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पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी सफल हो रही प्राकृतिक खेती

कृषि पाठ्यक्रमों में भी प्राकृतिक खेती का विषय शामिल करने के लिए बनाई समिति ने काम शुरू कियाः तोमर

नई दिल्ली। नीति आयोग की नवोन्वेषी कृषि पर राष्ट्रीय कार्यशाला में गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कहा कि प्राकृतिक खेती में पौधे को पानी नहीं, बल्कि नमी चाहिए होती है। इस पद्धति में पहले साल लगभग 50 प्रतिशत पानी कम लगता है और तीसरे साल तक लगभग सत्तर प्रतिशत पानी की बचत होने लगती है। इस विधा में जीवाणु काफी संख्या में बढ़ते हैं, जो खेती की जान होती है। मृदा में कार्बन की मात्रा भी बढ़ती है, जो मृदा स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है।
राज्यपाल ने कहा, रासायनिक खेती के दुष्परिणाम सबके सामने है, जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी चौबीस प्रतिशत जिम्मेदार है। इसके कारण भूजल भी औसतन हर साल लगभग चार फीट नीचे जाता जा रहा है। उन्होंने उदाहरण सहित बताया कि प्राकृतिक खेती में तीन फसल लेने का प्रयोग भी सफल हुआ है, वहीं पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भी यह पद्धति सफल हो रही है। इस पद्धति का विस्तार होगा तो केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही भारी खाद सब्सिडी की राशि की भी बचत होगी।
उन्होंने कहा, धरती को बंजर होने से बचाने, पानी की बचत करने व पशुधन के उपयोग की दृष्टि से हमें प्राकृतिक खेती को अपनाना ही होगा, जिसके लिए केंद्र सरकार, नीति आयोग तथा अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर देशभर में युद्धस्तर पर अभियान चलाना शुरू किया गया है।
विज्ञान भवन, नई दिल्ली में कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशव्यापी अभियान शुरू किया है और इस दिशा में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण विभाग भी मिशन मोड में कार्य करने जा रहा है।
कृषि संबंधी पाठ्यक्रमों में भी प्राकृतिक खेती का विषय शामिल करने को लेकर बनाई गई समिति ने भी काम शुरू कर दिया है। तोमर ने कहा कि प्राकृतिक खेती के माध्यम से हमारा प्रकृति के साथ तालमेल बढ़ेगा, जिसके कृषि क्षेत्र में- गांवों में ही रोजगार बढ़ने सहित देश को व्यापक फायदे होंगे।
केंद्रीय मंत्री तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का निश्चय किया है। यह हमारी देशी प्राचीन पद्धति ही है, जिसमें खेती की लागत कम आती है और प्राकृतिक संतुलन स्थापित होने से किसानों को फायदा पहुंचता है। प्राकृतिक खेती रसायनमुक्त व पशुधन आधारित है, जिससे लागत में कमी के साथ ही किसानों की आय में वृद्धि व स्थिर पैदावार होगी तथा पर्यावरण व मृदा स्वास्थ्य सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।
उन्होंने बताया कि कृषि मंत्रालय भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) की उप-योजना के माध्यम से किसानों को प्रेरित-प्रोत्साहित कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक खेती का रकबा बढ़ रहा है, जो अभी लगभग चार लाख हेक्टेयर क्षेत्र तक पहुंच चुका है।
कार्यशाला में केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन व डेयरी मंत्री परषोत्तम रूपाला वर्चुअल जुड़े थे। तकनीकी सत्र में  यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी व उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तथा प्रमुख कृषि विशेषज्ञों ने संबोधित किया।
नीति आयोग की वरिष्ठ सलाहकार (कृषि) डॉ. नीलम पटेल ने स्वागत भाषण दिया। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत व सदस्य प्रो. रमेश चंद ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर सफलता की कहानियों (हिंदी व अंग्रेजी) के संग्रह और प्राकृतिक खेती का अभ्यास करने वाले किसानों के वीडियो का विमोचन भी किया गया। आयोग के निवृत्तमान उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार भी उपस्थित थे।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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One Comment

  1. Interesting.Thankfully we had farmers who have set examples on natural farming since ages independently. It’s time the government recognise them and ensure just farm policies.

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