान खबर के बैलेंस होने या नहीं होने का पता चल जाता है। राजनीति की खबरों में तो कई बार बड़े अधिकारियों के मौखिक निर्देशों का असर दिखता है।

कुछेक मौकों पर खबर पर उसको लिखने वाले की राजनीतिक विचारधारा भी प्रभावी रूप से काम करती है। मैं यह बात पहली बार नहीं कह रहा हूं, आप सूचना माध्यमों के बारे में अक्सर ऐसा सुनते रहे हैं।

कुल मिलाकर, एक्सक्लूसिव खबर मिलने की पहली वजह किसी रिपोर्टर का अपने बीट में उन लोगों से अच्छा व्यवहार होना भी है, जिनके पास ही खास सूचनाएं होती हैं या उनके माध्यम से ही खबरें बाहर निकल सकती हैं। या यूं कहें कि वो इस तरह की खबरें देने के लिए अधिकृत हैं। इनके पास खबरों को सार्वजनिक करने का अधिकार है।

वहीं प्रतिद्वंद्वी अखबार के रिपोर्टर को इस तरह की खबरें समय पर नहीं मिल पातीं या फिर उनको इन खबरों के लिए काफी प्रयास करने पड़ते हैं।

कई बार छोटे शहरों या कस्बों में खबरों को लेकर रिपोर्टर्स की व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत में भी बदल जाती है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। इसको बढ़ाने में उन लोगों की भूमिका होती है, जो रिपोर्टर्स को केवल अपने हित की खबरों के लिए ही इस्तेमाल करते हैं।

ये लोग एक ही अखबार में काम करने वाले लोगों को भी एक दूसरे का विरोधी बना देते हैं। हालांकि इन लोगों की संख्या बहुत कम होती है, पर इनको सब जानते हैं।

वैसे, यह बात बिल्कुल सही है कि अपने हित के लिए कुछ रिपोर्टर्स को इस्तेमाल करने वाले किसी के नहीं होते। ये सार्वजनिक रूप से सभी से इस तरह व्यवहार करते हैं, मानो इनसे बड़ा शुभचिंतक कोई नहीं है।

ये प्रतिद्वंद्वी अखबारों के कुछ रिपोर्टर्स के बीच मनभेद पैदा करने के बाद भी उनके हितैषी होने का नाटक इसलिए करते हैं, क्योंकि इनको तो सभी अखबारों में अपने लिए जगह बनानी है। इसलिए रिपोर्टर के लिए यह बहुत जरूरी है कि वो उन्हीं तथ्यों पर विश्वास करें, जो उनके पास हैं। कही-सुनाई बातों पर तो कतई विश्वास न किया जाए।

मैं यह भी बताना चाहूंगा कि अखबारों की व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता के बाद भी उनके अधिकतर रिपोर्टर अपनी बीट में मुलाकात के समय एक दूसरे से दोस्तों सा व्यवहार करते हैं।

दोस्ती होने के बाद भी वो अपने दफ्तर की किसी सूचना या अपनी खास खबरों को साझा नहीं करते। वैसे खास खबरों को छोड़कर रूटीन की कुछ खबरें अखबारों के रिपोर्टर आपसी तालमेल और सौहार्द्र पर डिस्कस कर लेते हैं। प्रतिद्वंद्विता उन्हीं के बीच होती है, जिनको इस्तेमाल किया जा रहा होता है।

किसी एक्सक्लूसिव खबर के दूसरे अखबार में होने की दूसरी वजह पर भी बात करते हैं। यहां मैं उस एक्सक्लूसिव खबर की बात कर रहा हूं, जिसमें फैक्ट बहुत ज्यादा नहीं होते। इसका कारण कभी कभी किसी रिपोर्टर के संबंधित खबर को गंभीरता से नहीं लेना भी हो सकता है। इसलिए वो केवल खबर के सतही फैक्ट पर ही काम करते हैं।

इसलिए वो अपने लेवल पर खबर को एक्सक्लूसिव होते हुए भी वैसा प्रदर्शित नहीं कर पाते। ऐसा वर्क प्रेशर की वजह से भी हो सकता है।

वहीं कुछेक बार अखबारों के दफ्तरों से भी खास खबर की सूचना लीक हो सकती है। लीकेज से मिली सूचना पर प्रतिद्वंद्वी काम करते हैं, पर समय की कमी या संबंधित की पुष्टि नहीं होने की वजह से उनकी खबरें ज्यादा प्रभावी नहीं बन पातीं।

सूचनाएं कौन लीक करते हैं और किनकी खबरों को लीक करते हैं, यह भी सवाल है। एक ही अखबार में साथ काम करने वाले भी एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं। कुछेक मौकों पर दफ्तरों में इसके प्रमाण मिलते रहे हैं। इस वजह से सूचनाएं लीक की जाती हैं।

मेरे कुछ साथियों ने खबरों की लीकेज को झेला था। उनके साथ तो ऐसा हुआ कि वो खबर लिखने बैठे और कुछ ही देर में संबंधित अधिकारी का फोन आ गया। आपके रिपोर्टर क्या यह खबर लेकर आए हैं। अभी भी ऐसे हालात हो सकते हैं….। यह मेरा अनुभव है… जो महसूस किया, वो बता दिया।

Keywords:- Newspaper Printing, Layout of a newspaper, Print Media, Social Media, History of Journalism, Ethics of Reporting, Editing checklist, Editorial and Management in News paper, What is caricature, Internet Journalism, Web Journalism, Circulation, Heading of News, Heading of Article, अखबार और सोशल मीडिया, क्या सोशल मीडिया खबरों के स्रोत हैं, पत्रकारिता में सोशल मीडिया का योगदान, अखबारों में ग्राफिक डिजाइनिंग, संपादक के कार्य, रिपोर्टिंग के नियम, खबरों के हेडिंग कैसे हों

Contents
अखबारों के दफ्तरों में बहुत सारी सूचनाओं को गोपनीय रखना होता है। मैं कुछ एक्सक्लूसिव खबरों की बात कर रहा हूं। जिस दिन रिपोर्टर के पास कोई एक्सक्लूसिव खबर होती है, वो पूरे उत्साह में रहते हैं।बायलाइन और एक्सक्लूसिव के टैग के साथ खबर प्रकाशित होने पर उनको बहुत खुशी मिलती है। यह खबर संपादक की जानकारी में भी प्रमुखता से लाई जाती है। खबर को और पुष्ट बनाने के लिए रिपोर्टर से कुछ अतिरिक्त फैक्ट मांगे जा सकते हैं।पर,एक्सक्लूसिव खबर उनको ही माना जाना चाहिए, जो ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए महत्वपूर्ण सूचना हो या उनके हितों को प्रभावित करती हो। अगले दिन कोई असर दिखाने वाली हो। कोई बड़ा खुलासा करने वाली हो। रूटीन की ऐसी खबर, जो दूसरे अखबारों के पास न हो। यह दावा तो रिपोर्टर ही कर सकते हैं।हालांकि, सोशल मीडिया पर खबरों के लगातार फ्लो तथा सूचनाएं प्रसारित करने वाले बहुत से स्रोतों को ध्यान में रखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि कोई भी खबर मुश्किल से ही एक्सक्लूसिव होगी।डेस्क भी एक्सक्लूसिव बताए जाने वाली खबरों को बेहतर स्थान देने का प्रयास करती है। इनको अक्सर प्राइम पेजों पर लीड, बॉटम या फ्लायर लगाया जाता है। नहीं तो सेकेंड लीड तय है। कभी कभार जिस खबर को एक्सक्लूसिव कहकर मेहनत और प्लानिंग की जाती है, उसको दूसरे दिन किसी और अखबार में भी छपा हुआ पाओगे तो क्या कहोगे, भले ही दूसरे अखबार में ज्यादा फैक्ट न हों। ऐसी स्थिति में रिपोर्टर को डिफेंसिव होना पड़ेगा और डेस्क व वरिष्ठ अधिकारी उनसे इस संबंध में पूछ सकते हैं।ऐसा क्यों होता है कि आपकी एक्सक्लूसिव खबर दूसरे अखबार में भी दिखती है। इसकी दो वजह हो सकती हैं, पहली यह कि हर अखबार के रिपोर्टर पूरी सजगता से खबरों के लिए ही दौड़ भाग करते हैं। वो अपनी बीट के स्रोतों के संपर्क में रहते हैं। इसलिए उनको भी यह खबर मिल जाती है।यह सत्य बात है कि किसी भी विभाग, संस्थान या व्यक्तियों के समूह या व्यक्ति, जिनका नियमित रूप से खबरों से वास्ता रहता है, मीडिया से अच्छे संबंध बनाने की पहल करते हैं। वो सूचनाएं देने में फर्क नहीं करते। पर, कभीकभार किसी एक ही अखबार में ही एक्सक्लूसिव खबर होती है यानि किसी एक रिपोर्टर को ही खास खबर देते हैं, इसकी वजह पर चर्चा करते हैं।यहां, अगर किसी मीडिया कर्मी से किसी कर्मचारी या अधिकारी का कोई मतभेद होता भी है, तो वो अधिकतर बार केवल वैचारिक हो सकता है। व्यक्तिगत मतभेद बहुत कम होता है।हां, यह हो सकता है कि कोई अधिकारी या कर्मचारी किसी मीडिया कर्मी को ज्यादा अच्छा मानते हों या किसी से ज्यादा वास्ता नहीं रखते हों। यह राय संबंधित अखबार या रिपोर्टर की खबरों को लेकर भी बनती है। लेकिन, सामान्य सूचनाओं को मीडिया से जरूर साझा किया जाता है।कई बार मीडिया कर्मियों के अपनी बीट से संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और राजनेताओं से एक दूसरे के प्रति सम्मान और अच्छे व्यवहार की वजह से व्यक्तिगत संबंध भी बन जाते हैं।इस पर उनको अपनी बीट की खास खबरें मिलती रहती हैं। अधिकारी या कर्मचारी या राजनेता या कोई व्यक्ति या संगठन या संस्था के पदाधिकारी या कोई और आपको खबरों देते हैं।ये सूचनाएं तब तक तो ठीक हैं, जब तक ये सकारात्मक रूप से व्यापक जनहित पर फोकस करती हैं, लेकिन कई बार खबरें देने या बताने वाले कुछ लोग, रिपोर्टर को अपने प्रतिद्वंद्वियों के लिए इस्तेमाल करते हैं।राजनीति की खबरों में ऐसा अक्सर होता है। माफ करना ! राजनीति में भितरघात की जो बात कही जाती है, वहां अधिकतर बार रिपोर्टर को ही इस्तेमाल किया जाता है।ऐसा भी हो जाता है कि अपनी बीट में रिपोर्टर किसी एक पक्ष के पाले में दिखाई देता है। यह जानकारी भी दे दूं कि कुछ रिपोर्टर को खबरों में बैलेंस होने के बाद भी एक पक्षीय करार दिया जाता है। ऐसा कहने वाले लोग मीडिया से भी जुड़े होते हैं।इनमें प्रतिद्वंद्वी अखबार से जुड़े लोग हो सकते हैं या फिर आपके दफ्तर में बैठने वाले भी। हो सकता है कि कुछ दफ्तरों में ऐसा नहीं होता हो, पर कई जगह ऐसा ही होता है।मैं यह बात दावे के साथ, इसलिए भी कह सकता हूं, क्योंकि मैं भी इस दौर से गुजरा हूं, पर राजनीति की खबरों में नहीं। मुझ पर तो कुछ लोगों ने आरोप भी लगाए, पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मैं सही था और आज भी हूं, क्योंकि मैं ईश्वर में आस्था रखता हूं और मैंने वहीं किया जो ईश्वर की नजर में सही है।ऐसा भी होता है कि प्रतिद्वंद्वी अखबारों का रिपोर्टर किसी अधिकारी या कर्मचारी या राजनेता या किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह या संगठन य़ा संस्था की पसंद या नापसंद हो सकते है। यह पसंद या नापसंद अखबार पर दिखती है।एक अखबार किसी मामले में जहां किसी पक्ष पर ऑफेंसिव दिखता है, वहीं उसी मामले में उसका प्रतिद्वंद्वी उसी पक्ष के लिए डिफेंसिव जैसा व्यवहार करता है। यह सब रिपोर्टर्स के अपने अपने संबंधों पर निर्भर करता है।मैं ऐसा कतई नहीं कह रहा कि अखबारों में खबरें बैलेंस नहीं होतीं। अखबारों की डेस्क संपादन में अधिकतर खबरों को बैलेंस करती हैं। ऐसा करना भी चाहिए, क्योंकि किसी भी प्रतिष्ठित अखबार से उसके पाठक यही अपेक्षा करते हैं।हालांकि डेस्क पर समीक्षा के दौरान खबर के बैलेंस होने या नहीं होने का पता चल जाता है। राजनीति की खबरों में तो कई बार बड़े अधिकारियों के मौखिक निर्देशों का असर दिखता है।कुछेक मौकों पर खबर पर उसको लिखने वाले की राजनीतिक विचारधारा भी प्रभावी रूप से काम करती है। मैं यह बात पहली बार नहीं कह रहा हूं, आप सूचना माध्यमों के बारे में अक्सर ऐसा सुनते रहे हैं।कुल मिलाकर, एक्सक्लूसिव खबर मिलने की पहली वजह किसी रिपोर्टर का अपने बीट में उन लोगों से अच्छा व्यवहार होना भी है, जिनके पास ही खास सूचनाएं होती हैं या उनके माध्यम से ही खबरें बाहर निकल सकती हैं। या यूं कहें कि वो इस तरह की खबरें देने के लिए अधिकृत हैं। इनके पास खबरों को सार्वजनिक करने का अधिकार है।वहीं प्रतिद्वंद्वी अखबार के रिपोर्टर को इस तरह की खबरें समय पर नहीं मिल पातीं या फिर उनको इन खबरों के लिए काफी प्रयास करने पड़ते हैं।कई बार छोटे शहरों या कस्बों में खबरों को लेकर रिपोर्टर्स की व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत में भी बदल जाती है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। इसको बढ़ाने में उन लोगों की भूमिका होती है, जो रिपोर्टर्स को केवल अपने हित की खबरों के लिए ही इस्तेमाल करते हैं।ये लोग एक ही अखबार में काम करने वाले लोगों को भी एक दूसरे का विरोधी बना देते हैं। हालांकि इन लोगों की संख्या बहुत कम होती है, पर इनको सब जानते हैं।वैसे, यह बात बिल्कुल सही है कि अपने हित के लिए कुछ रिपोर्टर्स को इस्तेमाल करने वाले किसी के नहीं होते। ये सार्वजनिक रूप से सभी से इस तरह व्यवहार करते हैं, मानो इनसे बड़ा शुभचिंतक कोई नहीं है।ये प्रतिद्वंद्वी अखबारों के कुछ रिपोर्टर्स के बीच मनभेद पैदा करने के बाद भी उनके हितैषी होने का नाटक इसलिए करते हैं, क्योंकि इनको तो सभी अखबारों में अपने लिए जगह बनानी है। इसलिए रिपोर्टर के लिए यह बहुत जरूरी है कि वो उन्हीं तथ्यों पर विश्वास करें, जो उनके पास हैं। कही-सुनाई बातों पर तो कतई विश्वास न किया जाए।मैं यह भी बताना चाहूंगा कि अखबारों की व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता के बाद भी उनके अधिकतर रिपोर्टर अपनी बीट में मुलाकात के समय एक दूसरे से दोस्तों सा व्यवहार करते हैं।दोस्ती होने के बाद भी वो अपने दफ्तर की किसी सूचना या अपनी खास खबरों को साझा नहीं करते। वैसे खास खबरों को छोड़कर रूटीन की कुछ खबरें अखबारों के रिपोर्टर आपसी तालमेल और सौहार्द्र पर डिस्कस कर लेते हैं। प्रतिद्वंद्विता उन्हीं के बीच होती है, जिनको इस्तेमाल किया जा रहा होता है।किसी एक्सक्लूसिव खबर के दूसरे अखबार में होने की दूसरी वजह पर भी बात करते हैं। यहां मैं उस एक्सक्लूसिव खबर की बात कर रहा हूं, जिसमें फैक्ट बहुत ज्यादा नहीं होते। इसका कारण कभी कभी किसी रिपोर्टर के संबंधित खबर को गंभीरता से नहीं लेना भी हो सकता है। इसलिए वो केवल खबर के सतही फैक्ट पर ही काम करते हैं।इसलिए वो अपने लेवल पर खबर को एक्सक्लूसिव होते हुए भी वैसा प्रदर्शित नहीं कर पाते। ऐसा वर्क प्रेशर की वजह से भी हो सकता है।वहीं कुछेक बार अखबारों के दफ्तरों से भी खास खबर की सूचना लीक हो सकती है। लीकेज से मिली सूचना पर प्रतिद्वंद्वी काम करते हैं, पर समय की कमी या संबंधित की पुष्टि नहीं होने की वजह से उनकी खबरें ज्यादा प्रभावी नहीं बन पातीं।सूचनाएं कौन लीक करते हैं और किनकी खबरों को लीक करते हैं, यह भी सवाल है। एक ही अखबार में साथ काम करने वाले भी एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं। कुछेक मौकों पर दफ्तरों में इसके प्रमाण मिलते रहे हैं। इस वजह से सूचनाएं लीक की जाती हैं।मेरे कुछ साथियों ने खबरों की लीकेज को झेला था। उनके साथ तो ऐसा हुआ कि वो खबर लिखने बैठे और कुछ ही देर में संबंधित अधिकारी का फोन आ गया। आपके रिपोर्टर क्या यह खबर लेकर आए हैं। अभी भी ऐसे हालात हो सकते हैं….। यह मेरा अनुभव है… जो महसूस किया, वो बता दिया।

You Might Also Like

कोरोना पर नियंत्रण के मामले में उत्तराखंड तीसरे स्थान पर
तो फिर कौन बचाएगा रिस्पना के उद्गम शिखरफॉल को
आपदा प्रभावित चिफल्डी-2ः पता नहीं कब खत्म होंगी डराने वाली रातें
पुरानी पेंशन बहाली को लेकर उत्तराखंड में 2100 किमी. की यात्रा करेगा मोर्चा
जिलाधिकारी परिस्थितियों के अनुकूल जनसमस्याओं के हल में व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाएंः सीएम
TAGGED:CirculationEditing checklistEditorial and Management in News paperEthics of ReportingHeading of ArticleHeading of NewsHistory of JournalismInternet JournalismLayout of a newspaperNewspaper PrintingPrint Mediasocial mediaWeb JournalismWhat is caricatureअखबार और सोशल मीडियाअखबारों में ग्राफिक डिजाइनिंगक्या सोशल मीडिया खबरों के स्रोत हैंखबरों के हेडिंग कैसे होंपत्रकारिता में सोशल मीडिया का योगदानरिपोर्टिंग के नियमसंपादक के कार्य
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Email Copy Link Print
ByRajesh Pandey
Follow:
newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
Previous Article बागवानी फसलों के लिए नई पॉलीहाउस प्रौद्योगिकी
Next Article ओलंपिक 2020ः बैडमिंटन में पीवी सिंधु ने जीता कांस्य पदक
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun
Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun Doiwala, PIN- 248140
9760097344
© 2026 News Live 24x7| Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?