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आईआईटी मंडी की रिसर्चः मिट्टी को कटाव से बचाएगी बैक्टीरिया वाली पद्धति

भारतीय शोधकर्ता सूक्ष्मजीवों की मदद से मिट्टी की पकड़ मजबूत करने की पद्धति विकसित कर रहे

कृत्रिम उपाय से लंबी अवधि के लिए स्थायी तौर पर मिट्टी की पकड़ मजबूत बनाने की प्रक्रिया को मिट्टी का स्थिरीकरण कहते हैं। मिट्टी के रूपांतरण की इन विधियों में भौतिक, रासायनिक, यांत्रिक, जैविक या संयुक्त विधियाँ शामिल हैं। मिट्टी को कटाव से बचाने के लिए यह बेहतर उपाय माना जाता है। आमतौर पर इसके लिए संपीड़न जैसी यांत्रिक प्रक्रियाएं और मिट्टी में रसायनिक ग्राउट तरल पदार्थ डालने जैसी रासायनिक प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं।

एक नये अध्ययन में भारतीय शोधकर्ता सूक्ष्मजीवों की मदद से मिट्टी की पकड़ मजबूत करने की पद्धति विकसित कर रहे हैं। इसमें शोधकर्ताओं ने हानि रहित बैक्टीरिया एस. पाश्चरी का उपयोग किया है, जो यूरिया को हाइड्रोलाइज कर कैल्साइट बनाते हैं। इस प्रक्रिया में खतरनाक रसायन का उपयोग नहीं होता, और प्राकृतिक संसाधनों का सतत् उपयोग किया जा सकता है। यूरिया का उपयोग इसलिए उत्साहजनक है, क्योंकि इसमें खतरनाक रसायन नहीं हैं, और इससे प्राकृतिक संसाधनों का स्थायी रूप से समुचित उपयोग संभव होगा। इस प्रयोग में रेत का कॉलम बनाकर उससे बैक्टीरिया और यूरिया, कैल्शियम क्लोराइड, पोषक तत्व आदि से मिलकर तैयार सीमेंटिंग सॉल्यूशन को प्रवाहित किया गया है।

इस अध्ययन से जुड़े निष्कर्ष शोध पत्रिका ‘जीयोटेक्निकल ऐंड जीयो-एन्वायरनमेंटल इंजीनियरिंग ऑफ अमेरिकन सोसाइटी ऑफ सिविल इंजीनियर्स (एएससीई)’ में प्रकाशित किए गए हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. कला वेंकट उदय के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं में उनके एमएस स्कॉलर दीपक मोरी शामिल हैं।

पिछले कुछ दशकों में पूरी दुनिया में मिट्टी के स्थिरीकरण की पर्यावरण अनुकूल और स्थायी तकनीक – माइक्रोबियल इंड्यूस्ड कैल्साइट प्रेसिपिटेशन (एमआईसीपी) पर परीक्षण हो रहे हैं। इसमें बैक्टीरिया का उपयोग कर मिट्टी के सूक्ष्म छिद्रों में कैल्शियम कार्बोनेट (कैल्साइट) बनाया जाता है, जो अलग-अलग कणों को आपस में मजबूती से जोड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी/जमीन की पकड़ मजबूत होती है।

स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डॉ के.वी. उदय ने अपने इस शोध के बारे में बताया, “हमारा शोध सूक्ष्मजीवों की मदद से जमीनी स्तर पर मिट्टी की पकड़ मजबूत करने में मदद करेगा। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में और भू-आपदा के दौरान मिट्टी का कटाव कम होगा। हम सूक्ष्मजीवों की मदद से खदान के कचरे से निर्माण सामग्री तैयार करने की दिशा में भी काम कर रहे हैं।”

उन्होंने बताया, ‘‘मिट्टी के स्थिरीकरण के उद्देश्य से पूरी दुनिया में एमआईसीपी तकनीक विकसित करने के लिए अध्ययन हो रहे हैं। लेकिन, अब तक इस प्रक्रिया की सक्षमता को प्रभावित करने वाले कारकों को पूरी तरह समझा नहीं गया है।”

अध्ययन में शामिल शोधकर्ता दीपक मोरी ने बताया, “कैल्साइट प्रेसिपिटेशन एफिसियंसी (सीपीई) कई मानकों पर निर्भर करती है, जिनमें सीमेंटिंग सॉल्यूशन का कन्सन्ट्रेशन, कॉलम से होकर प्रवाह की दर, लागू आपूर्ति दर, पोर वॉल्यूम और रेत के कणों के मुख्य गुण शामिल हैं। हमने सीपीई पर विभिन्न मानकों के प्रभाव जानने की कोशिश की है।”

शोधकर्ताओं ने इसमें अपनाये गए विभिन्न मानकों के मद्देनजर तागुची पद्धति से एमआईसीपी से मिट्टी की पकड़ मजबूत करने के विभिन्न मानकों के प्रभावों का विश्लेषण किया। इस पद्धति में किसी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले मानकों को व्यवस्थित करने, और जिस स्तर पर उनमें विविधता चाहिए, उनके लिए ओर्थोगोनल ऐरेज़ का उपयोग किया जाता है। तागुची पद्धति से प्रभावशाली मानकों का विश्लेषण किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि कैल्साइट कितनी मात्रा में बनता है यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि इस प्रक्रिया में छिद्रों में बने कैल्साइट ग्रेन का आकार और स्थान होता है। सीमेंटिंग सॉल्यूशन का कन्सन्ट्रेशन अधिक होने के परिणामस्वरूप अधिक मजबूत पकड़ बनती है। इसी तरह, सीमेंटिंग सॉल्यूशन की प्रवाह दर और आपूर्ति दर भी पकड़ की मजबूती को प्रभावित करती है।

यह लेख इंडिया साइंस वायर से लिया गया है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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