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Video: जड़धारी जी ने बिना जोते, बिना खाद के लहलहा दिए खेत

जीरो बजट खेतीः पुआल को खेतों में ही छोड़ने से खाद बनेगी तो इसको जलाने की नौबत ही नहीं आएगी

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी को बीजों का गांधी उपनाम से पुकारना अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि उन्होंने किसानों में पारंपरिक बीजों के प्रति चेतना जगाने का अभूतपूर्व काम किया है। जड़धारी जी, खेती में जंगल के सिद्धांत को लागू करने पर जोर देते हैं। उन्होंने इसको अपने खेतों में लागू करते हुए जुताई के बिना ही बीज फैला दिए और बिना खाद के, फसल उगा दी।

जड़धारी जी बताते हैं, प्राकृतिक खेती की शुरुआत दुनिया में जापान के किसान मासानोबू फुकुओका ने की थी। उन्होंने इस पर एक किताब लिखी थी, One Straw Revolution (एक तिनका क्रांति), जिसको सुंदरलाल बहुगुणा जी लेकर आए थे। उन्होंने यह किताब हमें दी थी। प्राकृतिक खेती की मूल अवधारणा मासानोबू फुकुओका की है।

खेती की इस पद्धति में जुताई न करना, गुड़ाई न करना, खाद न डालना, कीटनाशक नहीं डालने की सलाह दी जाती है। इसको जीरो बजट खेती कहते हैं, हम इसको पहले से ही करते आ रहे हैं। खेतों में पारंपरिक बीजों का इस्तेमाल, खाद के लिए अपने पशुओं का गोबर, पेड़ों की पत्तियां आदि, स्वयं का श्रम, कुदरती पानी प्रयोग करते रहे हैं। पौधों को किसी भी बीमारी की दशा में कीटनाशक भी घर में ही बनता है। जिस तरह पेड़ अपने पत्ते नीचे गिराकर अपने लिए खाद बनाता है, उसी तरह फसल भी अपने लिए खाद बनाती है। बीज यूं ही छिड़क दीजिए, अपने आप पौधे कुदरती अंकुरित हो जाते हैं।

जड़धारी जी बताते हैं, हाईब्रीड, जीएम (Genetically Modified) बीजों से खतरा यह है, उनके जीन में ही बीमारियां होती हैं। वो पहले साल अच्छी फसल देगा, पर फिर खेतों में बीमारियां फैलाएंगे। इसके लिए कैमिकल वाले कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनसे मिट्टी की उवर्रक क्षमता का हृास होता है।

हाइब्रीड बीजों और कैमिकल ने खेती में खर्चों को बढ़ाया है और मिट्टी की इम्युनिटी को कमजोर किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीज, कीटनाशक, कैमिकल वाली खाद इस्तेमाल करने से मिट्टी की ताकत कम हो रही है। कैमिकल वाले खरपतवारनाशक मिट्टी के बैक्टीरिया को खत्म कर देते हैं, जबकि प्राकृतिक खेती मिट्टी के बैक्टीरिया को वापस लाने का काम करती है।

टिहरी गढ़वाल जिला के नागणी स्थित अपने खेत में बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी। फोटो- मोगली

बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी, हमें नागणी स्थित खेतों में ले जाते हैं, जहां जौ की फसल लहलहा रही है। नागणी, टिहरी गढ़वाल के चंबा ब्लाक में है। बताते हैं, जौ बोने के लिए न तो खेत में हल लगाया और न ही निराई-गुड़ाई की। इस खेत में खाद भी नहीं डाली। इसमें से खरपतवार भी निकाली, वो भी खेत में ही पड़ी रहने दी। इसको ही हम जीरो बजट की खेती कहते हैं। यह खेती जंगल के सिद्धांत पर आधारित है, जहां तमाम तरह की वनस्पतियां उगती हैं, जिनको न तो हम खाद देते हैं और न ही सिंचाई करते हैं।

जड़धारी जी बताते हैं , इस खेत में जौ से पहले धान लगा था। हमने धान की पुआल को खेत में ही पड़े रहने दिया था। खेत को जोते बिना ही उसमें जौ के बीज डाल दिए थे। कुछ दिन बाद जौ के बीज अंकुरित हो गए। पुआल खेत में ही गलकर खाद बन गई।

यह भी पढ़ें- Video: ‘बीजों के गांधी’ जड़धारी जी बता रहे हैं, जब लोगों ने बीजों के लिए जान तक दांव पर लगा दी

वो कहते हैं, पुआल को खाद बनने के लिए खेतों में ही बिछाने की व्यवस्था होगी तो पंजाब जैसे राज्यों में इसको जलाने की नौबत ही नहीं आएगी।

पुआल को हाथ में लेकर दिखाते हैं, इसमें केचुआं पनप गया है। इससे पैदावार अच्छी होगी। रही बात, खरपतवार की, तो वो भी खाद में पड़े-पडे़ खाद बन गई। कुल मिलाकर, खेती के लिए अभिशाप कही जाने वाली खरपतवार, इस तरीके से खेत के लिए वरदान से कम नहीं है। उनका कहना है कि जौ के लिए खरपतवार पोषण का काम करते हैं।

टिहरी गढ़वाल जिला के जड़धार गांव स्थित घर में परिवार के साथ बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी। फोटो- मोगली

अब हम जौ के खेत में तौर के बीज डाल देंगे और जौ की पकी हुई बालियों को काट लेंगे, तने को जड़ के साथ ही खेत में छोड़ देंगे, जो तौर की फसल के लिए खाद का काम करेंगे। तौर उगाने के लिए भी हमें खेत को जोतने या निराई गुड़ाई करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अलग से किसी खाद का इस्तेमाल करने की आवश्यकता भी नहीं है। उनका कहना है, अपने दो खेतों में कुछ वर्ष से यह प्रयोग कर रहे हैं। क्या इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं, उनका जवाब था- यहां पहाड़ में कम हो रहा है, वैसे मैंने कहीं देखा नहीं है। पर, ये प्रयोग बढ़ेंगे, क्योंकि इनमें कोई लागत नहीं लग रही। उनका कहना है, प्राकृतिक खेती मिट्टी को बचाने का काम है। मिट्टी की इम्युनिटी को मजबूत करेंगे तो हमारी इम्युनिटी (रोगप्रतिरोधक क्षमता) का विकास होगा।

वन विभाग के माध्यम से सरकार लाखों-करोड़ों पेड़ लगा चुकी है। वन विभाग वास्तव में, एक भी सफल वनीकरण दिखा दे, वो नहीं दिखा सकता। लेकिन हम आपको कुदरत द्वारा संरक्षित जंगलों को दिखा सकते हैं। कुदरत खुद चयन करती है और अच्छा सेलेक्शन करती है। उसी तरह एक अच्छी खेती हो सकती है, एक अच्छा जंगल बन सकता है।- विजय जड़धारी, बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता

गायों को बचाने के लिए बैल बचाने की बात करनी होगी

जड़धारी जी कहते हैं, हम वर्षों से सरकार से पशुपालन को बढ़ाने की बात कह रहे हैं। सरकारें, चाहे कोई भी हों, केंद्र सरकार की बात भी कर रहा हूं, गोधन बढ़ाने की बात कर रहे हैं, गाय को बचाने की बात हो रही है। बैलों को बचाने की बात भी तो होनी चाहिए। विकसित कृषि के लिए केवल एक मशीन की बात की जा रही है। पहले हम बैलों की मदद से हल लगाते थे, बाद में ट्रैक्टर आ गए। कोई बात नहीं। पर, अब कहा जा रहा है बैल बेकार की बात है, पहाड़ों में पावर टिलर से खेती करो। बैलों को पूरी तरह से खेती से अलग कर दिया गया। पावर टिलर पर सब्सिडी दी जा रही है। क्या बैलों पर सब्सिडी नहीं दी जा सकती। जब किसान बैलों को पालेगा तो उसे गाय भी पालनी होगी। बैलों से खेती के बिना गाय पालन कैसे होगा। वहीं, देशी गायों के आर्टीफिशियल गर्भाधान से नस्लें बिगड़ गईं। वो न तो जर्सी रहीं और न ही होल्स्टीन रहीं। पशुओं की नस्लों को बचाने का काम करना होगा।…. जारी

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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