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एक मुलाकातः घने जंगल में रहती हैं चांद पर दिखने वाली बूढ़ी मां

बचपन से सुनता आया हूं, चांद पर एक बूढ़ी मां रहती हैं, जो चरखा चलाती हैं। कहानियां सुनाने वाले हमसे कहते थे, जब भी बूढ़ी मां को याद करके चांद की ओर देखोगे तो तुम्हें चरखा चलाते हुए दिखेंगी।

हम चांद पर तो नहीं गए, पर धरती पर ही उन्हीं की तरह एक और बूढ़ी मां से मिलकर आए। सच में, चांद वाली दादी उनसे ज्यादा सुंदर नहीं होगी। वो बहुत अच्छी हैं। जब हंसती हैं तो लगता है दादी इसी तरह खिल खिलाकर हंसती रहें।

पर, बात करते हुए वो कभी कभी उदास हो जाती हैं। हमारे पूछने पर बताती हैं, इंसान तो यहां दूर-दूर तक नहीं हैं। आप आए, आपका धन्यवाद।

बताती हैं, दुख तकलीफ में इंसानों तक मेरी आवाज नहीं पहुंचेगी, इसलिए राम को पुकारती हूं, क्योंकि भगवान तो सब जगह हैं। जब हम वापस लौटे तो उन्होंने हमारे सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा, खुश रहो।

दादी कहां रहती हैं?

वो किस हाल में हैं?

वो हम इंसानों से क्या चाहती हैं?

उन तक कैसे पहुंच सकते हैं?

वो पूरा दिन क्या करती हैं?

वो कितनी बहादुर हैं?

वो उदास क्यों हो जाती हैं?

उनके लिए हम सब मिलकर क्या कर सकते हैं?

ये सवाल आप सभी के पास होंगे, जिनके जवाब इस रिपोर्ताज में मिल जाएंगे, ऐसी उम्मीद है।

दादी के बारे में हमें सिंधवाल ग्राम पंचायत के प्रधान प्रदीप सिंधवाल से पता चला। दादी उमरेत गांव में रहती हैं, जो सिंधवाल ग्राम पंचायत में है। सूर्याधार झील से आगे करीब दो किमी. चलकर कंडोली गांव हैं।

देहरादून जिला में कंडोली गांव से खाई पार पहाड़ी पर ऐसा दिखता है दादी का घर। फोटो- डुगडुगी

कंडोली से बाईं ओर खाई के बाद दिखने वाले पहाड़ पर, जो अकेला घर दिखाई देगा, वो दादी का है। दादी तक पहुंचने के लिए लगभग दो किमी. से ज्यादा चलना होगा, वो भी तेज प्रवाह वाली जाखन को दो बार पार करके।

वरिष्ठ पत्रकार योगेश राणा और ग्राम प्रधान प्रदीप सिंधवाल के साथ, कंडोली से उमरेत गांव का पैदल सफर शुरू हो गया। सिंधवाल, पहले भी दादी से मिलकर आए थे। वो बताते हैं कि चुनाव के समय उनके घर गया था। मुझे पता चला था कि वो वहां वर्षों से अकेली रह रही हैं।

कंडोली गांव से आगे खेतों के बीच से आगे बढ़ते हुए हम चारों तरफ हरियाली को देख रहे थे। यहां तापमान शहर के मुकाबले कम है। मुझे यहां खुलकर सांस लेने का मौका मिल गया।कुछ आगे चले तो ढलानदार कच्चा रास्ता, जो काफी संकरा है। यहां पैरों को जमाकर रखना था, नहीं तो संतुलन बिगड़ते ही फिसलने का जोखिम उठाना पड़ता। पर, कहीं भी ढलान पर उतरते हुए, मुझे एक चिंता रहती है, वो यह कि वापस आते हुए इस चढ़ाई को कैसे पार करूंगा।

खैर, हम पहुंच गए जाखन नदी के छोटे से पुल पर, जो बहुत सुंदर है। यहां नदी को मन भरकर देखने का मौका कैसे छोड़ दूं। नदी शोर मचा रही है, पास ही जंगल में झींगुरों की आवाज, मानो प्रकृति यहां अपने गीत संगीत में खोई है। आप यहां आकर भूल जाओगे, उस शहर को, जिसमें मेरे जैसे कस्बाई, देहाती मजबूरी में जाते हैं।

देहरादून जिला के कंडोली गांव से दादी के घर की ओर बढ़ते रास्ते में जाखन नदी। फोटो- डुगडुगी

आगे बढ़े तो नदी को पार करना था। नदी किनारे जंगल है और तितलियों की विविधता देखने लायक थी। पहले तो जी भरकर नदी का ठंडा पानी पिया और फिर नदी को पार करने की तैयारी।

देहरादून जिला के कंडोली गांव से दादी के घर की ओर बढ़ते रास्ते में जाखन नदी। फोटो- डुगडुगी

ठंडे जल के तेज प्रवाह के बीच आगे बढ़ते हुए नंगे पैरों में चुभते कंकड़-पत्थर से जितना कष्ट हो रहा था, उससे ज्यादा खुशी, इस बात की थी कि हम खुद को स्वच्छ, निर्मल नदी के बीच पा रहे थे।

वर्षों बाद, किसी नदी को पार करने का जोखिम उठा रहा था, पर भयभीत नहीं था, बल्कि खुश था। हम यहां आकलन कर चुके थे कि नदी को आसानी से पार कर लेंगे। नदी तेज होती तो पार जाने की सोचते भी नहीं।

दादी तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं, एक जिसमें नदी पार करनी होती है और दूसरा जिस पर नदी नहीं है। जिस पर नदी नहीं है, वो इससे लगभग दोगुनी दूरी का है। हम वापस नदी के रास्ते नहीं लौटे।हम पहले दाएं किनारे से नदी पार करके बाईं तरफ पहुंचे। फिर थोड़ा सा आगे चलकर नदी पार करके फिर दाएं किनारे पर पहुंच गए।

नदी की दाईं तरफ पहुंचकर हमें जंगल में प्रवेश करना था, जिसमें शुरुआत में कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। कुछ कदमों पर समझिए, हम भटक ही गए थे।

ग्राम प्रधान सिंधवाल जी, ने दादी के घर जाने वाली पगडंडी खोज निकाली और वो हमारे से आगे-आगे चल रहे थे।

देहरादून जिला के कंडोली गांव होते हुए जाखन नदी पार करके उमरेत गांव का रास्ता झाड़ियों से भरा है। यहां से होते हुए जा रही बिजली की लाइन। फोटो- डुगडुगी

इस रास्ते पर कई दिन तक कोई चहलकदमी नहीं हुई, इसलिए मकड़ियों ने जाले बना दिए थे। सिंधवाल जी, झाड़ीनुमा टहनी लेकर हमारे से आगे-आगे चल रहे थे। वो रास्ते में बने जाले हटाते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ दूरी पर झाड़ियों से भरा मैदान था, जिसके बीच से होकर हम ऊँचाई की ओर चल रहे थे।

देहरादून जिला के कंडोली गांव होते हुए जाखन नदी पार करके उमरेत गांव का रास्ता। फोटो- डुगडुगी

जंगली झाड़ियां लाल रंग के छोटे-छोटे फूलों से भरी थीं। लगता है, मानो प्रकृति यहां आने वाले हर व्यक्ति को स्वागत करती है।

उमरखेत गांव के रास्ते में झाड़ियों में उगे फूल। फोटो- डुगडुगी

बताते हैं, यहां पानी की कोई कमी नहीं है। कृषि और बागवानी की इस इलाके में काफी संभावना बताई जाती है।

मैं थोड़ा पीछे रह गया और राणा जी व सिंधवाल जी, दादी के घर पहुंच चुके थे।

देहरादून जिला के उमरेत गांव में दादी ने घर पर क्यारियों की जंगली जानवरों से सुरक्षा के लिए रंगबिरंगे कपड़े बांधे हैं। फोटो- डुगडुगी

आधे कच्चे, आधे पक्के तीन कमरों वाले घर से पहले छोटी-छोटी क्यारियों ने ध्यान दिलाया। यहां मिर्च, भंगजीर और अरबी लगी है। क्यारियों में रंग बिरंगे कपड़े बांधे हुए हैं, जो शायद जंगली जानवरों से फसल की सुरक्षा के लिए हैं।

अब हम सभी दादी, जिनकी उम्र 80 साल से ज्यादा होगी, जिनका नाम बूंदी देवी है, के घर पर हैं। उन्होंने ग्राम प्रधान सिंधवाल जी को पहचान लिया।

वो यहां अकेली रहती हैं। उनके घर तक शायद ही कोई महीनों में पहुंचता होगा। वो तो दादी ही हैं, जो वृद्धावस्था पेंशन के लिए करीब 20 किमी. चलकर थानो तक पहुंचती हैं, वो भी तीन महीने में एक बार।

देहरादून जिला के उमरेत गांव में दादी बूंदी देवी। इस गांव में एक घर है और दादी यहां अकेली रहती हैं। फोटो- डुगडुगी

ग्राम प्रधान के घर पहुंचने से दादी खुश हैं। अपने कमरे में बैठाने के लिए वो खाट पर बिछी लोई की सलवटें ठीक करते हुए कहती हैं, यहां बैठ जाओ।

मेरे पास आपको बैठाने के लिए यही खाट है। दादी खुद जमीन पर बैठकर कागजों की एक पोटली खोल लेती हैं। उनके पास रहने लायक यही कमरा बचा है, जिसका फर्श कच्चा है और इस पर गोबर- मिट्टी से लिपाई की गई है। बताती हैं, वो तो पशु नहीं पालतीं, गोबर एक घर से लेकर आई हैं, जो यहां से दूर है।

दादी से बात करते हुए हम उनके पास जमीन पर ही बैठ गए। उन्होंने हमसे काफी कहा, खाट पर बैठो। हम तो उनसे मिलने गए थे, उनके पास, उन्हीं की तरह जमीन पर बैठना हमें बहुत अच्छा लगा।

देहरादून जिला के उमरेत गांव में दादी का घर, जो बदहाल हो गया है। फोटो- डुगडुगी

वो जिस कमरे में रहती हैं, उसकी दीवार बनाने के लिए चिने गए बड़े और स्लेटनुमा पत्थर साफ दिखाई देते हैं। चूल्हे के धुएं से कमरे की छत और दीवारें काली पड़ गई हैं। वैसे भी यह मकान काफी पुराना है, वहीं मरम्मत नहीं होने से बदहाल हो गया है। छत के सरिये साफ दिखाई दे रहे हैं।

उमरखेत गांव में दादी के मकान के तीनों कमरे रहने लायक नहीं बचे हैं, पर जिस कमरे में दादी रहती हैं, वहां बारिश में पानी टपकता है। इसलिए इस कमरे की छत को तिरपाल से ढंका है। फोटो- डुगडुगी

दादी बताती हैं, बारिश में कमरे की छत टपकती है। खाट को कभी इधर तो कभी उधर सरकाना पड़ता है। पानी से बचने के लिए छत पर तिरपाल बिछाई है।

देहरादून के उमरखेत गांव में दादी के एक कमरे में पुराना सामान रखा है, इनमें चाक की दिखने वाला चक्की का पाट भी है। किसी समय में दादी के पास पानी से चलने वाली घराट भी थी। फोटो- डुगडुगी

बाकी दो कमरे रहने लायक नहीं हैं। एक कमरे में रखा पत्थर का पहिया देखकर दादी से पूछा, क्या यह चाक है। क्या आप चाक भी चलाती थीं। दादी बोली, पास ही में हमारी घराट थी, यह उसका ही हिस्सा है। हम समझ गए कि यह चक्की का पाट है।

हालांकि दादी ने रहने वाले कमरे की साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा है। बरतन भी बड़ी अच्छी तरह से रखे हैं। हर चीज बड़े तरीके से रखी हुई थी।

उमरखेत गांव में दादी के कमरे में बना मिट्टी का चूल्हा और उस पर रखी लकड़ियां। चूल्हे की आग के ताप से इन लकड़ियों की नमी हट जाती है। फोटो- डुगडुगी

मिट्टी का चूल्हा भी लीपा हुआ है और उसके ऊपर दो सरियों पर कुछ लकड़ियां रखी हैं। ये लकड़ियां ऐसे क्यों रखी हैं, पर बताती हैं कि चूल्हा जलने से इन लकड़ियों तक ताप पहुंचता है और इनमें नमी नहीं रहती। ये आसानी से जल जाती हैं।

दादी ने बताया कि वो रोज सुबह तीन बजे उठ जाती हैं। उनके पास न तो घड़ी है और न ही मोबाइल। ऐसे में समय कैसे पता चलता है। बताती हैं, तारों की छांव देखकर।

दादी के कमरे की पत्थर से बनी दीवारें चूल्हे के धुएं से काली हो गई हैं। फोटो- डुगडुगी

पहले के लोग समय का पता तारों को देखकर ही लगाते थे। आपको अपने पास मोबाइल रखना चाहिए, पर कहती हैं, जरूरत नहीं है। जब किसी को कुछ कहना होता है तो कंडोली जाकर फोन कर देती हूं।

जिस रास्ते का जिक्र आपसे कर रहा हूं, उसी से होकर वो थानो गांव जाती हैं। नदी को पार करना उनकी मजबूरी है। बरसात में इस नदी को पार नहीं किया जा सकता।

उनके घर से कंडोली गांव दिखता है। दादी बताती हैं, उनके पास फोन नहीं है। यहां से फोन भी नहीं हो सकता। कहीं कोई सूचना देनी होती है तो पहले कंडोली (जहां से हमने यात्रा शुरू की थी) जाती हूं, वहीं से फोन करती हूं। थानो जाने के लिए कंडोली से कोई गाड़ी मिल गई तो ठीक, नहीं तो पैदल ही चलती हूं।

उनके पास अपने खाने के लिए राशन है। परिवार के जो लोग, यहां से रोजगार के सिलसिले में पलायन कर गए, वो उनका ख्याल रखते हैं। राशन देकर जाते हैं। आप यहां अकेली क्यों रहती हो, के जवाब ने हमें झकझोर दिया।

उमरखेत गांव में दादी के घर पर वरिष्ठ पत्रकार योगेश राणा। फोटो- डुगडुगी

दादी ने हमारे अधिकतर सवालों के जवाब गढ़वाली बोली में ही दिए। हम उनकी कुछ-कुछ बातों को समझ पा रहे थे। ग्राम प्रधान सिंधवाल जी, ने उनकी बातों को समझने में मदद की। हम उनके भाव भी समझ रहे थे।

वो बताती हैं, जब मैं यहां शादी होकर आई थी, तब मेरी उम्र 12 साल थी, जब वो 30 साल की थी, तब पति का देहांत हो गया था। मैंने यही रहकर अपने बच्चों की परवरिश की। आज मैं 80-90 साल की हो गई, तब से मैं यहीं रह रही हूं, यहां से मेरी यादें जुड़ी हैं।

यहां रोजगार नहीं है, बच्चों को यहां से जाना ही था। बच्चों के अपने परिवार हैं, उनकी अपनी जिम्मेदारियां हैं। उनको खुशी-खुशी अपनी जिंदगी जीनी है। मैं अपना घर-गांव छोड़कर नहीं जा सकती।

किसी दुख तकलीफ में आप क्या करती हैं, पर दोनों हथेलियों को जोड़ते हुए छत की ओर देखते हुए कहती हैं, तब तो राम को ही पुकारती हूं। इंसान तो यहां दिखाई नहीं देते। यहां काफी दिनों बाद आप ही आए हो, आपका स्वागत है, जो आपने दर्शन दिए, यह कहते हुए दादी कुछ उदास हो गईं।

हम उनको उदास नहीं देखना चाहते थे, इसलिए बातचीत का रुख बदलते हुए कहा, दादी, आपने तो बहुत अच्छी क्यारियां बनाई हैं, उसमें मिर्च लगाई है, अरबी और भंगजीर भी है।

उमरखेत गांव में दादी के घर पर भंगजीर के पौधे। फोटो- डुगडुगी

दादी खुश होते हुए पूछने लगीं, क्या कभी भंगजीर खाई है। मेरे पास है, मैंने उगाई थी। इसकी चटनी बड़ी अच्छी होती है। उन्होंने एक डिब्बे की ओर इशारा करते हुए कहा, प्रधान जी, उसमें भंगजीर है।

सिंधवाल जी ने राणा जी और मेरी हथेलियों पर भंगजीर परोस दी। मुझे तो यह चौलाई के फीके दानों की तरह लगी। दादी ने कहा, चीनी ले लो, बहुत अच्छा लगेगा। कहती हैं, यहां खाने का पूरा सामान रखती हूं। जब मन नहीं करता तो खाना नहीं बनाती।

दादी बताती हैं, यहां चाय के लिए दूध नहीं मिलेगा। मैं तो काली चाय ही पीती हूं। यहां पानी की कमी नहीं है। बिजली भी है। कुछ दिन पहले ही नया बल्ब लगाया था, बल्ब की ओर इशारा करते हुए दादी बताती हैं।

”यहां जंगली जानवर भी आ जाते हैं। बाघ तो कई बार दिख गया। कुछ दिन पहले बड़ा सांप कमरे के पास से होकर गया। इनका डर रहता है। एक बार तो बाघ पास ही कमरे में घुस आया था। पर, शुक्र है, उसने हमला नहीं किया। खतरा तो है, पर क्या करें। अंधेरा होते ही दरवाजा बंद कर लेती हूं’, दादी बताती हैं।”

दादी तो बहादुर हैं, वो किसी से नहीं डरती, मेरे इतना कहने पर बुजुर्ग मां फिर से मुस्कुराती हैं। हम बहुत देर से उनके चेहरे पर मुस्कुराहट का इंतजार कर रहे थे। हम उनसे मिलने पहुंचे थे, हम उनकी बातों को सुनने पहुंचे थे। वो बुजुर्ग हैं और उनके पास हम जैसी पीढ़ियों को कहने, बताने के लिए बहुत कुछ है।

दादी बताती हैं, त्योहार का पता चल जाता है। अब दिवाली आने वाली है, दीये जलाऊंगी। होली का भी पता चलता है, पर यहां कोई आता नहीं है।

दादी को संगीत सुनना पसंद नहीं है। वो रेडियो सुनना भी पसंद नहीं करतीं। वो इनके बिना भी व्यस्त रहने और मन को खुश रखने की बात कहती हैं। हालांकि दादी को गीत- संगीत क्यों पसंद नहीं है, पर उनका कोई जवाब नहीं मिलता।

उमरखेत गांव में दादी से मिलने पहुंचे सिंधवाल गांव के प्रधान प्रदीप सिंधवाल। फोटो- डुगडुगी

ग्राम प्रधान सिंधवाल जी से बातें करते हुए, वो पहले के कई प्रधानों के नाम बताती हैं। कहती हैं, वो कई किलोमीटर चलकर ग्राम प्रधान के वोट डालने जाती हैं। किस प्रधान ने अच्छे काम किए, किसने जनता की बात नहीं सुनी, वो सभी पर राय रखती हैं।

हमने पूछा तो कहती हैं, उनको नहीं पता, उनके विधायक कौन हैं। मैं न तो किसी विधायक को जानती हूं और न ही कोई यहां कभी वोट मांगने आया। मैंने कभी विधायक के वोट नहीं दिए। वो अपने सांसद को भी नहीं जानतीं। केवल ग्राम प्रधान को जानती हैं, क्योंकि उनके घर पर प्रधान के अलावा कोई नहीं आया।

उन्होंने हमें बताया कि पास ही में एक मंदिर बनवाया है। हम उस मंदिर तक भी गए, जहां दादी पूजा करने रोजाना जाती हैं। मंदिर परिसर फूलों से भरा है। वहां से आसपास का विह्ंगम नजारा पेश आता है।

यह थी, उन बूढ़ी मां की कहानी, जो एक गांव में रहती हैं, अकेली रहती हैं और महीनों बीत जाते हैं, उनको किसी इंसान से बात किए हुए। उनके घर गांव तक जाने वाले कच्चे जंगली रास्ते पर जाले लग जाते हैं। उनको किसी से फोन पर बात करने के लिए नदी पार करके करीब दो किमी. चलना पड़ता है। पेंशन के लिए करीब 20 किमी. चलना पड़ता है।

उनके उदास रहने की वजह हम समझ सकते हैं। जीवन के जिस पड़ाव पर वो हैं, उस समय उनको सबसे ज्यादा सामाजिक एवं स्वास्थ्य सुरक्षा की आवश्यकता है। उनको अपने आसपास खुशनुमा माहौल की जरूरत है। बुजुर्ग चाहते हैं, कोई उनसे बात करे, उनकी बातों को सुने।

बुजुर्गों को कोई कैसे और क्यों अकेला छोड़ सकता है। वो भी ऐसे स्थान पर जहां इंसान ही न दिखते हों। दिन रात ऐसी जगह पर अकेले रहने की पीड़ा क्यों, जहां किसी कष्ट में किसी को आवाज लगाकर बुला भी नहीं सकते। क्या दादी को पलायन नहीं करने की पीड़ा उठानी पड़ रही है।

वो हर पीड़ा में भगवान को ही याद करने की बात क्यों कहती हैं। क्या दादी हम सभी इंसानों से नाराज हैं। उनके मन में क्या चल रहा है। यह तो वहीं जान सकती हैं। हम दादी के चेहरे पर मुस्कान लाने, उनकी उदासी को दूर करने के लिए क्या कुछ कर सकते हैं।

चांद पर रहने वाली दादी को नजदीक से देखने की आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी, जब आप धरती पर रह रहीं इन बुजुर्ग मां से मिलोगे।

क्या आप अपनी व्यस्तता से एक दिन निकालकर दादी से मिलने उनके पास जा सकते हैं। हम तो दादी से मिलकर वापस लौट आए, दूसरे रास्ते से। दूसरा रास्ता जोखिम वाला है। इसमें न तो चढ़ाई है और न ही नदी।

सिंधवाल ग्राम पंचायत के सेबूवाला गांव में धान की कटाई चल रही है। फोटो- डुगडुगी

जंगल के किनारे संकरे रास्ते से होते हुए हम सेबूवाला गांव पहुंच गए, जो सिंधवाल गांव ग्राम पंचायत का ही हिस्सा है। सेबूवाला के किनारे से होकर बह रही जाखन।

देहरादून की सिंधवाल ग्राम पंचायत के सेबूवाला गांव में मत्स्यपालन के तालाब। फोटो- डुगडुगी

जाखन नदी यहां के खेतों को सींचती है और मत्स्यपालन के बड़े तालाबों को भरती है।

फिर से जाखन के छोटे पुल को पार करके हम लौट आए कंडोली की ओर। लौटते वक्त पुल से कंडोली गांव की चढ़ाई पर मैं हांफने लगा। एक- दो जगह रुक रुककर आगे बढ़ा।

उमरखेत गांव से वापस लौटकर हमने कंडोली गांव में चाय का आनंद लिया। फोटो- डुगडुगी

कंडोली गांव में चाय का आनंद लिया और स्थानीय निवासियों व बच्चों से बात की।

कंडोली निवासी अशोक रावत, बिटिया अवनी और बेटे अभिषेक के साथ। फोटो- डुगडुगी

फिर लौट आए उसी देहरादून शहर में, जहां से बार-बार गांवों की ओर दौड़ने का मन करता है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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