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उत्तराखंड में कोविड के बाद किसानों पर दूसरा बड़ा संकट

देहरादून। कोविड-19 के संक्रमण के बाद उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों के किसान परिवारों पर अतिवृष्टि बड़ी आपदा बनकर टूटी है। ग्रामीण इलाकों में आजीविका के बड़े स्रोत कृषि, खासकर दूसरे नंबर की सबसे बड़ी फसल धान की खेती के संदर्भ में देखा जाए तो इसको हुए नुकसान का सही आकलन करके सही मुआवजा देकर ही किसानों को कुछ राहत दी जा सकेगी।

उत्तराखंड राज्य में, कोविड-19 के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने गांवों की ओर लौटे हैं। उत्तराखंड राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बताया गया है, कोविड  के दौरान एक रैपिड सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 25 फीसदी व्यक्तियों ने कृषि तथा सहवर्गीय क्षेत्रों में कार्य करने पर अपनी सहमति जताई है, जो निश्चित रूप से यह दर्शाता है कि प्रवासी कामगार जो सामान्यतः शहरी क्षेत्रों होटल, रेस्टोरेन्ट तथा आतिथ्य (हॉस्पिटिलिटी) क्षेत्र में कार्य करते थे, इस क्षेत्र में कार्य करने को तैयार हैं।

रिपोर्ट से साफ होता है कि कोविड-19 के बाद उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में आजीविका के संसाधनों, विशेषकर कृषि पर पहले से अधिक तेजी से कार्य करने की आवश्यकता है।

अब यह देखना है, जब उत्तराखंड में खेती एवं इससे जुड़े कार्यों पर निर्भरता बढ़ी है, तब सरकार कृषि एवं इससे जुड़े रोजगार को ज्यादा से ज्यादा लोगों की आजीविका बनाने के लिए क्या नये प्रावधान लेकर आती है, यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि कोविड के दौरान सामने आए आंकड़े इस दिशा में काम करने के लिए जोर दे रहे हैं।

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उत्तराखंड राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार, राज्य में यदि मात्र कृषि क्षेत्र को ही देखा जाए तो यहां वर्ष 2001 की तुलना में कुल जनसंख्या के सापेक्ष कुल कार्यबल वर्ष 2011 में 27.48 फीसदी से बढ़कर 30.98 फीसदी हुआ है, जो भारत के 30.39 फीसदी (2001) तथा 33.24 फीसदी (2011) के सापेक्ष कम है।

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” चूंकि राज्य के अधिकांश क्षेत्र में कृषि जोत छोटी व बिखरी होने के कारण कृषि कार्य अत्यन्त चुनौतीपूर्ण है। 70 प्रतिशत ग्रामीण आबादी आजीविका संवर्द्धन अन्य सहवर्गीय तथा क्रियाकलापों, जैसे कि उद्यानीकरण, दुग्ध उत्पादन, जड़ी-बूटी उत्पादन, मत्स्य उत्पादन, पशुपालन, जैविक कृषि, संगन्ध पादप, मौन पालन, सब्जी उत्पादन तथा इनसे सम्बन्धित लघु उद्योगों पर निर्भर करती है”, आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कहा गया है।

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अब बात करते हैं, उत्तराखंड में फसल पद्धति (क्रापिंग पैटर्न) की,जिसके अनुसार यहां गेहूं मुख्य फसल है, जो कुल बोए गए क्षेत्रफल का 31 फीसदी है। दूसरे नंबर में धान की खेती आती है, जिसका क्षेत्रफल 23 प्रतिशत है।

उत्तराखंड में अतिवृष्टि से धान की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है, वो इसलिए क्योंकि यह समय धान की फसल काटने का था। या तो खेतों में फसल तैयार खड़ी है या फिर काट कर खेतों में ही पड़ी है।

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कृषि एवं औद्योनिकी विशेषज्ञ डॉ. आरपी कुकसाल अनुमान लगाते हैं कि अतिवृष्टि से पर्वतीय क्षेत्रों में धान की फसल को 50 से 70 फीसदी तथा मैदानी इलाकों में लगभग 20 से 30 फीसदी नुकसान हुआ है।

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”पहाड़ में फसल देरी से काटी जाती है, इसलिए वहां अधिकांश धान खेतों में ही खड़ा था। जो भी धान बचा होगा, उसमें नमी होगी। सरकारी स्तर पर खरीद के नियमों में नरमी बरते जाने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं हुआ तो किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है”, डॉ. कुकसाल कहते हैं।

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डोईवाला क्षेत्र के उन्नतशील किसान उमेद बोरा बताते हैं कि लगभग 400 बीघा में धान की अलग-अलग किस्में बोई थीं, जिनमें मुख्य रूप से कस्तूरी बासमती शामिल है, तेज बारिश से लगभग 20 फीसदी फसल बर्बाद होने का अनुमान है। अभी फसल खेतों में ही कटी पड़ी है, उसको दो दिन बाद ही उठाएंगे। यदि बारिश फिर हुई तो किसान के पास फसल उठाने की कोई वजह नहीं होगी।

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बोरा बताते हैं कि धान की फसल का बीमा होता है, पर यह किसी निजी एजेंसी को दिया है। विभाग के स्तर से इस संबंध में कोई प्रचार प्रसार नहीं होता। बीमा की रकम पाने के लिए तमाम औपचारिकताएं पूरी कराई जाती हैं। कहते हैं, राजस्व विभाग किसानों को हुए नुकसान का सही आकलन नहीं करता। विभाग के अनुसार, फसल हमेशा अच्छी ही होती है।

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वहीं, आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में मौसम आधारित फसल बीमा योजना खरीफ में आलू, अदरक, टमाटर, मिर्च, फ्रैंचबीन और रबी मौसम में सेब, आड़ू, माल्टा, संतरा, मौसम्बी, लीची,आम, आलू, टमाटर मटर के लिए संचालित है।

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उत्तराखंड में कोविड के बाद कृषि पर बढ़ी निर्भरता, बारिश से फसलों को भारी नुकसान, बारिश पर उपज की निर्भरता जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए मुख्य फसलों का भी बीमा होना आवश्यक माना जा रहा है। इससे जहां मैदान एवं पर्वतीय इलाकों में कृषि को लाभकारी बनाया जा सकेगा, वहीं उनकी आय दोगुनी करने की दिशा में काम हो सकता है।

 

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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