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पशुओं और खेतीबाड़ी को बचाने के लिए 80 साल की मुन्नी देवी का संघर्ष

झीलवाला गांव की मु्न्नी देवी लगभग 40 गौवंश को अकेले दम पर पाल रही हैं

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

देहरादून के झीलवाला गांव का एक समय था, जब यहां दूर-दूर तक खेत नजर आते थे। यह इलाका उड़द के लिए जाना जाता था। डांडी, रानीपोखरी, झीलवाला गांव में इतनी उड़द होती थी कि देहरादून से व्यापारी खेतों में पहुंच जाते थे। एक ओर दाल, जिसे झिलंगा कहा जाता है, जो नौरंगी दालों की एक किस्म है, यहां बहुत होती थी। इसलिए इस इलाके को झिलंगावाला कहा जाने लगा, जो बाद में झीलवाला हो गया। यहां कोई झील नहीं है, इसलिए झीलवाला नाम किसी झील की वजह से पड़ा है, यह कहना गलत होगा। इस इलाके में भूजल का स्तर भी काफी नीचे है।

अब हालात बदल रहे हैं, झीलवाला गांव के अधिकतर खेतों पर आबादी बसाने की तैयारी हो रही है। कॉलोनियां बनाने के लिए प्लाटिंग की जा रही है और खेत गायब होते जा रहे हैं। अनुमान है कि दस वर्ष में झीलवाला गांव खेती के लिए कम, कॉलोनियों के लिए ज्यादा जाना जाएगा। अनुमान लगाएं तो लगभग आधी भूमि पर आवासों के लिए प्लाटिंग हो रही है। नये मकान दिखाई दे रहे हैं। देहरादून औऱ ऋषिकेश शहरों में जगह कम होने पर आबादी रानीपोखरी के आसपास के गांवों की ओर रुख करने लगी है।

पर, इन बातों के बावजूद, यहां 80 साल की मुन्नी देवी खेतीबाड़ी और पशुओं को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनके पास 13-14 बीघा जमीन है और लगभग 40 गौवंश, जिनमें गायें, बछड़ियां, बछड़े और बैल शामिल हैं, उनके पास पलते हैं। मुन्नी देवी सभी पशुओं को अकेले दम पर पाल रही हैं।

उनका साफ-साफ कहना है,  “जिस भूमि की बदौलत हम जीवन को आगे बढ़ा रहे हैं, उसको नहीं बेच सकते। यह हमारी मां की तरह है। मेरे बाद, इस भूमि को संभालने वालों को भी मैंने साफ शब्दो में कह दिया कि इसको बेचना नहीं। यहां पशुपालन करो, खेती करो, फार्म हाउस बनाओ, पर इसे बेचना नहीं। क्योंकि जमीन बेचकर कोई पनपा नहीं है।”

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में 80 साल की पशुपालक मुन्नी देवी। फोटो- राजेश पांडेय

वो कहती हैं, “आज मैं जो भी कुछ हूं, इस भूमि की वजह से हूं, अपने पशुओं की वजह से हूं। मैं आत्मनिर्भर हूं, किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ी। इस भूमि और गायों ने मुझे कभी आर्थिक दिक्कत में नहीं आने दिया।”

” जीवन संघर्ष से भरा है, जब पति की मृत्यु हुई थी, तब चार बेटियां और नौ साल का एक बेटा था। उस समय बड़ी बेटी 12वीं कक्षा में पढ़ती थी। मेरे ऊपर 22 हजार रुपये कर्जा था। मैंने खेतों में हल बहाया, पशुपालन करके बच्चों को पाला। कर्ज भी उतारा और बेटियों की शादी भी कीं।”

“वर्ष 2002 में एक और बड़ी अनहोनी हो गई। 24 साल की आयु में बेटे की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई और मैं अकेली रह गई।बेटे की मृत्यु के बाद तीन साल तक होश में नहीं थी। धीरे-धीरे हिम्मत बांधी और पशुओं और इस खेती के सहारे ही जीने का आस जगाई। 25 साल पहले मेरे पास दो गाय थीं, आज 40 पशु हैं। ये सभी उन्हीं गायों की संतानें हैं,” मुन्नी देवी बताती हैं।

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में 80 साल की पशुपालक मुन्नी देवी बछड़े-बछड़ियों के नाम बताते हुए। फोटो- प्रशांत शर्मा

उन्होंने बताया,  “हमने बैलों की मदद से खेती की। आज तक एक भी पशु को सड़क पर नहीं छोड़ा। वो सबको पालेंगे, चाहें बछड़ा हो या फिर बछड़ी। कहती हैं, मैंने बेटे का सारा प्यार इन पशुओं को ही दिया है। ये भी मुझसे प्यार करते हैं। यह अपना प्यार दिखाते भी हैं। बहुत अच्छे हैं मेरे पशु। अगर मैं, आंख मूंदकर थोड़ी देर के लिए कहीं लेट जाती हूं, तो ये मुझे देखने आते हैं कि मैं ठीक हूं या नहीं। मुझे इंसानों से इतना स्नेह नहीं है, जितना इन पशुओं से।”

मुन्नी देवी हमें अपने पशुओं से मिलवाती हैं, जिनको नाम से पुकारती हैं। कहती हैं, “वैसे मुझे सभी के नाम याद नहीं रहते, पर जब पशु पास में आ जाता है तो तुरंत उसका नाम याद हो जाता है। नाम रखने का तरीका एकदम सरल है, जो पशु वन में पैदा हुआ, उसका नाम वन्नू रख दिया, जो रात को जन्मा उसका नाम राता रखा। मेरे पास अर्जुन, कंचन, शामा, बुधा, नंदी, बैशाखा, चैता, चमेली… आदि हैं।”

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में 80 साल की पशुपालक मुन्नी देवी का घर, जिसकी दीवारें जीर्ण शीर्ण हो चुकी हैं। फोटो- प्रशांत शर्मा

“एक बछड़ी का नाम पतंग रखा है, जो सात माह में ही जन्मीं थी। बहुत कमजोर थी, उसके पैर मुड़े हुए थे। हमने उसकी दिनरात सेवा की, उसके पैरों की मालिश की, दवाइयां करके उसको बचाया। एक दिन पतंग घर नहीं पहुंची, जबकि हमारे सभी जानवर एक साथ चरते हैं और एक साथ ही घर लौटते हैं। पतंग को हमने बहुत तलाश किया, लेकिन वो नहीं मिली। करीब एक हफ्ते बाद वो गड्ढे में मिली। वो जिंदा थी, हमने उसको बाहर निकाला। डॉक्टर को दिखाया और किसी तरह उसकी जान बचा पाए। वो काफी कमजोर है, पर पशुओं के साथ चरने जाती है।”

बताती हैं, “गाय-भैंस, बकरी ये सभी चरने वाले पशु हैं, इनको आप किसी एक जगह पर बांधकर खिलाएंगे तो सही नहीं होगा। शहरों की डेयरियों में गाय-भैंस को एक स्थान पर बांधकर चारा, भूसा, खल दिया जाता है, पर उनका स्वास्थ्य इससे अच्छा नहीं रह सकता। पशुओं को खुला स्थान चाहिए और जंगलों में चरने वाले पशुओं का स्वास्थ्य अच्छा रहता है, क्योंकि ये 12 तरह की घास, जड़ीबूटियां, पत्तियां खाते हैं, जो इनको रोगों से बचाते हैं। हमारे यहां लंपी रोग का ज्यादा असर नहीं हुआ। थोड़ा बहुत हुआ भी तो हमने काबू पा लिया। यहां कोई पशु खंडित नहीं हुआ।”

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में 80 साल की पशुपालक मुन्नी देवी पशुओं के साथ। फोटो- राजेश पांडेय

“हमने कभी बाजार से भूसा नहीं खरीदा, सिवाय इस साल के, क्योंकि इस बार गेहूं नहीं लगाया था। खेत में चरी लगाई है, पेड़ों की टहनियां छांटकर, मशीन से कुट्टी बनाकर पशुओं को खिलाते हैं। बाजार से पशुओं के लिए नमक और अन्य आहार लाते हैं। हमारे पशु दिनभर चरते हैं, सुबह-शाम घर पर चारा खिलाते हैं, उनका पेट भरा रहता है। सबसे अच्छी बात यह है कि शाम को सभी पशु घर लौट आते हैं। हम इनको बांधकर भी नहीं रखे, तब भी ये इधर-उधर नहीं दौड़ेंगे।”

बुजुर्ग पशुपालक मुन्नी देवी बताती हैं, “सुबह चार बजे उठ जाती हूं। पशुओं के थनों को धोने के लिए पानी गर्म करती हूं। दूध निकालती हूं और फिर दूध बिक्री करती हूं। गांव के ही कुछ घरों में और एक दूध विक्रेता के पास दूध लगाया गया है। सभी यहीं पर दूध लेने आते हैं।पशुओं के साथ मेहनत बहुत होती है। दूध का रेट अधिक होना चाहिए, पर हम खेत में चारा उगाते हैं, इसलिए हमें नुकसान नहीं है। हमसे खरीदकर दूध बेचने वाला व्यक्ति यहीं रानीपोखरी का है। उन्होंने ही बहुत समय से रेट नहीं बढ़ाया। उनका रोजगार चल रहा है और हमारे पशु पल रहे हैं, यही बड़ी बात है।”

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में बुजुर्ग पशुपालक मुन्नी देवी ने खेत में ट्यूबवैल के लिए बोरिंग कराई है। इसमें पाइप लगाए जाने हैं। फोटो- प्रशांत शर्मा

“उनके सामने सबसे बड़ी समस्या पशुओं के लिए पानी इकट्ठा करने की है। गर्मियों में तो दिक्कत बढ़ जाती है। उस समय वो करीब आधा किमी. दूर ट्यूबवैल के पास पशुओं को लेकर जाती हैं। उनको पशुओं के लिए दूर से भी पानी ढोना पड़ जाता है। कुछ समय पहले ही उन्होंने ट्यूबवैल के लिए बोरिंग कराई है। यहां पानी काफी गहराई में है, इसलिए इस पर काफी पैसा खर्च हुआ। अब पाइप बिछाने का काम रह गया है, जो जल्द ही पूरा हो जाएगा।”

“अभी तक सभी पशुओं का प्रसव उन्होंने खुद ही कराया। ऐसे समय में कभी किसी की मदद नहीं ली। कहती हैं, मेरे पशुओं का प्रसव सुरक्षित हुआ। पशु बीमार हो जाते हैं, तो उनको पारंपरिक चिकित्सा का ज्ञान है। घर की रसोई में बहुत सारी औषधियां होती हैं, जो पशुओं के लिए बेहतर होती हैं। ज्यादा दिक्कत होने पर स्वयं ही पशु चिकित्सक के पास जाकर दवा लाती हैं या फिर उनको घर पर बुला लेते हैं।”

“हमारे पास, 25 साल पहले दो गायें थीं, जिनके ये सभी बच्चे हैं। सबसे बड़ी गाय की आयु दस वर्ष है। जिन दो गायों का यह परिवार हमारे पास है, वो तो वर्षो पहले गुजर चुकी हैं। हमने कुछ गायों को बेचा भी है। दो बैलों की मदद से खेती भी की।”

बुजुर्ग मुन्नी देवी बताती हैं, “यहां हाथी, जंगली सुअर, बंदर फसलों को बर्बाद कर देते हैं। एक बार हाथियों ने उनका नौ बीघा गन्ना रौंद दिया था, इसलिए गन्ना नहीं बोते। गेहूं, सरसो, चरी ही बोते हैं। हाथी तो अब भी यहां आ जाते हैं। कुछ समय पहले कृषि भूमि और आवास की सोलर फेंसिंग कराई थी, जिसका एक हिस्सा सही तरह से काम नहीं करता। जंगली जानवर खेतों से होते हुए घर के पास तक पहुंच जाते हैं। मेरी एक गाय को हाथी ने मार दिया था। कई बार फसलों को नुकसान पहुंचा, पर कोई मुआवजा नहीं मिला। पहले एक या दो बार मुआवजा मिला था, पर अब नुकसान होने पर कोई नहीं पूछता। मैं अकेली कहां-कहां किनके दफ्तरों तक जाऊं। आखिर हम क्या कर सकते हैं।”

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में 80 साल की पशुपालक मुन्नी देवी पेड़ों की लॉपिंग खुद करती हैं। फोटो- प्रशांत शर्मा

पशुओं के लिए पत्तियां काटने, पेड़ों की लॉपिंग (टहनियों का छांटने) का काम मुन्नी देवी खुद करती हैं। खेत में खड़े सागौन के पेड़ की ओर इशारा करके बताती हैं, “उस पेड़ की टहनियों को मैंने छांटा। मुझे पेड़ पर चढ़ने में डर नहीं लगता। यह काम मैं खुद करती हूं। उन्होंने हमें एक पेड़ पर चढ़कर दिखाया। हमारे पूछने पर कहती हैं, “मुझमें यह शक्ति कैसे आती है, मुझे भी नहीं पता।”

देहरादून जिला के झीलवाला गांव में 80 साल की पशुपालक मुन्नी देवी बिजली से चलने वाली मशीन से चारा काटते हुए। फोटो- राजेश पांडेय

मुन्नी देवी खेतों में चारा काटती हैं। थोड़ा थोड़ा करके चारा बिजली की चारा मशीन तक लाती हैं और काटती हैं। बताती हैं, “पहले हाथ से ही मशीन चलानी पड़ती थी। उस मशीन से चारा काटना बड़ा कठिन काम था। अब चारा काटना आसान हो गया है। हालांकि, यह मशीन कभी कभी खराब हो जाती है।”

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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