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देहरादूनः साढ़े पांच घंटे प्रसव पीड़ा से जूझी, खेतों से होते हुए दो किमी. पैदल चली महिला

राजधानी के पास हल्द्वाड़ी गांव में अस्पताल जाते हुए महिला ने बच्चे को जन्म दिया

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

उत्तराखंड की राजधानी में स्वास्थ्य सचिव की पत्नी के इलाज के लिए महिला डॉक्टर को ओपीडी के दौरान उनके घर भेजा गया और आरोप है कि अफसर की पत्नी ने डॉक्टर से अभद्रता की। जब इस प्रकरण पर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं जोरों पर थीं, उसी समय राजधानी से करीब 40 किमी. दूर डोईवाला विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में प्रसव पीड़ा से जूझ रही एक महिला जोखिम उठाते हुए खेतों को पैदल पार कर रही थी।

इन खेतों की दो किमी. की दूरी पार करके उनको गांव के आंगनबाड़ी केंद्र के पास पहुंचना था, जहां से करीब पांच किमी. का कच्चा औऱ उबड़ खाबड़ रास्ता जीप से तय करना था।  सुबह चार बजे से लेकर साढ़े नौ बजे तक प्रसव पीड़ा से जूझी महिला ने रास्ते में जीप में ही बच्चे को जन्म दिया। सौभाग्य से दोनों स्वस्थ हैं।

यह मामला देहरादून से मात्र 40 किमी. दूर हल्द्वाड़ी गांव का है। महिला के पति गोविंद सिंह बताते हैं, उनकी पत्नी प्रिया, जिनकी आयु 21 वर्ष है, का इलाज रायपुर और डोईवाला अस्पताल से चल रहा है। शुक्रवार सुबह करीब चार बजे पत्नी को अचानक प्रसव पीड़ा हुई। उसी समय से हमने गांव में जीप का इंतजाम करना शुरू कर दिया।

गांव तक नहीं बनी पांच किमी. सड़क
खेतीबाड़ी करने वाले गोविंद बताते हैं, गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए करीब पांच किमी. का कच्चा और ऊबड़ खाबड़ रास्ता पार करना होता है। इस कच्चे रास्ते पर गिनी चुनी जीप ही चलती हैं, पर उस समय एक जीप आंगनबाड़ी केंद्र के पास खड़ी थी, लेकिन उसका ड्राइवर गांव से दूर था। ड्राइवर का फोन भी नहीं लग रहा था। हमारे पास जो भी फोन नंबर थे, सभी को मिला लिया, पर किसी से बात नहीं हो सकी। किसी तरह ड्राइवर का पता चल गया कि वो कहां हैं। हमारे साथी उनको लेने चले गए।

गोविंद बताते हैं, हमारा घर उस स्थान (आंगनबाड़ी केंद्र) से भी कई खेत आगे है, जहां से गांव की जीप मिलती है। गांव में जीप या बड़े वाहन का रास्ता आंगनबाड़ी केंद्र से आगे नहीं है।

सुबह करीब सात बजे पत्नी को प्रसव पीड़ा बहुत ज्यादा हो गई। हम सभी परेशान हो गए। उस समय तक जीप का इंतजाम नहीं हो पाया था। हमने उनको पैदल ही उस रास्ते तक ले जाने का निर्णय लिया, जहां से जीप मिलती है। हमारे साथी ड्राइवर को लेने के लिए गए थे। इस दौरान हमने 108 एंबुलेंस सेवा को भी फोन कर दिया, जो थानो से उस जगह (धारकोट) के लिए रवाना हो गई, जहां से गांव का कच्चा रास्ता शुरू होता है।

हल्द्वाड़ी निवासी गोविंद सिंह औऱ उनकी पत्नी प्रिया, बीच में नवजात बच्चे को गोद में लेकर बैठीं दादी बिजना देवी। फोटो- गोविंद सिंह ने भेजा है।

प्रसव पीड़ा से जूझते हुए पार किए कई खेत और चढ़ाई
गोविंद बताते हैं, पत्नी को आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुंचाना कठिन और जोखिमभरा काम था। हमें उनको लेकर कई खेतों को पार करना था। इस बीच रास्ते में काफी चढ़ाई भी थी। मां और अन्य महिलाओं के सहयोग से पैदल ही सहारा देकर पत्नी को गांव के आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुंचा दिया। इस दौरान पत्नी ने काफी कष्ट झेला, पर हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। उनको जोखिम के बीच ही वहां तक पहुंचना था। शुक्र है, तब तक ड्राइवर भी पहुंच गया था।

हम जीप से उनको लेकर धारकोट की ओर रवाना हो गए, जहां से 108 एंबुलेंस से लेकर अस्पताल जाना था। वो बताते हैं, हमारे गांव के खराब रास्ते की वजह से एंबुलेंस भी नहीं आ पाती है। एंबुलेंस तक पहुंचने के लिए जीप से ही पांच किमी. चलना पड़ता है।

जीप में हुआ बच्चे का जन्म, मां-बेटा दोनों स्वस्थ
गोविंद ने बताया, करीब दो किमी. भी नहीं चले होंगे, जीप में ही पत्नी ने करीब साढ़े नौ बजे बेटे को जन्म दिया। उनकी मां बिजना देवी ने साथ की महिलाओं के सहयोग से सुरक्षित प्रसव कराया। सौभाग्य से पत्नी और बेटा दोनों स्वस्थ हैं। उनका कहना है, हमारे गांव तक सड़क की मांग वर्षों पुरानी है। सही रास्ता नहीं होने की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन की सुविधाएं हमसे दूर हैं।

इसी गांव की वर्षों पुरानी एक और कहानी, जब बारिश में हुआ बिटिया का जन्म
” मैं उस रात को कभी नहीं भूल सकता। बहुत तेज बारिश हो रही थी। गांव से सड़क तक जाने वाला कच्चा रास्ता बंद हो गया था। मेरी पत्नी प्रसव पीड़ा से व्यथित थीं। उनको जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना था। अस्पताल गांव से बहुत दूर है और हमें तेज बारिश में ही जंगल का पांच किमी. ऊबड़ खाबड़ रास्ता तय करना था। ग्रामीणों के सहयोग से हम किसी तरह एक दूसरे के सहारे आगे बढ़ रहे थे। मुझे याद है, उस समय रात के 12 बजकर 20 मिनट पर, मेरी बिटिया ने रास्ते में ही बारिश में जन्म लिया।”

हल्द्वाड़ी गांव निवासी गंभीर सिंह। फोटो- डुगडुगी

आठ साल पहले की यह बात सुनाते हुए करीब 35 वर्षीय गंभीर सिंह सोलंकी, ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हैं। कहते हैं, मुझे हमेशा इसी बात का डर रहता है कि ऐसा किसी के साथ न हो। उनकी बिटिया अब आठ साल की हो गई है। पर, हल्द्वाड़ी गांव से अस्पताल अभी भी, पहले जितना ही दूर है और रास्ता भी उसी हाल में है। हालांकि, गांव वालों ने श्रमदान करके इसको यूटिलिटी चलने लायक बना दिया है, लेकिन जोखिम हमेशा बरकरार है।

“हम बचपन से सुन रहे हैं कि हमारे गांव तक रोड आएगी, रोड आएगी, पर यह कब आएगी। मेरा भाई, गांव से पलायन कर गया। मैं भी, यहां से परिवार को लेकर चला जाऊँगा। मैंने थानो के एक स्कूल में बिटिया का एडमिशन करा दिया है। बेटे का भी वहीं एडमिशन करा दूंगा। आप यहां स्कूल भवन की हालत देख सकते हो। बच्चों को पढ़ाई के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है, ” यह कहते हुए सोलंकी भावुक हो जाते हैं।

उधर, गांव के सामाजिक कार्यकर्ता अरुण सिंह नेगी का कहना है, गांव तक सड़क नहीं बनने से पूरा गांव मुश्किलों का सामना कर रहा है। सड़क नहीं होने से गांव के बच्चों को स्कूल के लिए कई किमी. पैदल चलना पड़ रहा है। हमारा गांव सुविधाओं से वंचित है, ऐसा लगता है कि हम राजधानी के पास नहीं बल्कि यहां से सैकड़ों किमी. दूर रह रहे हैं, जहां तक शासन और प्रशासन की नजरें नहीं पहुंच सकतीं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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