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पुलिस की पहलः कुंजाग्रांट के निराश्रित बच्चों के लिए वात्सल्य योजना की कार्यवाही

देहरादून। देहरादून जिला के कुंजा ग्रांट में रहने वाली 16 साल की बिटिया और उनके तीन भाई बहनों के लिए सात माह बाद एक अच्छी खबर मिली है। सूचना मिलते ही सक्रिय हुई उत्तराखंड पुलिस की विशेष शाखा एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट ने चारों बच्चों को मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना से आच्छादित कराने की कार्यवाही शुरू कर दी है। यूनिट इंचार्ज सब इंस्पेक्टर मोहन सिंह ने सोमवार को जिला प्रोबेशन अधिकारी (डीपीओ) को बच्चों का विवरण उपलब्ध करा दिया है। 

उधऱ, जिला प्रोबेशन अधिकारी मीना बिष्ट का कहना है कि उनके संज्ञान में यह मामला आया है। एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट ने उनको बच्चों का विवरण उपलब्ध कराया है। कुंजाग्रांट जाकर बच्चों से मिलेंगे और बच्चों के संरक्षण की कार्रवाई विशेष प्राथमिकता के आधार पर की जाएगी।

कुंजा ग्रांट देहरादून जिला की विकासनगर तहसील और सहसपुर विधानसभा क्षेत्र का गांव है। सात माह से चार बच्चे निराश्रित हैं। इनके पिता का सात माह पहले और माता का चार साल पहले निधन हो गया था। पिता की मृत्यु के बाद से बच्चे पड़ोसियों की मदद पर निर्भर हैं। सबसे बड़ी बेटी 16 साल की, उससे छोटा भाई दस साल का, दो छोटी बेटियां आठ और साढ़े तीन साल के हैं।

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इनके दादा-दादी और चाचा भी हैं, पर इनसे दूर हरियाणा में रहते हैं। कुल मिलाकर ये बच्चे यहां अकेले हैं और फूस की छत वाले एक कच्चे-पक्के घर में रहते हैं। इनके पास न तो शौचालय है और न ही बिजली का कनेक्शन। पड़ोसियों की कृपा पर जीवन आगे बढ़ रहा है।

पर, जीवन कभी दूसरों पर निर्भरता से बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ता। यहां तो पड़ोसी भी आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। बदहाली में जी रहे इन बच्चों के पास सरकारी मदद के नाम पर राशन के अलावा कुछ नहीं है।

बीते शनिवार (26 जून,2021) को सूचना मिलते ही एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट के इंचार्ज मोहन सिंह टीम के साथ इन बच्चों के घर पहुंचे। उन्होंने बच्चों से बात की। फोन पर उनके चाचा को पूरी जानकारी देते हुए कुंजाग्रांट बुलाया। उन्होंने पड़ोसियों और गांव में ही रहने वाले बच्चों के रिश्तेदार से भी बात की।

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एएचटीयू के इंचार्ज का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। यदि इनके दादा और चाचा इनके संरक्षण की जिम्मेदारी नहीं लेते तो सभी बच्चों को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के समक्ष ले जाएंगे और फिर आयु के अनुसार बाल निकेतन व शिशु निकेतन में दाखिला दिलाया जाएगा। बच्चों को किसी भी दशा में अकेले नहीं छोड़ा जाएगा।

रविवार को बुलाने के बाद भी बच्चों के दादा या चाचा गांव नहीं पहुंचे। एएचटीयू इंचार्ज का कहना है कि बच्चों के दादा- चाचा की प्रतीक्षा की जा रही है। यदि उनकी तरफ से समय पर सही रेस्पांस नहीं मिला तो बच्चों के संरक्षण की नियमानुसार कार्यवाही शुरू कर देंगे। सोमवार को यूनिट ने बच्चों का पूरा विवरण जिला प्रोबेशन अधिकारी (डीपीओ) को उपलब्ध करा दिया है, ताकि इनको मुख्यमंत्री वात्सल्य योजना का लाभ मिल सके।

डुगडुगी  की टीम ने इस पूरे मामले को विस्तार से कवर किया था। उन विभागों को लेकर हमारा सवाल अब भी अपनी जगह बरकरार है। सवाल यह है कि इनको अब तक संरक्षण क्यों नहीं मिला। हम उस पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल तो उठा ही सकते हैं, जो बाल कल्याण एवं बच्चों के बहुआयामी विकास का दावा करता है।

अपनी बात को फिर से दोहराते हुए फिर से मान लेते हैं कि बाल विकास व प्रशासन के अधिकारियों ने चार छोटे बच्चों के निराश्रित होने का संज्ञान लिया और वो उनसे मिले। पर, इन बच्चों की सामाजिक सुरक्षा के सवाल पर कोई कार्यवाही मौके पर नहीं दिखी।

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अभी तक संबंधित अफसरों ने बच्चों के नियमानुसार संरक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की। उनके सुरक्षित आश्रय , शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा की दिशा में कोई कार्य क्यों नहीं किए गए। जनप्रतिनिधि इन बच्चों के लिए चिंता तो व्यक्त करते हैं, पर सात माह में भी इनके लिए कुछ ऐसा नहीं हो सका, जिसके आधार पर कहा जा सके कि हम उस व्यवस्था में रह रहे हैं, जो लोक कल्याणकारी अवधारणा से वास्ता रखती है।

क्षेत्रीय विधायक के संज्ञान में यह मामला है, पर इन बच्चों का कुछ भला नहीं हुआ।

ग्राम्य विकास, महिला एवं बाल विकास विभाग तमाम अभियान चला रहे हैं, उनके पास योजनाओं की कमी नहीं है, पर इन निराश्रित बच्चों को कोई लाभ नहीं मिला। प्रशासन की सबसे बड़ी से लेकर छोटी इकाई तक इनके काम नहीं आ सकी। इन बच्चों के लिए ये पूरी व्यवस्था, जिसमें बड़ी संख्या में अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हैं, किसी काम की नहीं है।

अधिकारी एवं कर्मचारी व सामान्य व्यक्ति तक जानते हैं कि सरकारी स्तर पर संरक्षण का मतलब तो परिवार के लोगों को विधिक रूप से सुपुर्द करने से होता है, न कि पड़ोसियों से मिलने वाली मदद के भरोसे।

यह हालात तब हैं, जब सरकार की ओर से वात्सल्य योजना का लगातार प्रचार किया जा रहा है। पर, बाल संरक्षण के लिए जिम्मेदार सिस्टम की राजधानी से करीब 35 किमी. दूर स्थित इस गांव पर नजर नहीं पड़ी। वो क्या वजह है कि अपने अधिकारों से इन चार बच्चों को अभी तक वंचित रहना पड़ा। बचपन बचाओ की पहल इनके किसी काम क्यों नहीं आ पा रही है या फिर सरकारी तंत्र इस दिशा में कदम नहीं बढ़ा रहा है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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