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Video- कृषि में स्वरोजगारः कम भूमि में इस तरह की खेती करिए और लाभ कमाएं

नकरौंदा में महिला किसान गीता देवी ने एकीकृत खेती को बनाया लाभकारी

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्रों में छोटी व बिखरी जोत होने के कारण कृषि चुनौतीपूर्ण है। 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी की आजीविका कृषि तथा इसके सहवर्गीय क्रियाकलापों, जैसे कि उद्यानीकरण, दुग्ध उत्पादन, जड़ी-बूटी उत्पादन, मत्स्य पालन, पशुपालन, जैविक कृषि, संगन्ध पादप, मौन पालन, सब्जी उत्पादन तथा इनसे सम्बन्धित लघु उद्योगों पर निर्भर करती है”, ऐसा आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 की रिपोर्ट में कहा गया है।

अब सवाल उठता है, कम भूमि पर खेती को लाभकारी कैसे बनाया जाए, हालांकि प्रगतिशील किसान इस दिशा में वर्षों से पहल कर रहे हैं। नकरौंदा निवासी किसान दीपक उपाध्याय कृषि में लाभ के लिए एकीकृत कृषि पर जोर देते हैं। उनका कहना है, कृषि क्रियाकलापों को प्रतिमाह की आय का जरिया बनाया जाना चाहिए। एकीकृत खेती इसका शानदार विकल्प है। आप खेतीबाड़ी करते रहें, पर इससे जुड़े उद्यम भी अपनाने होंगे। आप मशरूम की खेती कर सकते हैं। गाय-भैंस पालने के साथ कुक्कुट पालन, बकरी पालन, मत्स्य पालन, बतख पालन ग्रामीण आर्थिकी की बेहतर विकल्प हैं। इससे आप कृषि में जीरो वेस्ट एवं जैविक उत्पादन से आय प्राप्त कर सकते हैं।

किसान उपाध्याय और उनकी पत्नी गीता देवी ने एकीकृत खेती को आगे बढ़ाया और वर्तमान में छात्रों और कृषकों को प्रशिक्षण भी देते हैं। उन्होंने पॉलीहाउस में जैविक सब्जी उत्पादन पर काम किया है, जिसमें प्याज, लहसुन, फलियों के साथ बेल पर लगने वाली सब्जियां उगाई जाती हैं। होटल, रेस्रां की मांग के अनुसार, लेट्यूस (सलाद), ब्रोकली की खेती कर रहे हैं। चेरी टमाटर उगा रहे हैं।

लैट्यूस की खेती। फोटो- सार्थक पांडेय

लैट्यूस (Lettuce) सलाद का एक प्रकार है, जो दिखने में पत्ता गोभी की तरह है, जिसकी डिमांड होटल-रेस्टोरेंट में होती है। एक माह में तैयार होने वाले इस सलाद की कीमत प्रति पीस 100 रुपये बताई जाती है। कुल मिलाकर आप इसके 20 बीस भी बो रहे हैं, तो डेढ़ से दो हजार रुपये प्रतिमाह की आमदनी हो सकती है।

हिमाचल प्रदेश सरकार की एक वेबसाइट के अनुसार, लैट्यूस  में पौष्टिक तत्व जैसे विटामिन और लवण पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं। अब जैसे-जैसे लोगों में भोजन के साथ सलाद शामिल करने के गुण की जानकारी बढ़ रही है, वैसे ही इस फसल को उगाने की भी किसानों को जिज्ञासा हो रही है। इसकी उन्नत किस्म इस प्रकार हैं- अलामो-1 किस्म पत्तागोभी की तरह शीर्ष बनाने वाली गहरे रंग की किस्म है। इसकी औसत उपज 200 से 235 कुंतल प्रति हेक्टेयर है। सिंपसन ब्लैक सीडिड के हरे रंग के बड़े पत्ते कड़वाहट वाले होते हैं। औसत उपज 200 कुंतल प्रति हैक्टेयर है। एवज वंडर भी शीर्ष बनाने वाली हरे रंग की किस्म है। पत्ते नरम व कड़क होतेे हैं। रूबी खुले जामुनी रंग के पत्तों वाली किस्म है।

ब्रोकली का पौधा। फोटो- सार्थक पांडेय

वहीं, ब्रोकली गोभीय वर्ग की प्रमुख सब्जी है। यह पौष्टिक इटालियन गोभी है, जिसे सलाद, सूप और सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। ब्रोकली दो तरह की होती है- स्प्राउटिंग ब्रोकली और हेडिंग ब्रोकली। स्प्राउटिंग ब्रोकली का प्रचलन अधिक है। इसमें विटामिन, खनिज लवण ( कैल्शियम, फास्फोरस एवं लौह तत्व ) प्रचुरता में होते हैं। इस पौधे से तीन फूल प्राप्त कर सकते हैं।

चेरी की खेती। फोटो- सार्थक पांडेय

चेरी टमाटर की मांग भी काफी है, यह  सामान्य टमाटर की तुलना में थोड़ा छोटा और मीठा होता है। इसका आकार अंगूठे के सिरे से लेकर गोल्फ की गेंद के आकार तक होता है। यह गोलाकार से लेकर थोड़ा आयताकार आकार का हो सकता है। इसके पौधे साल में 210 से 240 दिन तक पैदावार देते हैं। हर पौधा अपनी अवधि के दौरान तीन से चार किलो का उत्पादन करता है। एक एकड़ में चेरी टमाटर साढ़े पांच हजार से ज्यादा पौधे लगाए जा सकते हैं। चेरी टमाटर की सेल्फ लाइफ 8 से 10 दिन की होती है। चेरी टमाटर उत्पादक स्पेन, मोरक्को और चीन हैं। यूरोप और अमेरिका इसके सबसे बड़े बाजार हैं।

गीता देवी बताती हैं, सब्जियों में लगने वाले कीट का इलाज भी जैविक तरीके से कर रहे हैं। उन्होंने हल्दी से पौधों के उपचार का तरीका बताया। एक और विधि की जानकारी दी, जिसमें धतूरा, बिच्छूघास, अरंडी और भांग से कीटनाशक बनाया जाता है।

कृषि फार्म पर गाय पालन, जिससे गोबर की जरूरत पूरी होती है। फोटो- राजेश पांडेय

गीता देवी धनिया, सोयाबीन, सरसों, मटर, आलू की खेती भी करती हैं। उनका कहना है, हमने अपार्टमेंट्स, कॉलोनियों में जहां सिर्फ गमले ही रखे जा सकते हैं, वहां भी सब्जियों की खेती के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया है। आप घऱ की छत पर दस-दस लीटर की कैन, कनस्तर को काटकर उसमें मिट्टी और गोबर की खाद का मिश्रण तैयार करके धनिया, प्याज, लहसुन, टमाटर, बैंगन, मिर्च बो सकते हैं। किचन गार्डन के लिए ज्यादा समय नहीं चाहिए, पर देखरेख की आवश्यकता होती है।

पानी बचाने और खेत में नमी बनाए रखने का उपाय

पॉलीहाउस में पाइप बिछाए हैं, जिनमें ट्यूबवैल से पानी की आपूर्ति होती है। युवा किसान नमन बताते हैं, पॉलीहाउस में बिछाए कम व्यास वाले पाइप में छिद्र किए हैं। इन छिद्र के बीच का अंतर उसी तरह रखा गया है, जितना कि पौधों के बीच होता है। पाइप को पौधे के पास बिछाकर इसमें जल प्रवाह करते हैं। छिद्र से निकला पानी पौधों को सिंचित करता है।

खेत की पाइप से सींचने के लिए लगाया गया पंपिंग सिस्टम। फोटो- सार्थक पांडेय

इस विधि से पूरे खेत में पानी नहीं बहता, पौधों को उनकी जरूरत के अनुसार ही पानी मिल जाता है। इससे पानी अनावश्यक खर्च नहीं होता। गर्मियों में पूरे खेत को पानी देते हैं, जिससे मिट्टी में नमी का स्तर बढ़ता है। खेत की नालियों में पुआल बिछा देते हैं। एक बार गीली हुई पुआल, गर्मियों में मिट्टी को कम से कम तीन दिन तक नम रखती है। हम इन नालियों में ब्रोकली, गोभी के अपशिष्ट डंठल डाल देते हैं, जो नमी बनाए रखने के साथ गलकर खाद बन जाते हैं।

मछली पालन का तालाब, जो वर्षा का जल इकट्ठा करके बनाया गया है। फोटो- सार्थक पांडेय
पशुपालन से गोबर गैस, खाद उत्पादन और मछलियों का आहार

नमन बताते हैं, पशुपालन से आपको दूध ही नहीं मिलता, बल्कि गोबर व गोमूत्र का उपयोग भी स्वरोजगार देता है। उनके पास देशी और साहीवाल नस्ल की गाय हैं। गौशाला की धुलाई से निकलने वाला पानी पाइप के माध्यम से तालाब में जाता है, जिसमें रोहू और कतला मछलियां पालते हैं। यहीं नहीं खेत से बरसात में निकलने वाला पानी भी इसी तालाब में इकट्ठा होता है।

गोबर गैस प्लांट। फोटो- सार्थक पांडेय

गोबर से ईंधन गैस तथा स्लरी मिलती है, जिसे सुखाकर खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हम अपने खेतों में किसी तरह का कैमिकल इस्तेमाल नहीं करते। यह पूरी तरह जैविक है। इसमें गोबर की खाद, सब्जियों के डंठल, पत्ते, तने सबकुछ इस्तेमाल होता है। गौमूत्र का अर्क तैयार करने के लिए छोटा सा प्लांट लगाया है। गोबर से धूपबत्ती, धतूरा से कीट नाशक बनाने का काम भी करते हैं। नमन कहते हैं, खेती में भी कुछ भी वेस्ट (बेकार) नहीं है।

नकरौंदा स्थित जैविक कृषि फार्म पर युवा किसान नमन और उनकी माता गीता उपाध्याय ने हमें खेती को लाभकारी बनाने के बारे में जानकारियां दीं। फोटो- सार्थक पांडेय

नक्षत्र वाटिका में 27 तरह के पेड़ः प्रोगेसिव फार्मर दीपक उपाध्याय ने नक्षत्र वाटिका लगाई है, जिसमें ग्रहों के अनुरूप वनस्पतियां लगाई हैं, जिनकी संख्या 27 है। इनमें अर्जुन, बकुल, साल, कटहल,  रीठा, ढाक, नागकेसर, शीशम, शमी, जामुन, आम, महुआ, नीम, कदम्ब, खेर, मदार, जलबेतस, चीड़, पाकड़, बरगद, पीपल, बाँस, गूलर के वृक्ष हैं।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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