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पलायन क्यों? अपनी ही बेची फसल को दोगुने में खरीदता है किसान

पर्वतीय गांवों में खेताबाड़ी आजीविका का प्रमुख साधन, पर खेती जानवर उजाड़ रहे

यह सही बात है कि उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों में सुविधाएं नहीं होने से पलायन हुआ है। सबसे बड़ी समस्या है गांवों तक सड़क नहीं पहुंचना, जिसकी वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी सहित अन्य बुनियादी सुविधाएं दूर हैं। आजीविका के साधन नहीं होना भी पलायन की प्रमुख वजह है। हालांकि, गांवों में खेतीबाड़ी आजीविका का साधन है, पर फसल जंगली जानवर बर्बाद कर रहे हैं। ऐसे में लोग घरों के आसपास के खेतों में ही फसल उगा रहे हैं, बाकि खेत खाली छोड़ दिए। जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा का कोई उपाय अभी तक सामने नहीं आया है।

वहीं, अभी तक उत्पादक यानी किसानों और उपयोगकर्ताओं (उपभोक्ता) के बीच उन लोगों का बड़ा दखल है, जो किसानों से कम मूल्य पर खरीदी गई उपज को बाजार में दोगुने से ज्यादा में बेचते हैं। पर्वतीय क्षेत्र के किसानों (उत्पादकों) को अपनी फसल का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार नहीं है, वो इसलिए क्योंकि उनके आसपास ऐसा कोई प्लेटफार्म नहीं है, जहां अपनी कृषि उपज बेच सकें।

पहाड़ में कृषि में महिलाओं का योगदान महत्वपूर्ण है, पर महिलाओं को उपज के मूल्य की नियमित रूप से जानकारी देने की कोई व्यवस्था नहीं है।

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पहाड़ में जैविक उत्पादन से आयवृद्धि की बात बड़े-बड़े मंचों पर की जाती है, पर असल हालात क्या हैं, किसानों के सामने क्या दिक्कतें हैं, पर खुलकर बात नहीं होती। कुछ उदाहरणों के साथ इन पर बात करते हैं-

टिहरी गढ़वाल जिला के धनोल्टी विधानसभा क्षेत्र के खेतू गांव में पिछली बार उद्यान विभाग से प्रमाणित होने के बाद अदरक की फसल खेतों में ही खराब हो गई। कास्तकार त्रिलोक सिंह रावत ने अदरक की खेती पर लगभग 24 हजार रुपये खर्च किए थे, जिस पर उम्मीद थी कि करीब 50 हजार रुपये की फसल मिल जाएगी। अदरक की खेती में काफी मेहनत लगती है। उन्होंने बैंक से कृषि कार्ड पर 30 हजार का लोन लिया था। उन्हीं की तरह गांव के 20 और किसानों की अदरक की फसल को नुकसान पहुंचा।

वहीं, टिहरी गढ़वाल के ही बाड्यौ गांव निवासी वीरेंद्र सिंह पास ही मरोड़ा गांव में खेती करते हैं। दिन रात चौकीदारी करके फसल को जानवरों से बचाते हैं। खेती में लागत के सवाल पर कहते हैं, इसमें हम अपना श्रम कभी नहीं जोड़ते। यदि यह जोड़ लिया तो लागत बहुत हो जाएगी। मटर की ही खेती को ले लीजिए, मोटा-मोटा हिसाब लगाएं तो एक कुंतल मटर बोने में बीज का खर्चा लगाकर, कम से कम 15 से 20 हजार रुपये खर्च होते हैं। अन्य फसलों में ज्यादा खर्चा आता है।

वीरेंद्र बताते हैं, फसल उत्पादन बरसात पर निर्भर है। बरसात हो गई तो फसल सही, नहीं तो सूखा यानी फसल बर्बाद। नुकसान की भरपाई का कोई विकल्प नहीं है। यहां केवल तीन महीने बारिश के समय की ही खेतीबाड़ी मानिए। सही समय पर बारिश से कुछ लाभ मिल गया तो ठीक, नहीं तो शहर जाकर नौकरी करो। हमें अपना गांव छोड़ना पड़ता है। यही कारण है, वो होटल लाइन में चले गए थे।

उनका कहना है, पास में ही एक खाला है, वहां से पंपिंग करके खेतों में सिंचाई की व्यवस्था हो जाए तो यहां क्या कुछ नहीं हो सकता। हमें अपने खेतों को छोड़कर घरों से दूर जाकर नौकरी करना अच्छा नहीं लगता।

वीरेंद्र बताते हैं, अगर, सही फसल मिल गई तो गट्ठर बांधकर सिर पर रखकर ढलान-चढ़ाई वाली पगडंडियों से होते हुए रिंगालगढ़ ले जाते हैं। वहां से कट्टों पर अपने नाम लिखकर फसल को यूटीलिटी से देहरादून मंडी भेजते हैं। मंडी में उपज का रेट तय होता है और हमें पैसा मिल जाता है। हमारी उपज मंडी के आढ़तियों के माध्यम से बिकती है। रेट पिछली बार मंदा था। फसल का रेट मार्केट यानी मांग पर निर्भर करता है। मटर 40 से लेकर 80 रुपये किलो तक भी चला जाता है। अगर अपनी फसल को ही बाजार में कहीं से खरीदते हैं तो उसका रेट लगभग डबल हो जाता है।

उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि हमारी बीन्स (फलियां) 30 या 40 रुपये किलो के हिसाब से बिकती हैं। जब हम देहरादून से बीन्स खरीदकर लाते हैं तो यह 70 या 80 रुपये प्रति किलो में मिलती है।यह स्थिति एक गांव या किसी एक किसान की नहीं है, बल्कि ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं। स्पष्ट है कि पर्वतीय क्षेत्रों में खेती को लाभकारी बनाने की दिशा में उतना प्रभावी कुछ नहीं हो सका, जितने की जरूरत है।

देहरादून की नाहींकलां ग्राम पंचायत के बड़कोट गांव की पार्वती मनवाल बताती हैं, उन्होंने कई खेतों को खाली छोड़ दिया है। घर के पास के खेतों में ही मक्की, अदरक, हल्दी, मंडुआ, गागला (अरबी), सब्जियां होती हैं, पर इनकी जानवरों से सुरक्षा बड़ी चुनौती है, जबकि गांव में खेती की बहुत संभावना है।यहां भालू, बघेरे (गुलदार) से ज्यादा खतरा है। ये घर के आंगन तक पहुंच जाते हैं। उन्होंने 45 बकरियां पाली हैं, जिनके लिए यहां चारे की कोई कमी नहीं है। बकरी पालन में काफी लाभ है। बघेरा बकरियों पर हमला कर देता है। पार्वती कहती हैं, जब सुविधाएं नहीं होंगी, तो पलायन पर विचार करना होगा।

टिहरी जिले की कोडारना ग्राम पंचायत के कलजौंठी गांव में दो बुजुर्ग दंपति ही रह गए। यहां खेत खाली पड़े हैं। कलजौंठी में बुजुर्ग दंपति ने सभी पशु किसी आश्रम को दान दे दिए हैं। पानी नहीं मिलने की वजह से वो अपने सामने ही खेतों को बंजर होता देखने को मजबूर हैं। थोड़ा बहुत जो उगा पाते हैं, वो जानवर नहीं छोड़ रहे हैं।

नाहींकलां निवासी भोपाल सिंह जैविक खेती करते हैं और उन्होंने बच्चों की शिक्षा, रोजगार के लिए थानो के पास कालूवाला में आवास बनाया है। सड़क नहीं होने की वजह से गांव में खेती के लिए कभी कभार गांव जाते रहते हैं।

जब तक गांव सड़कों से नहीं जुड़ेंगे, तब तक उनसे स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, रोजगार दूर ही रहेंगे। रही बात, गांवों में आजीविका के संसाधन विकसित करने की तो सबसे पहले स्थानीय स्तर पर मिलने वाले संसाधनों पर ध्यान देना होगा। ये संसाधन कृषि एवं बागवानी पर निर्भर है। कृषि एवं बागवानी को भौगोलिक परिस्थितियों एवं पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक, पारंपरिक पद्धतियों से लाभकारी बनाया जाए। यह बात इसलिए भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य के अधिकांश क्षेत्र में कृषि जोत छोटी व बिखरी होने के कारण कृषि कार्य अत्यन्त चुनौतीपूर्ण है।

सत्तर प्रतिशत ग्रामीण आबादी आजीविका संवर्द्धन अन्य सहवर्गीय तथा क्रियाकलापों, जैसे कि उद्यानीकरण, दुग्ध उत्पादन, जड़ी-बूटी उत्पादन, मत्स्य उत्पादन, पशुपालन, जैविक कृषि, संगन्ध पादप, मौन पालन, सब्जी उत्पादन तथा इनसे सम्बन्धित लघु उद्योगों पर निर्भर करती है”, आर्थिक सर्वेक्षण की हालिया रिपोर्ट में यह जानकारी है। सबसे बड़ा सवाल यह है, इन गांवों से उपज को बाजार तक पहुंचाने, जैविक, अजैविक के पैमाने पर छांटने एवं श्रम के अनुरूप मूल्य तय करने के लिए किसी ठोस तंत्र पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया।

गांवों में कृषि सहित आजीविका के अन्य संसाधनों से आय संवर्धन के लिए उस व्यवस्था को मजबूत करना होगा, जो उत्पादक एवं उपभोक्ता के बीच काम करती है। कृषि संबंधी चुनौतियों एवं समाधान पर गांववार बात करने की जरूरत है। हालात ये हैं कि किसानों का जैविक उत्पाद मंडी में सामान्य के रेट पर बिकता है। वो इसलिए क्योंकि अधिकतर स्थानों पर कोई ऐसा तंत्र काम नहीं कर रहा है, जो किसानों और सीधे उपभोक्ताओं के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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