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Video- खाद्य सुरक्षा और पोषण की खेती है बारहनाजा, जड़धारी जी से जानिए

बारहनाजा के आर्थिक महत्व को जानने के लिए समझ विकसित करनी पड़ेगीः विजय जड़धारी

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

”बारहनाजा का मतलब है 12 तरह के अनाज। यह मिश्रित खेती का सिद्धांत है, जिसमें केवल अनाज ही नहीं, बल्कि दलहन, तिलहन, शाक भाजी, रेशे वाले पदार्थों के साथ पशुओं के लिए चारा भी शामिल है। इसमें मनुष्यों के साथ पशुओं के लिए भी भोजन की व्यवस्था है। बारहनाजा में सिर्फ 12 फसलें ही शामिल हों, ऐसा भी नहीं है. इसमें अलग-अलग क्षेत्रों में लगभग 20 तरह के खाद्य पदार्थ शामिल हैं। पर, एक खेत में 20 तरह की फसलें उगाई जाती हों, यह भी संभव नहीं है। अलग-अलग इलाकों में, वहां की भौगोलिक परिस्थितियों और खानपान की संस्कृति के अनुसार कहीं दस-बारह, तो कहीं इससे कम प्रजातियां उगाना बारहनाजा का प्रतीक है। बारहनाजा को समझने के लिए फसल चक्र को समझना होगा।”

बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी ने बीजों एवं खेतीबाड़ी के बारे में विस्तार से चर्चा की और खेती पर लिखी किताबें भेंट कीं। फोटो- मोगली

बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी हमें बारहनाजा के बारे में बता रहे थे। उनका कहना है, बारहनाजा की समृद्ध खेती को परंपरा के नाम पर नहीं, बल्कि इसको खाद्य सुरक्षा, खाद्य सम्प्रभुता,पोषण, पशुपालन, पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे बढ़ाना है। उन्होंने अपनी किताब बारहनाजा में पोषण एवं खाद्य सुरक्षा की खेती पर विस्तार से बात की है। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक के कुछ अंश-

खरीफ के महत्वपूर्ण फसल चक्र के अंतर्गत बारहनाजा मनुष्य की खाद्य सुरक्षा और पोषण के लिए उपयोगी होने के साथ ही, खेती और पशुपालन के संबंध को भी मजबूत करती है। उनका मानना है, एकल फसलें पोषण के साथ-साथ धरती का अत्यधिक शोषण करती हैं। बारहनाजा में शामिल कई खाद्य प्रजातियांं धरती को पोषण वापस करती हैं। ये फसलें मिल जुलकर अपना फसल समाज भी बनाती हैं। धरती के पारिस्थितिकीय संतुलन को मजबूत बनाने वाली यह पद्धति वैज्ञानिक कृषि से कहीं कम नहीं हैं।

बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी ने अपनी पुस्तक बारहनाजा की एक प्रति सामाजिक मुद्दों के पैरोकार मोहित उनियाल को भेंट की। फोटो- मोगली

बारहनाजा खेती की आवश्यकता पर जोर देते हुए जड़धारी जी कहते हैं, ऐसी फसलों का ज्यादा विस्तार होना चाहिए, जो कुदरती तौर पर खनिज, लवण, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन एवं ऊर्जा देती हैं और रोगों से बचाती हैं। लेकिन हरितक्रांति आने के बाद स्वावलंबी जीवनधारा टूटने लगी। वैज्ञानिकों ने उपज बढ़ाने पर जोर दिया, उपज बढ़ी भी, लेकिन यह क्रांति एकल प्रजातियों पर केंद्रित हो गई। बाहर का बीज, रासायनिक खादें, कीटनाशक, खरपतवार नाशक जहरों पर किसान आश्रित हो गए और सदियों से चली आ रही बारहनाजा कृषि पद्धति की जगह एकल सोयाबीन लगाने पर जोर दिया गया। लेकिन उत्तराखंड के अनुभवी किसानों ने एकल प्रजातियों के दुष्प्रभाव से सीख लेकर बारहनाजा की विविधता की तरफ लौटने के प्रयास तेज किए।

मंडुआ है बारहनाजा परिवार का मुखिया

जड़धारी जी बताते हैं, बारहनाजा परिवार का मुखिया मंडुआ है, जिसे कोदा भी कहते हैं। दूसरा नंबर मारसा यानी रामदाना का आता है। बारहनाजा परिवार में 1. मंडुआ या कोदा, 2. मारसा या रामदाना, 3. ओगल (कुट्टू), 4. जोन्याला यानी ज्वार, 5. मक्का, 6. राजमा, 7. गहथ यानी कुलथ, 8. भट्ट यानी पारंपरिक सोयाबीन, 9. रैंयास यानी नौरंगी, 10. उड़द, 11. सुंटा यानी लोबिया, 12. रगड़वांस, 13. गुरुंश, 14. तोर, 15.मूंग, 16. भंगजीर, 17. तिल, 18.जख्या, 19. भांग, 20, सण यानी सन, 21. काखड़ी यानी खीरा शामिल हैं।

सिंचित खेती में ज्यादा विविधता नहीं है, वहां धान, गेहूं, जौ एवं सब्जियों की खेती होती है, जबकि असिंचित भूमि में विविधता युक्त बारहनाजा, झंगोरा, उखड़ी धान, दलहन, तिलहन, मसाले, साग सब्जियां एवं फल-फूल की विविधतापूर्ण खेती होती है। रबी की तुलना में खरीफ में ज्यादा विविधता है।

देहरादून जिला स्थित हल्द्वाड़ी गांव में मंडुआ की खेती। फोटो- राजेश पांडेय
मिट्टी का मोल और खेतों की छुट्टी के दिन

मिट्टी के मोल को समझना होगा, क्योंकि प्रत्येक जीव मिट्टी से पोषण लेता है। बारहनाजा फसल पद्धति विकसित करने वाले किसानों ने मिट्टी के मोल के समझने का प्रयास किया। इसीलिए बारहनाजा के खेतों को फसल कटाई के बाद खाली छोड़ देते हैं। यह फसल और खेतों की छुट्टी के दिन होते हैं। ये छुट्टियां पूरे रबी सीजन की होती हैं यानी अक्तूबर से मार्च तक। पुराने समय में जब लोगों के पास ज्यादा पशु थे तो पूरे शरदकाल में इन खेतों में पशुओं को छोड़ा जाता था। आज भी कई इलाकों में परती भूमि में मौसम के अनुसार गोठ परंपरा में पशुओं को छोड़कर खूब गोबर दिया जाता है। इस तरह भूमि का कुदरती स्वरूप में लौटाने के प्रयास होते हैं।

बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ाने के लिए गोबर का इस्तेमालजड़धारी जी बताते हैं, जब खेत में धूल उड़ने लगे तब बारहनाजा बुआई के लिए सबसे अच्छा मौसम होता है। बारहनाजा में उगने में मंडुआ सबसे आगे है। बोने से पहले बीजों की अलग-अलग तैयारी करनी आवश्यक होती है। मंडुआ के बीजों को बिजुंडे से निकालकर ओखली में मूसल से कूटते हैं। कूटने से पहले मूसल के मुंह को गाय या भैंस के कच्चे गोबर से पोतते हैं। कहा जाता है, इससे बीज मरते नहीं, बल्कि उनके अंकुरण की क्षमता बढ़ जाती है। ओखली में बीज पर इतनी हल्की मूसल चलाते हैं कि बीजों के बाहरी हिस्से की भूसे की परत निकल जाए औऱ बीज सुरक्षित रहे, इसे बीज छड़ना कहते हैं। छड़ने से हल्का भूसा निकलता है, लेकिन अनुभवी किसान इसको सूप से नहीं उड़ाते। इस तैयार बीज के साथ रामदाना के बीज भी मिला दिए जाते हैं।

उनकी पुस्तक बारहनाजा में मंडुवा के बारे में एक कहावत है, मंडुवा का बीज मुट्ठी में भी अंकुरित हो जाता है। इसका मतलब यह है कि मंडुआ बहुत जल्दी अंकुरित होता है। यदि अंकुरित होने के बाद यह पौधा नहीं बनता तो इसके मरने का पूरा पूरा खतरा रहता है।

बारहनाजा से बदली आर्थिकी, जापान ने खरीदा उत्तराखंड का मंडुआ

विजय जड़धारी बारहनाजा के आर्थिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनका कहना है, बारहनाजा के आर्थिक महत्व को जानने के लिए समझ विकसित करनी पड़ेगी। बारहनाजा के साथ पैदा होने वाले कुछ अनाज केवल पहाड़ों में ही होते हैं और कुछ सामान्य अनाज पूरे देश में पैदा जरूर होते हैं, लेकिन पहाड़ की जलवायु, पारंपरिक बीजों एवं जैविक तत्वों की वजह से उनकी आर्थिक उपयोगिता बढ़ जाती है। मंडुआ (रागी) देशभर के अधिकतर स्थानों पर होता है, पर उत्तराखंड में उत्पादित मंडुआ पोषक तत्वों के अनुसार ज्यादा उपयोगी है।

वो बताते हैं, जापान के मोरिओका शहर की योशोफूमी किहाता कंपनी ने यहां के मंडुआ को बच्चों के लिए पोषक खाद्य बनाने के लिए खरीदा। जबसे जैविक खाद्यान्न के विचार ने जोर पकड़ा, तब से उत्तराखंड के मंडुआ या रागी का आटा शहरों में गेहूं के आटा से दोगुने -तिगुने दामों में बिकता है। मंडुआ से सिर्फ रोटी नहीं, बल्कि मंडुआ माल्ट भी तैयार होता है। यह आटा से कई गुना दाम पर बिकता है। मंडुआ के पौष्टिक बिस्किट बनाए जाते हैं, जिनकी बड़ी मांग है।

जख्या एक तरह का खरपतवार, अब बिकता है अच्छे दाम पर

बारहनाजा में जख्या एक ऐसी फसल है, तो कभी भी बोई नहीं जाती और खरीफ में जख्या स्वतः उग आता है। जड़धारी जी कहते हैं, यह एक तरह का खरपतवार ही है। कहीं-कहीं बड़ी मात्रा में जख्या उग आता है। जब जख्या का उपयोग नहीं था, साथ ही इसकी आर्थिक उपयोगिता भी नहीं थी, तब लोग खेतों में जख्या उगना गाली समझते थे। लेकिन आज जख्या के उगने की प्रतीक्षा रहती है, क्योंकि इसकी उपयोगिता बढ़ गई। कभी खेतों से उखाड़कर फेंके जाने वाले जख्या की अब बाजार में पहचान हो रही है। जख्या का उपयोग खानपान में तड़का लगाने के लिए होता है।

बारहनाजा के बारे में विस्तार से जानकारी के लिए पढ़ें- विजय जड़धारी की पुस्तक बारहनाजा- पारंपरिक खेती का विज्ञान, जिसको एकेडमी ऑफ डेवलपमेंट साइंस ने प्रकाशित किया है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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