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हरीश रावत ने अल्मोड़ा को लेकर बड़े संकेत दिए

देहरादून। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने  2022 का विधानसभा चुनाव अल्मोड़ा से लड़ने के साफ संकेत दिए हैं। उनका कहना है, मैं चुनाव जीता या हारा, प्यार अल्मोड़ा ने केवल मुझसे ही किया और मैं भी कहीं से लौट के आऊं। जैसे कहते हैं “उड़ी जहाज को पंछी, फिर जहाज पे आयो”।
मालूम हो कि वर्ष 2017 में हरीश रावत ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा था। ये दोनों सीटें किच्छा और हरिद्वार (ग्रामीण) मैदानी क्षेत्र से हैं। रावत, दोनों सीटों पर ही हार गए थे।
इन दिनों रावत आपदा ग्रस्त इलाकों के दौरे पर हैं। रविवार को उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में अल्मोड़ा को लेकर बड़ा संकेत दिया है।
उन्होंने लिखा है- अल्मोड़ा से आते-जाते वक्त मन हमेशा जरा भारी सा हो जाता है, न जाने क्या ऐसा है! अल्मोड़ा ने मुझे बनाया, तो अल्मोड़ा से ही मैं ध्वस्त होकर के गया भी।
लेकिन, एक बात हमेशा रही, मैं चुनाव जीता या हारा, प्यार अल्मोड़ा ने केवल मुझसे ही किया और मैं भी कहीं से लौट के आऊं। जैसे कहते हैं “उड़ी जहाज को पंछी, फिर जहाज पे आयो”।
मुझसे कोई पूछे कि कहां लौटना चाहते हो! तो मैं मोहनरी का नाम लूंगा, मैं अल्मोड़ा व अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र का नाम लूंगा।
हां, हरिद्वार को जरूर इस कड़ी में मैं कभी नहीं भूल सकता। उन्होंने मुझको उस समय सहारा दिया, जिस समय मैं पूरी तरीके से बिखर सकता था। इसलिये अब चुनाव जीतूं-हारूं, मगर मैं हरिद्वार के प्रति समर्पित रहता हूंँ।
उत्तराखंड, 2017 के चुनाव में तो मेरी बाह नहीं थाम पाया, मगर मैंने उत्तराखंड और उत्तराखण्डियत से प्यार करना नहीं छोड़ा।
मगर, एक बात मैं खुलकर के बहुत स्पष्ट भाव से उत्तराखंड से कहना चाहता हूंँ, यदि सचमुच  उत्तराखंडियत और उत्तराखंड राज्य आंदोलन के मूलभूत भावनाओं से आपको प्यार है तो यह अंतिम अवसर है कि आप उत्तराखंडियत और उत्तराखंड को समझने वाले लोगों को आगे ला सकते हैं।
जिस तरीके के हाथों में 2017 में आपने बागडोर दी, मैं आपको उलाहना नहीं दे रहा हूंँ। मगर इतना अवश्य कहना चाहता हूँ कि वो आपके प्यार व समर्थन का मूल्य नहीं समझ पाए।
उन्होंने आपको 5 साल आगे बढ़ाने के बजाय 5-10 साल पीछे धकेल दिया है। उत्तराखंडियत और उत्तराखंडियत से जुड़ी हुई भावनाएं समझने के लिए यह मुझ जैसे लोगों की अंतिम पीढ़ी है और वो पीढ़ी धीरे-धीरे कब गुजर जाएगी उस पर गौर करना आवश्यक है, तो आओ एक बार फिर उत्तराखंड, उत्तराखंडियत व अल्मोड़ियत की रक्षा के लिए उठकर के खड़े हों। यहां ये चुनाव 2022 इसी का चुनाव है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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