देहरादून, 9 अक्तूबर: एम्पावर सोसाइटी ने देहरादून में एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को ध्यान में रखते हुए ‘थ्री बॉटम लाइन अप्रोच’ यानी पीपल, प्लैनेट और प्रॉफिट के त्रिकोणीय मॉडल पर आधारित एक दूरदर्शी परियोजना पर गहन मंथन हुआ।
एम्पावर सोसाइटी की सचिव मोनीदीपा सरमा ने कार्यशाला की जानकारी देते हुए बताया कि यह परियोजना आजीविका संवर्धन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि परियोजना का उद्देश्य केवल आय अर्जन तक सीमित न रहकर प्रकृति की वहन क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) के अनुरूप संतुलित विकास सुनिश्चित करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इसका लाभ उठा सकें।
कार्यशाला में यूके से आए कैम्ब्रिज स्कॉलर एवं वैज्ञानिक डॉ. कल्याण सरमा ने कहा कि आधुनिक विकास में आजीविका और पर्यावरण को अलग-अलग देखने के बजाय एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने ‘पीपल, प्लैनेट और प्रॉफिट’ मॉडल पर प्रकाश डालते हुए कहा, “हमारी पृथ्वी एक ही है और उसकी वहन क्षमता की अपनी सीमाएं हैं। यदि हम केवल आर्थिक लाभ की बात करेंगे और पर्यावरण की अनदेखी करेंगे, तो विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। हमें ऐसे मॉडल विकसित करने होंगे, जहां ग्रामीण अपनी आजीविका भी संवारें और साथ ही प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी सुनिश्चित हो। कैम्ब्रिज और अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय समुदाय को जोड़कर हम इस दिशा में एक अनुकरणीय उदाहरण स्थापित करेंगे। जनवरी 2027 से इस परियोजना का प्रभावी क्रियान्वयन शुरू होगा।

साउथ एशिया नार्थ ईस्ट अलायंस व फाइव मरमेड्स के प्रेसीडेंट त्रिदीप चक्रवर्ती ने जमीनी अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने कहा, “विगत वर्षों में सोल डूंगरी बेल्ट, बागेश्वर, झूनी, सूपी और बेमरू फार्म आदि क्षेत्रों के भ्रमण के दौरान हमने देखा कि यहां के लोगों में अद्भुत क्षमता है। हमारा उद्देश्य इको-टूरिज्म, मत्स्य पालन (फिशरीज), पारंपरिक हस्तशिल्प और प्राकृतिक रेशों (नेचुरल फाइबर्स) जैसे क्षेत्रों को वैज्ञानिक और संगठित रूप देना है। यह परियोजना स्थानीय महिलाओं और युवाओं को न केवल स्वरोजगार से जोड़ेगी, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और पर्यावरण संरक्षण को भी नई मजबूती प्रदान करेगी।”
परियोजना के मुख्य स्तंभ:
- एसडीजी और त्रिकोणीय मॉडल: ‘पीपल, प्लैनेट, प्रॉफिट’ मॉडल के तहत पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सेरीकल्चर, इको-टूरिज्म, हैंडीक्राफ्ट, नेचुरल फाइबर और फिशरीज के माध्यम से टिकाऊ आजीविका को बढ़ावा दिया जाएगा।
- वार्षिक लक्ष्य एवं कार्ययोजना: आगामी 7 वर्षों के लिए प्रस्तावित इस परियोजना में प्रति वर्ष न्यूनतम 500 परिवारों को सशक्त बनाने का लक्ष्य तय किया गया है।
- स्थानीय नेतृत्व व टीओटी (TOT) ढांचा: बाहरी निर्भरता को समाप्त कर स्थानीय स्तर पर ही क्षमता निर्माण के लिए ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स (TOT), ट्रेनर्स और मास्टर ट्रेनर्स की त्रिस्तरीय प्रणाली तैयार की जाएगी। इसके साथ ही, प्रचार-प्रसार सामग्री को सुरुचिपूर्ण व सरल भाषा में तैयार कर जन-जन तक पहुंचाया जाएगा।





