Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: देहरादून, 09 अक्तूबर, 2026ः ‘रेडियो केदार’ के स्टूडियो में जर्नलिस्ट राजेश पांडेय से एक विशेष परिचर्चा में देश के जाने-माने रूमेटोलॉजिस्ट और क्लिनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट डॉ. राजीवा गुप्ता ने अपने क्लिनिकल सफर, ऑटोइम्यून बीमारियों की जटिलताओं, दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग, स्वास्थ्य प्रणाली की जमीनी हकीकत और मेडिकल छात्रों के करियर पर विस्तार से बात की।
वर्तमान में मेदांता द मेडिसिटी (गुरुग्राम) में क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी विभाग के चेयरमैन और मानव भारती सोसाइटी (देहरादून) के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. राजीवा गुप्ता ने पटना मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस, मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज से एमडी किया है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में फैकल्टी के रूप में सेवाएं दी हैं। एम्स के बाद यूनाइटेड किंगडम (UK) में लंबे समय तक उच्च स्तरीय क्लिनिकल प्रशिक्षण प्राप्त किया और पुनः स्वदेश लौटे।
क्लिनिकल यात्रा और भारत में सुपर-स्पेशियलिटी की शुरुआत
रेडियो केदार पर प्रसारित वार्ता में डॉ. राजीवा गुप्ता ने कहा कि सामान्यतः मेडिकल ग्रेजुएशन में सभी एमबीबीएस और उसके बाद एमडी करते हैं, जो उन्होंने मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज से पूरा किया। इसके बाद जब उन्होंने एम्स, नई दिल्ली में सीनियर रेजिडेंट के रूप में जॉइन किया, तब उन्हें महसूस हुआ कि कई महत्वपूर्ण स्पेशियलिटीज अभी भारत में विकसित नहीं हुई हैं। यह जनरल मेडिसिन का ही एक अहम हिस्सा है और कई सामान्य बीमारियों के साथ जुड़ा हुआ है। इसी आवश्यकता को देखते हुए वे वर्ष 1994 से क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी और रूमेटोलॉजी विभाग से जुड़े।
डॉ. गुप्ता ने समझाया कि मानव शरीर के सभी अंगों का नियंत्रण कुछ विशेष हार्मोन्स और रासायनिक पदार्थों (Substances) के माध्यम से होता है, जो इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) को या तो स्टिमुलेट (उत्तेजित) करते हैं या सप्रेस (दबाते) हैं। सामान्य स्थिति में यह नाजुक संतुलन बना रहता है। लेकिन कई परिस्थितियों में जब यह डेलिकेट बैलेंस बिगड़ (डिसरेगुलेट) जाता है, तो शरीर के इम्यून सेल्स हाइपरएक्टिव (अत्यधिक सक्रिय) हो जाते हैं।
रूमेटाइड अर्थराइटिस और ऑटोइम्यून बीमारियां: केवल जोड़ों का दर्द नहीं
डॉ. गुप्ता ने स्पष्ट किया कि रूमेटाइड अर्थराइटिस (RA) और एसएलई (SLE) जैसी बीमारियां वास्तव में ऑटोइम्यून डिज़ीज़ हैं। आम आदमी इसे साधारण ‘गठिया’ के नाम से जानता है, क्योंकि मरीज को जोड़ों में दर्द होता है और वह इसी समस्या को लेकर डॉक्टर के पास पहुंचता है। जबकि मस्कुलोस्केलेटल सिस्टम (जोड़ों का तंत्र) तो शरीर का केवल एक अंग-तंत्र भर है। जब इम्यून सेल्स हाइपरएक्टिव हो जाते हैं, तो वे शरीर के हर अंग को प्रभावित करते हैं—जिसमें फेफड़े (Lungs), हृदय (Heart), आंखें (Eyes), मुंह का सूखापन और किडनी तक शामिल हैं।
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: 90 के दशक को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उस दौर में अर्थराइटिस के मरीज ऑर्थोपेडिशियन, जनरल फिजिशियन या पैरामेडिक्स के चक्कर काटते रहते थे और यह धारणा आम थी कि यह बीमारी लाइलाज है। उस समय लोग यह नहीं समझ पाते थे कि इस बीमारी के असर से फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं और हृदय रोग बहुत जल्दी पनप सकता है।
एम्स से सीनियर रेजिडेंसी पूरी करने के बाद नए विचार और वैश्विक अनुभव जुटाने के उद्देश्य से वे 1997 में यूके चले गए। वहां 4–5 साल उच्च स्तरीय क्लिनिकल प्रशिक्षण लेने के बाद 2001 में भारत लौटे और एम्स में फैकल्टी के रूप में कार्यभार संभाला। वहां उन्होंने अपने दो-तीन सहयोगियों के साथ मिलकर क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी और रूमेटोलॉजी विभाग की स्थापना की और इसे आगे बढ़ाया। बाद में, एम्स छोड़कर मेदांता अस्पताल से जुड़े। डॉ. गुप्ता के अनुसार, लगभग हर बीमारी में इम्यून मैकेनिज्म की अहम भूमिका होती है।
मलेरिया और टायफाइड: मलेरिया में बुखार उतरने के बाद भी ऑटोइम्यून प्रभाव के कारण दूसरे सिस्टम प्रभावित होने लगते हैं। इसी तरह टायफाइड में संक्रमण ठीक होने के बाद की जटिलताएं हाइपरएक्टिव इम्यून सिस्टम के कारण सामने आती हैं।
कोविड-19 का उदाहरण: कोविड एक वायरल संक्रमण था। वायरस शरीर में 5 से 7 दिन रहने के बाद बाहर निकल जाता था, लेकिन उसे नियंत्रित करने के प्रयास में शरीर का इम्यून सिस्टम हाइपरएक्टिव हो जाता था। इसके चलते इम्यून सेल्स शरीर के अपने सेल्स को डैमेज करने लगते थे, फेफड़ों में फाइब्रोसिस (सिकुड़न) हो जाती थी और सांस में भारी तकलीफ होने लगती थी।
ल्यूपस (SLE), स्क्लेरोडर्मा, मायोसाइटिस, डर्मेटोमायोसाइटिस, नसों की बीमारियां, इंटरस्टीशियल लंग डिज़ीज़ (ILD) और किडनी की ल्यूपस नेफ्राइटिस जैसी तमाम व्याधियां इसी श्रेणी में आती हैं। जब श्वसन रोग विशेषज्ञ यह देखते हैं कि सांस की तकलीफ के अलावा अन्य अंगों में भी असर है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह समस्या इम्यून मैकेनिज्म से जुड़ी है।
रूमेटोलॉजी का सीधा संबंध रूमेटिक दर्द से है, और अर्थराइटिस कोई एक बीमारी नहीं बल्कि इसके 100 से भी अधिक प्रकार होते हैं।
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: भारत में 140 करोड़ की आबादी में करीब 1 प्रतिशत लोग रूमेटाइड अर्थराइटिस से पीड़ित हैं, यानी लगभग 1.4 करोड़ मरीज। इन मरीजों को हर 3 से 6 महीने में नियमित फॉलो-अप की दरकार होती है। इसके विपरीत, पूरे देश में प्रशिक्षित रूमेटोलॉजिस्ट्स की संख्या 3,000 भी नहीं है। भारी मांग और विशेषज्ञों की भारी कमी के कारण अच्छे सेंटर्स पर महीनों लंबी वेटिंग लिस्ट रहती है। मेदांता में क्लिनिकल दायित्वों के साथ-साथ डॉ. गुप्ता अध्यापन भी करते हैं, जहां हर साल दो डीएम/डीएनबी (सुपर स्पेशियलिटी) छात्रों को प्रशिक्षित किया जाता है और किसी भी समय छह छात्र उनके अधीन प्रशिक्षणरत रहते हैं।
स्पेशियलिटी चुनने की प्रेरणा और समय पर उपचार का महत्व
डॉ. गुप्ता ने बताया कि मेडिसिन में हर डॉक्टर बौद्धिक और क्लिनिकल चुनौतियों की तलाश में रहता है। जब मल्टी-सिस्टम इन्वॉल्वमेंट होता है, तो क्लिनिकल चैलेंज काफी बढ़ जाता है। इम्यूनोलॉजी में आने से बीमारी की समझ गहरी हो जाती है, जैसे यह जानना कि लिम्फोसाइट्स और बी-सेल्स की हाइपरएक्टिविटी से नुकसान हो रहा है और दवाओं से उनकी इस सक्रियता को नियंत्रित किया जा सकता है।
पहले के समय में अर्थराइटिस के कारण मरीजों के हाथ पूरी तरह मुड़ जाते थे और वे झुककर चलने को विवश हो जाते थे। डॉ. गुप्ता का कहना है कि यदि मरीज सही समय पर विशेषज्ञ के पास पहुंचे, तो उन्हें आजीवन सामान्य दिनचर्या की गारंटी दी जा सकती है; लेकिन जो अंग एक बार डैमेज हो गया, उसे दोबारा ठीक नहीं किया जा सकता। जब वे रूमेटाइड के मरीज की छाती पर स्टेथोस्कोप रखते हैं और क्रेपिटेशन्स (फेफड़ों में सिकुड़न की आवाज) सुनाई देती है, तो मरीज उसे दमा समझ बैठता है, जबकि वह गठिया का फेफड़ों पर असर होता है। इम्यूनोलॉजिकल प्रक्रिया को नियंत्रित करते ही जोड़ों के साथ-साथ फेफड़े और दिल की समस्याएं भी संभलने लगती हैं।
दर्द निवारक दवाएं: ‘उपयोगी विष’ (Useful Poison) और पॉलीफार्मेसी
भारत में मेडिकल स्टोर से ओवर द काउंटर (बिना पर्चे) पेनकिलर खरीदने के चलन को डॉ. गुप्ता ने बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने दवा को परिभाषित करते हुए कहा:
“मेडिसिन एक उपयोगी विष (Useful Poison) है।”
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: दवा तब तक उपयोगी है जब तक इसे किसी जानकार क्लिनिशियन द्वारा निर्धारित किया जाए। बाजार में मिलने वाली आम दर्द निवारक दवाएं मरीज के लिए जानलेवा भी साबित हो सकती हैं।
बुजुर्ग मरीजों में ‘पॉलीफार्मेसी’ (Polypharmacy) के खतरे को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि उम्र के साथ दिल, फेफड़े, किडनी और जोड़ों की कई बीमारियां एक साथ घेर लेती हैं। मरीज अलग-अलग विभागों के डॉक्टरों के पास जाते हैं और सभी विशेषज्ञ अपनी-अपनी दवाएं, कैल्शियम, विटामिन डी और दर्द की गोलियां लिख देते हैं। कई दवाओं के साल्ट एक जैसे होते हैं और दवाओं की संख्या जितनी बढ़ेगी, उनका आपस में ड्रग-इंटरेक्शन (दुष्प्रभाव) उतना ही खतरनाक होगा। इसलिए मरीज की संपूर्ण स्थिति की निगरानी के लिए एक मुख्य जनरल फिजिशियन का होना अनिवार्य है। दिल के मरीजों को लगातार पेनकिलर या एंटी-इन्फ्लेमेटरी दवाएं नहीं दी जा सकतीं, और किडनी की बीमारी में तो ये दवाएं पूरी तरह वर्जित (Contraindicated) होती हैं।
स्वास्थ्य प्रणाली, समय का दबाव और मेडिकल रिकॉर्ड्स का डिजिटलीकरण
यूके और भारत के कार्य-परिवेश की तुलना करते हुए डॉ. गुप्ता ने बताया कि यूके में पूरे दिन में केवल 5 मरीज देखते थे, जहां प्रत्येक मरीज को आधा घंटा दिया जाता था। वहां पैरामेडिक्स, काउंसलर, फिजियोथेरेपिस्ट, ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट और ऑर्थोटिस्ट की पूरी टीम होती है और एनएचएस (NHS) के तहत मरीज को इलाज के लिए भुगतान नहीं करना पड़ता।
इसके विपरीत, भारत में डॉक्टरों पर मरीजों का भारी दबाव है। एक अच्छा प्रैक्टिशनर दिनभर में 40 या उससे भी ज्यादा मरीज देखता है। यदि 8 घंटे में 40 मरीज देखे जाएं, तो प्रति मरीज समय बहुत कम बचता है। मरीज भी प्रसिद्ध डॉक्टरों के पास जाने के लिए रात-रात भर कतारों में लगते हैं, जिससे डॉक्टर और मरीज दोनों पर समय का भारी दबाव रहता है।
डॉ. गुप्ता ने ओपीडी रिकॉर्ड्स के डिजिटलीकरण पर जोर दिया। इनपेशेंट (भर्ती) मरीजों का रिकॉर्ड तो अस्पतालों में कानूनी रूप से सुरक्षित रखा जाता है, लेकिन ओपीडी पर्चे मरीज अक्सर खो देते हैं, कॉरपोरेट अस्पतालों में हॉस्पिटल इंफॉर्मेशन सिस्टम (HIS) में यूनिक हॉस्पिटल आईडी (UHID) दर्ज कर मरीज का पुराना रिकॉर्ड तुरंत निकाला जा सकता है। सरकार भी अब डिजिटल हेल्थ कार्ड और टाइप किए हुए प्रिस्क्रिप्शन को बढ़ावा दे रही है, ताकि हाथ की लिखावट से होने वाली मेडिकल गलतियों से बचा जा सके। इसके साथ ही पैथोलॉजी लैब्स के एनएबीएच (NABH) जैसे मानकीकरण की भी सख्त जरूरत है, ताकि अलग-अलग लैब की जांच रिपोर्ट में विसंगतियां न आएं।
यूरिक एसिड, गाउट और खान-पान से जुड़े भ्रम
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: जोड़ों में हल्का दर्द होते ही यूरिक एसिड बढ़ने का अनुमान लगाकर दालें या प्रोटीन बंद कर देने की आदत पर डॉ. गुप्ता ने स्थिति स्पष्ट की:
जोड़ों का हर दर्द यूरिक एसिड नहीं होता। यूरिक एसिड से होने वाले विशेष गठिया को ‘गाउट’ (Gout) कहा जाता है, जिसका उपचार बिल्कुल अलग है।
केवल यूरिक एसिड बढ़ा होने या हल्के दर्द को गाउट नहीं माना जा सकता।
यूरिक एसिड सामान्य शरीर में भी उम्र के साथ बढ़ता है। महिलाओं में मेनोपॉज से पहले हार्मोन्स के प्रभाव से यह कम रहता है, जबकि पुरुषों में थोड़ा अधिक होता है।
यूरिक एसिड का बढ़ा हुआ स्तर अक्सर मोटापे, डायबिटीज और हृदय रोग जैसी मेटाबॉलिक समस्याओं (Metabolic Syndrome) की ओर इशारा करता है। इसलिए केवल यूरिक एसिड देखकर किसी को गठिया का मरीज नहीं ठहराया जा सकता।
क्या बच्चों और किशोरों को भी गठिया हो सकता है?
डॉ. गुप्ता ने बताया कि यह चिकित्सकीय तथ्य पूरी तरह सत्य है कि ऑटोइम्यून और अर्थराइटिस की बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है।
उम्र का कोई बंधन नहीं: यह 6 महीने के नवजात बच्चे (नियोनेटल) से लेकर किसी भी उम्र के व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है।
जुवेनाइल इडियोपैथिक अर्थराइटिस (JIA): 16 साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाले गठिया को इस श्रेणी में रखा जाता है और इसके लिए अब ‘पीडियाट्रिक रूमेटोलॉजिस्ट’ की विशेष शाखा मौजूद है। बच्चों में शारीरिक, मानसिक और हार्मोनल विकास को ध्यान में रखकर उपचार किया जाता है।
ऑस्टियोअर्थराइटिस बनाम इन्फ्लेमेटरी अर्थराइटिस: बुजुर्गों में जोड़ों के घिसने और वियर-एंड-टियर से होने वाला दर्द ऑस्टियोअर्थराइटिस कहलाता है (जैसे घुटनों का दर्द)। इसके विपरीत, ऑटोइम्यून गठिया को इन्फ्लेमेटरी अर्थराइटिस कहते हैं। इसमें जोड़ों में अचानक सूजन आ जाती है, जोड़ हिलाना मुश्किल हो जाता है, छूने पर जोड़ गर्म महसूस होता है और सुबह उठने पर भारी जकड़न रहती है।
अभिभावकों के लिए परामर्श: यदि बच्चे को चलने में दिक्कत हो रही हो, घुटने के दर्द की वजह से स्कूल जाने से मना कर रहा हो या सुबह उठकर हिलने-डुलने में असमर्थ हो, तो इसे केवल खेल-कूद की साधारण चोट मानकर नजरअंदाज न करें। शुरुआती अवस्था में डॉक्टर के पास पहुंचने पर बच्चे को पूरी तरह सामान्य किया जा सकता है।
दवाओं के खर्च पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि अर्थराइटिस के लिए 2 रुपये, 6 रुपये और 10 रुपये की सस्ती गोलियों से लेकर 1 लाख रुपये प्रति डोज वाले आधुनिक इंजेक्शन (बायोलॉजिक्स) तक उपलब्ध हैं। एक संवेदनशील डॉक्टर मरीज की आर्थिक क्षमता के अनुरूप दवा तय करता है। जैसे-जैसे दवाएं पुरानी होती हैं, उनकी कीमतें भी घटती जाती हैं (जैसे 1 लाख की दवा 30,000 और फिर 10,000 रुपये में उपलब्ध होने लगती है)।
युवाओं में कमर दर्द: एंकाइलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस और HLA-B27
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: कमर दर्द और एंकाइलोजिंग स्पॉन्डिलाइटिस (Ankylosing Spondylitis) के अंतर को समझाते हुए डॉ. गुप्ता ने कहा:
यह मुख्य रूप से इन्फ्लेमेटरी अर्थराइटिस है जो 16 से 20 वर्ष के युवाओं में अधिक देखा जाता है।
इसमें सुबह उठने पर कमर और कूल्हों (Buttock joints) में अत्यधिक जकड़न रहती है, जो एक-डेढ़ घंटे बाद चलने-फिरने या नहाने के बाद धीरे-धीरे कम होती है। इसके साथ ही घुटनों, टखनों और आंखों में बार-बार लालीपन (रेडनेस) की समस्या भी हो सकती है।
यह आनुवंशिक रूप से परिवारों में भी चल सकता है, जिसके लिए HLA-B27 नामक जीन मार्कर की जांच की जाती है।
जीन से जुड़ा भ्रम: HLA-B27 पॉजिटिव होने का यह अर्थ कतई नहीं है कि व्यक्ति को अर्थराइटिस हो ही गया है। भारत की 6 से 8 प्रतिशत सामान्य आबादी में यह जीन बिना किसी बीमारी के भी पॉजिटिव पाया जाता है। लक्षण दिखने पर ही डॉक्टर से मिलकर एक्स-रे और क्लिनिकल जांच करानी चाहिए। समय पर इलाज मिलने से इस बीमारी को 100% नियंत्रित रखा जा सकता है और रीढ़ की हड्डियों को आपस में जुड़ने (फ्यूज होने) से रोका जा सकता है।
इलाज में नियमितता और टेलीमेडिसिन
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: डॉ. गुप्ता ने कहा कि अर्थराइटिस का इलाज विफल होने का सबसे मुख्य कारण मरीज द्वारा इलाज को बीच में छोड़ देना (Non-compliance) है। चूंकि ये बीमारियां पूरी तरह जड़ से समाप्त (Cure) नहीं होतीं बल्कि नियंत्रित की जाती हैं, इसलिए दवाएं समय पर लेना अनिवार्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में या आर्थिक तंगी के चलते, विशेषकर महिलाओं के इलाज में अक्सर लापरवाही देखी जाती है। उन्होंने मरीजों से अपील की कि यदि पैसे की कमी हो, तो डॉक्टर से खुलकर साझा करें; डॉक्टर दवा बदलकर सस्ती दवाएं लिख सकते हैं, लेकिन इलाज बंद न करें। दूरदराज के मरीजों की सुविधा के लिए उन्होंने टेलीमेडिसिन और वीडियो कॉलिंग के महत्व को रेखांकित किया। चूंकि ग्रामीण क्षेत्रों में रूमेटोलॉजिस्ट्स उपलब्ध नहीं होते, इसलिए रेडियो और लाइव शो के माध्यम से विशेषज्ञ डॉक्टरों से जुड़कर परामर्श लेना एक बेहद प्रभावी समाधान साबित हो सकता है।
डॉक्टरों की दिनचर्या और क्लिनिकल प्रैक्टिस का ‘A-B-C’ नियम
अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हुए डॉ. गुप्ता ने कहा कि वे सुबह 8:30 बजे घर से निकलते हैं और शाम को 6:30 या 7:00 बजे घर लौटते हैं। काम के दबाव के कारण दोपहर के भोजन तक का समय नहीं मिलता और पूरी ओपीडी चाय के सहारे चलती है। हालांकि, वे रविवार को पूरी तरह अवकाश रखते हैं और सुबह वॉक करते हैं। उन्होंने कहा कि अत्यधिक मानसिक थकान (Burnout) से बचने के लिए इंसान को खुद को रिचार्ज करने का समय अवश्य निकालना चाहिए।
मरीजों की बात बीच में टोकने के सवाल पर डॉ. गुप्ता ने माना कि समय के भारी दबाव और अप्रासंगिक बातों के कारण कई बार डॉक्टरों को ऐसा करना पड़ता है, लेकिन एक अच्छे डॉक्टर को हमेशा विनम्रता से चर्चा को सही विषय पर लाना चाहिए।
जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों के लिए उन्होंने क्लिनिकल प्रैक्टिस का ‘A-B-C’ नियम साझा किया:
A – Availability (उपलब्धता): मरीज को पूरा समय देना और उसकी बात को धैर्य से सुनना। जब तक डॉक्टर मरीज को सुनेगा नहीं, तब तक सही उपचार नहीं लिख सकता।
B – Behavior (व्यवहार): मरीज के साथ डॉक्टर का व्यवहार संवेदनशील, विनम्र और धैर्यपूर्ण होना चाहिए।
C – Competence (योग्यता एवं सुरक्षा): डॉक्टर सिर्फ ‘बड़ा’ होना नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित डॉक्टर’ (Safe Doctor) होना जरूरी है। एक सुरक्षित डॉक्टर वह है जो अपनी सीमाओं को समझता हो, जरूरत पड़ने पर दूसरे सहयोगियों से सलाह लेने में न हिचकिचाए और मरीज पर अनावश्यक दवाएं न थोपे।
रूमेटोलॉजी में करियर
Dr. Rajiva Gupta on Autoimmune Diseases & Arthritis: मेडिकल छात्रों के लिए करियर के अवसरों पर बात करते हुए डॉ. गुप्ता ने कहा कि आने वाले समय में रूमेटोलॉजी और क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है। पहले जहां छात्र केवल कार्डियोलॉजी की तरफ रुख करते थे, वहीं अब नीट सुपर-स्पेशियलिटी (NEET SS) में ऑल इंडिया टॉप रैंकर्स रूमेटोलॉजी को पहली पसंद बना रहे हैं। देश में मरीजों की भारी संख्या (1.4 करोड़) और विशेषज्ञों की भारी कमी के कारण इस क्षेत्र में मांग और आपूर्ति का बहुत बड़ा अंतर है। साथ ही, यह एक ऐसा जीवंत क्षेत्र है जिसमें हर साल नई दवाएं, शोध और विस्तार सामने आ रहे हैं।