By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Reading: कहां हैं सरकार की हेली एंबुलेंस, केंद्रा को समय पर इलाज मिलता तो बच सकती थी जान
Share
Notification Show More
Font ResizerAa
NEWSLIVE24x7NEWSLIVE24x7
Font ResizerAa
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
  • About
  • Agriculture
  • Uttarakhand
  • Blog Live
  • Career
  • News
  • Contact us
Have an existing account? Sign In
Follow US
  • Advertise
  • Advertise
© 2022 Foxiz News Network. Ruby Design Company. All Rights Reserved.
- Advertisement -
Ad imageAd image
NEWSLIVE24x7 > Blog > Blog Live > कहां हैं सरकार की हेली एंबुलेंस, केंद्रा को समय पर इलाज मिलता तो बच सकती थी जान
Blog LiveFeaturedhealthUttarakhandWomen

कहां हैं सरकार की हेली एंबुलेंस, केंद्रा को समय पर इलाज मिलता तो बच सकती थी जान

Rajesh Pandey
Last updated: April 10, 2022 3:55 pm
Rajesh Pandey
4 years ago
Share
देहरादून के एक बड़े अस्पताल का आपात चिकित्सा भवन (सांकेतिक चित्र) । फोटो- राजेश पांडेय/newslive24x7.com
SHARE

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

उत्तरकाशी जिला के मनाण गांव की 45 साल की एक महिला चट्टान से फिसलकर गहरी खाई में गिरने से गंभीर रूप से घायल हो गईं। मनाण गांव बड़कोट तहसील का हिस्सा है। यह दुर्घटना कुछ दिन पहले की है। महिला केंद्रा देवी सुबह पशुओं के लिए चारा काटने जंगल गई थीं। उनको खाई से बाहर निकालने और फिर लगभग कई किमी. दूर नौगांव के स्वास्थ्य केंद्र ले जाने में कई घंटे बीत गए और फिर नौगांव से भी हायर सेंटर रेफर कर दिया गया। दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल महिला ने रास्ते में प्राण त्याग दिए।

पहाड़ में किसी महिला के साथ इस तरह की पहली दुर्घटना नहीं है। कभी घास की तलाश में पेड़ से, चट्टान से गिरने की घटनाएं और कभी जंगली जानवरों का हमला। सवाल उठता है कि क्या सभी चुनौतियां महिलाओं के ही हिस्से हैं।

सवाल यह भी उठता है, जब पहाड़ में गंभीर रोगियों को राहत देने के लिए बेहतर हेल्थ इन्फ्रास्ट्रकचर नहीं है, तो क्या हेली एंबुलेंस की तत्काल व्यवस्था नहीं की जा सकती है। हेली एंबुलेंस की बात इसलिए करनी पड़ रही है, क्योंकि उत्तराखंड में हर सरकार, हर मुख्यमंत्री हेली एंबुलेंस की व्यवस्था को उपलब्धियों में शामिल करते हैं।

केंद्रा देवी (फाइल फोटो)। यह फोटो विकास का हमराही सोशल मीडिया पेज से लिया गया है।

वरिष्ठ पत्रकार विजेंद्र रावत, सोशल मीडिया पेज विकास का हमराही पर मनाण गांव की इस घटना की जानकारी साझा करते हैं- हेली एम्बुलेंस से बच सकती है, दुर्घटनाग्रस्त घसियारियों की जान!। रावत बताते हैं, मनाण गांव की 45 वर्षीय केन्द्रा देवी सुबह-सुबह अपने पशुओं के लिए घास काटने जंगल गई, घास काटते हुए चट्टान से पांव फिसला और गहरी खाई में जा गिरी। गम्भीर अवस्था में उन्हें खाई से निकाला गया, जहां से घंटों जीप के सफर के बाद महिला को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नौगांव लाया गया, जहां डाक्टरों ने हायर सेंटर देहरादून के लिए रेफर कर दिया, आखिर कितना झेलती और बेचारी ने प्राण त्याग दिए।

उनका कहना है, पिछले साल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने हेली एम्बुलेंस का उद्घाटन और उसके बाद घसियारी योजना लांच की। काश, उस हेली एंबुलेंस का प्रयोग जमीन पर होता तो बेचारी केन्द्रा देवी की जान बच जाती जो घर में बंधे बेजुबान जानवरों और अपने बच्चों का सहारा थी। शायद अपना ईलाज उत्तराखंड के अस्पतालों के बजाय दिल्ली के बड़े अस्पतालों में कराने वाले नेताओं व नौकरशाहों के लिए यह एक छोटी सी भुला देने वाली घटना है पर केन्द्रा के परिवार, नाते रिश्तेदारों व पूरे गांव के लिए एक न भूल पाने वाला जख्म है।

  • Video- हम शर्मिंदा हैंः इसलिए एक दिन घस्यारी बनते हैं, बोझ उठाकर कुछ दूर चलते हैं

न्यूज लाइव से बात करते हुए विजेंद्र रावत, राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायलों को समय पर इलाज दिलाने के लिए हेली एंबुलेंस तत्काल उपलब्ध कराने पर जोर देते हैं। कहते हैं, एक हेली एंबुलेंस से किसी रोगी को देहरादून के सुविधाजनक अस्पताल में भेजने में कितना खर्च आएगा, मुश्किल से 50 हजार रुपये। इन 50 हजार रुपये के खर्च से किसी की जान बच सकती है। कई घंटे इंतजार के बाद भी समुचित इलाज नहीं मिलने से केन्द्रा देवी की मृत्यु हो गई। यह स्थिति बड़ी दुखद है।

क्या मुख्यमंत्री के निर्देश पर ही उड़ेगी हेली एंबुलेंस
उत्तराखंड में हेली एंबुलेंस को लेकर तमाम खबरें सामने आती रही हैं। राज्य में हेली एंबुलेंस है, पर जब उसका इस्तेमाल किसी आपात स्थिति में नहीं हो, तो क्या कहा जाएगा। राज्य में हेली एंबुलेंस होने की पुष्टि इस बात से होती है, क्योंकि पिछले साल अक्तूबर के अंतिम सप्ताह में मुख्यमंत्री के निर्देश पर जिला अस्पताल गोपेश्वर में भर्ती तीन लोगों को हेली एम्बुलेंस से देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल में भर्ती कराया गया था। ये लोग सिलेंडर फटने से बुरी तरह झुलस गए थे। मुख्यमंत्री चमोली जिला अस्पताल का दौरा कर रहे थे, तब उन्होंने इन मरीजों का हाल जानकर इनको हेलीएंबुलेंस से देहरादून भेजने के निर्देश दिए थे। सवाल उठता है, क्या यह निर्णय प्रशासन के स्तर का नहीं है या फिर हर मामले में मुख्यमंत्री को ही निर्देशित करना होगा।

केन्द्रा देवी की खबर पर चर्चा क्यों नहीं? 
कुछ दिन पहले देहरादून में स्वास्थ्य सचिव की पत्नी और महिला डॉक्टर के बीच विवाद मीडिया में सुर्खिया बना, पर पहाड़ में किसी महिला की चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से मृत्यु पर कोई चर्चा नहीं होती। उत्तरकाशी में पशुओं के लिए चारा इकट्ठा करने के दौरान चट्टान से फिसलकर खाई में गिरने से गंभीर रूप से घायल होने और फिर चिकित्सा सुविधाओं की कमी से महिला की मृत्यु की खबर को मीडिया में संक्षेप में स्थान मिलता है। यहां सवाल मीडिया में खबर प्रकाशित होने या नहीं प्रकाशित होने या फिर अंडर डिस्प्ले होने को लेकर नहीं है, प्रश्न इस बात का है कि 22 साल में भी राज्य में हालात क्यों नहीं बदल पाए, जबकि नये पर्वतीय राज्य के गठन की मूल अवधारणा विकास एवं बेहतर सेवाओं पर आधारित थी।

यह भी पढ़ें- उत्तराखंडःअफसर की पत्नी के इलाज के लिए घर पर डॉक्टर, तो इन महिलाओं की क्या गलती थी

हेल्थ इन्फ्रा में सुधार और हेली एंबुलेंस महत्वपूर्ण आवश्यकता
द नार्दर्न गैजेट के संपादक एसएमए काजमी कहते हैं, उत्तराखंड में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जब समय पर इलाज नहीं मिलने पर किसी रोगी की मृत्यु हो गई। लंबे समय से सुनने में आ रहा है हेली एंबुलेंस चालू कर दी गई है, पर इन एंबुलेंस से पहाड़ के दूरस्थ इलाकों से मरीजों को क्यों नहीं लाया जा रहा है। उत्तरकाशी की केंद्रा देवी को एयर एंबुलेंस से देहरादून लिफ्ट किया जाना चाहिए था, इससे उनकी जान बच सकती थी।

“उत्तराखंड में घास लेने जंगल गईं महिलाओं पर जानवरों के हमले, पेड़ से, चट्टान से महिलाओं के गहरी खाई में गिरने की घटनाएं सामने आती रही हैं। गर्भवती महिलाओं को कई किमी. पैदल चलकर मुख्य मार्गों पर एंबुलेंस तक आना पड़ रहा है। देहरादून के पास के ही हल्द्वाड़ी गांव की एक गर्भवती महिला को दो किमी. पैदल चलने के बाद उबड़ खाबड़ रास्ते से जीप से अस्पताल जाने को मजबूर होना पड़ा। रास्ते में उस महिला ने बच्चे को जन्म दिया। जब राजधानी के 40 किमी. पास के गांव में ऐसे हालात हैं, तो दूरस्थ की स्थिति क्या होगी।” काजमी सवाल उठाते हैं।

यह भी पढ़ें- देहरादूनः साढ़े पांच घंटे प्रसव पीड़ा से जूझी, खेतों से होते हुए दो किमी. पैदल चली महिला

उनका कहना है, पहले तो सरकार को पहाड़ में हेल्थ इन्फ्रा को दुरुस्त करना होगा। तहसील एवं जिला अस्पतालों की सेवाएं, सुविधाएं एवं संसाधन दुरुस्त करने होंगे। विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पर्वतीय जिलों में आपदाओं, जंगली जीवों के हमलों, सड़क दुर्घटनाओं को देखते हुए ऐसा करना सबसे महत्वपूर्ण एवं सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए। साथ ही, हेली एंबुलेंस तैनात करना तो यहां के लिए महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

उत्तरांचल प्रेस क्लब के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र अंथवाल सवाल उठाते हैं, 22 साल में राज्य के पहाड़ के जनपदों में वैसे ही हालात हैं, जैसे राज्य बनने से पहले थे। पहले भी समय पर इलाज नहीं मिलने से मृत्यु की सूचनाएं मिलती थीं और आज भी ऐसी ही सूचनाएं आ रही हैं। इनमें कोई बदलाव नहीं हुआ। अंथवाल याद दिलाते हैं, महिलाओं के कार्य बोझ को कम करने और उनको राहत देने के लिए राज्य के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के कार्यकाल में एक योजना पर बात हो रही थी, जिसके तहत घास के लिए घरों से जंगल की ओर कई किमी. चलने वाली महिलाओं के आराम करने के लिए रास्तों में शेड बनाए जाने थे, पर उन पर क्या काम हुआ, कोई जानकारी नहीं।

यह भी पढ़ें- Video- हम शर्मिंदा हैंः इसलिए एक दिन घस्यारी बनते हैं, बोझ उठाकर कुछ दूर चलते हैं

“घस्यारी योजना को ठीक विधानसभा चुनाव से पहले जोर-शोर से लांच किया गया, पर योजना आज कहां, पहाड़ में कितनी महिलाओं को इस योजना के बारे में जानकारी है, पता लगा सकते हैं। यदि यह योजना इतनी ही मजबूत और पशुपालक महिलाओं के लिए कल्याणकारी होती तो, फिर जंगलों में घास काटने के लिए महिलाओं को क्यों जाना पड़ रहा है,” अंथवाल सवाल उठाते हैं।

वो कहते हैं, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाएं मजबूत करने की जरूरत है। पहाड़ के अस्पतालों से गंभीर रोगियों को देहरादून रेफर करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है, क्या हम पर्वतीय राज्य के पर्वतीय इलाकों में अस्पतालों को संसाधनपूर्ण एवं सक्षम नहीं बना सकते। पर्वतीय जिलों में तुरंत रेस्क्यू के लिए हेली एंबुलेंस तत्काल जरूरत है।

क्या कहती मीडिया रिपोर्ट
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में परिवहन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में हर साल औसतन 951 लोगों की सड़क हादसों में मृत्यु होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक हैं कि सौ किमी के फासले पर एक ट्रामा सेंटर होना चाहिए, ताकि दुर्घटनाओं में घायल लोगों को तत्काल इलाज देकर उनकी जिंदगी बचाई जा सके। रिपोर्ट के अनुसार, या तो सरकार पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को शहरी क्षेत्रों की तरह मजबूत बनाए या फिर रोगियों और दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लोगों को तत्काल हायर सेंटर में इलाज कराने के लिए एयर एंबुलेंस की व्यवस्था कराए।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की एक्सीडेंटल डेथ पर एक रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में उत्तराखंड में भूस्खलन से मौत का आंकड़ा 73 में से 44 मौत है।

अप्रैल, 2022 में धारचूला व्यास घाटी के गर्ब्यांग गांव के छिंदू तोक के जंगल में लगी आग बुझाने के दौरान एक महिला पहाड़ से गिरे बोल्डर की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गई। परिजन और एसएसबी के जवान महिला को पैदल धारचूला सीएचसी ला रहे थे, लेकिन दस किलोमीटर की दूरी तय करते-करते महिला ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।- स्रोत

उत्तरकाशी की जुलाई, 2021 की एक खबर में कहा गया है, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पुरोला में तीन दिन के भीतर दो प्रसूति महिलाओं और उनके नवजात शिशुओं की मौत के बाद रवांई घाटी के ग्रामीणों सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व विभिन्न राजनीतिक दलों के लोगों में आक्रोश है। बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सीएम पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन भेजा गया।

इसी साल जनवरी में, एक समाचार के मुताबिक कपकोट तहसील के दूरस्थ गांव हामटीकापड़ी गांव की 43 साल की महिला की चट्टान से गिरकर मृत्यु हो गई। वह जानवरों के लिए चारा लेने पास के जंगल में गई थी।

एक अन्य खबर के अनुसार, पिछले साल मार्च में बागेश्वर जिले में चारा काटते समय पेड़ से गिरकर एक महिला की मृत्यु हो गई।

उत्तराखंड से कुछ खबरें और हैं-

अल्मोड़ा का भैसियाछाना ब्लाक , जो जिला मुख्यालय से करीब 50 किमी. दूर है। इसी ब्लाक में पतलचौरा नाम का गांव है, जिसमें 15 से 20 परिवार रहते हैं। चार जनवरी, 2022 की रात पतलचौरा गांव की एक महिला को प्रसव पीड़ा हुई। परिजनों ने महिला को डोली में बैठाकर सर्द रात में बारिश के बीच लगभग पांच किमी. चढ़ाई पार करके सड़क तक पहुंचने का निर्णय लिया। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और सड़क तक पहुंचने के लिए पूरी शक्ति के साथ आगे बढ़ते रहे। आधे रास्ते में डोली में ही बच्चे का जन्म हो गया।

28 अक्तूबर, 2021 की  बृहस्पतिवार रात धौलादेवी ब्लॉक निवासी 22 वर्ष की महिला को प्रसव पीड़ा हुई। सड़क बंद होने के कारण घर में ही प्रसव के बाद महिला की हालत खराब होने पर उनको अस्पताल ले जाने की नौबत आई, लेकिन बंद सड़क के कारण महिला को जान गंवानी पड़ी।

29 जून, 2021 को पिथौरागढ़ जिले के नामिक गांव में गर्भवती महिला को आपदा में ध्वस्त पैदल रास्तों से डोली के सहारे 10 किमी पैदल चलकर बागेश्वर जिले के गोगिना गांव पहुंचाया। इसके बाद 35 किमी दूर वाहन से कपकोट अस्पताल ले जाया गया। यहां सुरक्षित प्रसव हो गया है।

17 सितंबर 2017 को अल्मोड़ा के धारानौला क्षेत्र में महिला को सड़क पर ही बच्चे को जन्म देना पड़ा। एंबुलेंस उस जगह पर नहीं पहुंच सकी थी।

17 जनवरी, 2020 को पिथौरागढ़ के मुनस्यारी तहसील के मालूपाती गांव तक सड़क नहीं होने पर गर्भवती महिला को माइनस तीन डिग्री तापमान में खेत में ही शिशु को जन्म देने को मजबूर होना पड़ा।

चंपावत के डांडा में 22 जून,2016 को 23 साल की गर्भवती महिला की हालत बिगड़ने लगी। ग्रामीणों ने महिला को कंधों के सहारे 25 किमी पैदल दूरी लांघ रोड हैड पर कलोनियां पहुंचाया।

 

You Might Also Like

उत्तराखंड मतगणना रुझान डिटेल मेंः खटीमा में धामी पीछे चल रहे, 68 सीटों के रुझान में भाजपा 44 पर आगे
उत्तराखंड चुनावः रामनगर से माफी मांगी और लालकुआं से यह बोले, हरीश रावत
कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों से घबराने की आवश्यकता नहीं
AIIMS Rishikesh में एक अप्रैल से कटे होंठ और तालू की निःशुल्क सर्जरी
Eye Safety : एम्स ने पब्लिक लेक्चर में बताए आंखों की सुरक्षा के खास उपाय
TAGGED:Ghasyari Kalyan YojanaHealth Infra in UttarakhandHeli Ambulance Service in UttarakhandPublic health infrastructureUttarakhand Health ServicesWomen in Uttarakhand
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Email Copy Link Print
ByRajesh Pandey
Follow:
newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
Previous Article देखें कैलेंडर, इस साल कब-कब होंगी UKSSSC की भर्ती परीक्षाएं
Next Article फिर से संवर रहे 162 साल पुराने चौबटिया गार्डन की खास बातें
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

https://newslive24x7.com/wp-content/uploads/2026/04/CM-Dhami-4-Year-Journey-2026-2-Min-1.mp4

Sajani Pandey Editor newslive24x7.com

Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun
Prem Nagar Bazar Doiwala Dehradun Doiwala, PIN- 248140
9760097344
© 2026 News Live 24x7| Developed By: Tech Yard Labs
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?