
83-Year-Old Farmer Uttarakhand Wildlife Conflict:
देहरादून, 30 नवंबर, 2025। राजेश पांडेय, उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों में खाली पड़ी कृषि भूमि पर जब भी कोई चर्चा होती है, तो पलायन और जंगली जानवरों के हमलों की बात जरूर होती है। हम ज्यादा दूर नहीं जाते, राजधानी देहरादून के पास के ही एक गांव में, जंगली जानवरों से प्रभावित बुजुर्ग महिला किसान के संघर्ष पर बात करते हैं। ये कोई सामान्य किसान नहीं हैं, बल्कि झीलवाला में रहने वालीं लगभग 83 साल की मुन्नी देवी हैं, जो कृषि और अपने लगभग 40 पशुओं को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
83-Year-Old Farmer Uttarakhand Wildlife Conflict: खेती और पशुपालन पर निर्भर मुन्नी देवी की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। उनका कहना है कि “खेतीबाड़ी से जो भी मिलता है, गुजारा हो जाता है। वो गेहूं और सरसों की फसल को जानवरों से बचाने के लिए सर्दियों की रात में भी अपने खेतों के बीच बने मचान पर होती हैं। फसल की सुरक्षा के लिए टॉर्च लेकर रातभर जागती हैं।”
उनका कहना है, “रातभर यहां पास के जंगल से जानवरों के झुंड आते रहते हैं। एक बार हाथी तो उनके आंगन तक पहुंच गया था। हाल ही में धान काटा, कुछ पल्ले नहीं पड़ा। पूरा खेत पहले ही जानवरों ने तबाह कर दिया था। वन विभाग तो मुआवजा देकर अपना पीछा छुड़ा लेता है, पर हम क्या करें, इन जंगली पशुओं से अपना पीछा कैसे छुड़ाएं, वो सवाल करती हैं।”
बताती हैं, “मैंने हाथियों को अपने पास से होकर जाते देखा। बघेरा (गुलदार), सूअर, नीलगाय, हिरणों से झुंड खेतों पर हमला करते हैं। टॉर्च की रोशनी उनकी तरफ करो तो वो यह समझ लेते हैं कि वहां कोई इंसान है, इसलिए भाग जाते हैं। पर, जानवरों का हमला रोज होता है। हमारे आसपास काफी भूमि बिक गई, यहां खेत कम ही बचे हैं। इसलिए जंगली जानवर उनके खेत पर ही टूट पड़ते हैं।”

ये सारे पशु मेरे बच्चे जैसे हैं…
83-Year-Old Farmer Uttarakhand Wildlife Conflict : रविवार 30 नवंबर, 2025 की दोपहर बाद, हम मुन्नी देवी के घर पहुंचे। वो अपने घर के पास मैदान में पशुओं को चरा रही थीं। पशुपालन और खेतीबाड़ी में उनकी बेटी बबली भी मदद करती हैं। उनके पास पशुओं में गाय, बछड़े, बछड़ियां, नंदी और दो भैंसे भी हैं। बताती हैं, कुछ ही गायें दूध देती हैं। उन्होंने अपने सभी पशुओं के नाम रखे हैं, जैसे पतंगा, इतवारी, वनू, तितली, कंचन, नंदी,चैता…,।
उनका कहना है, “ये सभी मेरे बच्चे हैं। मैंने कभी अपने पशुओं को सड़क पर निराश्रित नहीं छोड़ा। सभी यहां रहकर दिनभर आसपास चरते हैं। मैंने इनके लिए खेत में चारा बोया है। पशु आहार बाजार से मंगाते हैं।”
सुबह चार बजे उठना होता है, नींद ही कहां आती है
“सुबह करीब चार बजे उठती हूं, वैसे तो मुझे नींद ही नहीं आती। हर एक घंटे में जागकर टॉर्च से देखती हूं कि खेत में कोई जानवर तो नहीं घुस गया। अभी हाल ही में, लगभग एक महीने अस्वस्थ रही। अब थोड़ा ठीक हूं।”
खेत में बने मचान की ओर इशारा करते हुए मुन्नी देवी बताती हैं, “रातभर तो मैं वहां रहती हूं। वहां बिस्तर लगाया है, कोई दिक्कत नहीं है। फसल बचानी है, इतनी मेहनत और संघर्ष तो करना होगा। मेरा जीवन खेती और पशुओं को समर्पित हो गया।”
बताती हैं, “आजादी से पहले मेरा जन्म हो गया था। यहां झीलवाला में वर्षों पहले आ गए थे। पहले हम वीरभद्र में रहते थे। मायका मानकी (भोगपुर इठारना मार्ग पर) में है, पर अब वहां आना जाना नहीं होता। हम देहरादून नहीं बल्कि ऋषिकेश जाते हैं, वहां ही हमारा बाजार है।”
हमारे आग्रह पर खेतों से होते हुए हमें मचान तक ले जाती हैं। वहां उन्होंने गद्दा और फूस का बिछौना बनाकर रजाई रखी है। कहती हैं, “इस मचान को थोड़ा ऊपर करेंगे, ताकि दूर तक खेत और जंगली जानवर दिख जाएं।”
क्या आपको यहां ठंड नहीं लगती, के सवाल पर उनका कहना था, “नहीं यह रजाई पर्याप्त है। मुझे यहां रहने की आदत हो गई। मैं फसल बचाने की कोशिश करती हूं, जानवर खेतों में घुस जाते हैं तो क्या कर सकते हैं। वैसे, टॉर्च की रोशनी देखकर जानवर खेतों में कम ही घुस पाते हैं।”
झीलवाला में झीलें नहीं दिखतीं
बुजुर्ग मुन्नी देवी बताती हैं. “झीलवाला में पहले आसपास काफी छोटी बड़ी झीलें थीं।”
झीलवाला को लेकर एक और जानकारी है, यह इलाका उड़द के लिए जाना जाता था। डांडी, रानीपोखरी, झीलवाला गांव में इतनी उड़द होती थी कि देहरादून से व्यापारी खेतों में पहुंच जाते थे। एक ओर दाल, जिसे झिलंगा कहा जाता है, जो नौरंगी दालों की एक किस्म है, यहां बहुत होती थी। इसलिए इस इलाके को झिलंगावाला कहा जाने लगा, जो बाद में झीलवाला हो गया। वर्तमान में यहां कोई झील नहीं दिखती।

सोलर फेंसिंग पर पैसा खर्च, पर कोई फायदा नहीं
सामाजिक सरोकारों के पैरोकार ग्राम यात्री मोहित उनियाल ने बुजुर्ग मुन्नी देवी से मुलाकात में उनके समक्ष खेतीबाड़ी, पशुपालन में आने वाली समस्याओं के बारे में जानकारी ली। इस पर मुन्नी देवी ने बताया, “खेतों को पशुओं के हमले से बचाने के लिए कोई ठोस व्यवस्था होनी चाहिए। उन्होंने सोलर फेंसिंग लगाई थी, काफी पैसा खर्च हुआ, पर फेंसिंग खराब पड़ी है। जानवर फसल को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई बार तो उनकी गायों पर भी हमला किया। एक गाय तो जंगल के पास मरी मिली।”
जीवन में बहुत संघर्ष देखा मुन्नी देवी ने
”जीवन संघर्ष से भरा है, जब पति की मृत्यु हुई थी, तब चार बेटियां और नौ साल का एक बेटा था। उस समय बड़ी बेटी 12वीं कक्षा में पढ़ती थी। मेरे ऊपर 22 हजार रुपये कर्जा था। मैंने खेतों में हल बहाया, पशुपालन करके बच्चों को पाला। कर्ज भी उतारा और बेटियों की शादी भी कीं।”
“वर्ष 2002 में एक और बड़ी अनहोनी हो गई। 24 साल की आयु में बेटे की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई और मैं अकेली रह गई।बेटे की मृत्यु के बाद तीन साल तक होश में नहीं थी। धीरे-धीरे हिम्मत बांधी और पशुओं और इस खेती के सहारे ही जीने का आस जगाई। 25 साल पहले मेरे पास दो गाय थीं, आज 40 पशु हैं। ये सभी उन्हीं गायों की संतानें हैं,” मुन्नी देवी बताती हैं।
वो कहती हैं, “आज मैं जो भी कुछ हूं, इस भूमि की वजह से हूं, अपने पशुओं की वजह से हूं। मैं आत्मनिर्भर हूं, किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ी। इस भूमि और गायों ने मुझे कभी आर्थिक दिक्कत में नहीं आने दिया।” ( नवंबर, 2022 में मुन्नी देवी से हुई वार्ता पर आधारित )












