यह दास्तां है मसूरी विधानसभा क्षेत्र की न्याय पंचायत सरोना के अंतर्गत तोक/मजरा डोमकोट की। राज्य गठन के 26 वर्षों बाद भी डोमकोट तक न तो पक्की सड़क पहुंच पाई है, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही शिक्षा का कोई साधन। हालात यह हैं कि गांव में एक आंगनबाड़ी केंद्र तक नहीं है। भारी बारिश ने ग्रामीणों की मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया है।

ग्रामीण सोबन सिंह कठैत ने बताया, एकमात्र पैदल मार्ग की पुलिया तेज बहाव में बहकर क्षतिग्रस्त हो गई है। इस टूटी पुलिया का सबसे बड़ा नुकसान गांव के बच्चों को झेलना पड़ रहा है। डोमकोट गांव के बच्चे पढ़ाई के लिए सरखेत स्थित स्कूल जाते हैं। डोमकोट से स्कूल जाते समय बच्चे सीधे घन्तू के सेरा की ओर जाने वाले रास्ते की ओर मुड़ जाते हैं। यह रास्ता उनकी स्कूल से दूरी को काफी कम कर देता है। इस रास्ते में बरसाती खाला है, जो बरसात में उफान पर होता है। इस पर बनी पुलिया पिछली बरसात में टूट गई थी, लेकिन आज तक नहीं बनी।
ग्रामीण सोबन सिंह कठैत बताते हैं, उन्होंने इस पुलिया के निर्माण के लिए संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई थी, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। पैदल रास्ते की पुलिया बह जाने और नीचे खाले (बरसाती गदेरे) के उफान पर होने के कारण बच्चों का स्कूल जाना पूरी तरह बंद हो चुका है। तेज बहाव को पार करना जान जोखिम में डालने जैसा है, और प्रशासन द्वारा कोई वैकल्पिक रास्ता तैयार नहीं किया गया है। बच्चों के स्कूल का दूसरा रास्ता काफी लंबा है, यह रास्ता भी ऊबड़ खाबड़ है और जोखिम भरा है। बरसात में हालात बेहद खराब रहते हैं।
ग्रामीण सोबन सिंह बताते हैं, “हमारे गांव के लिए आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा सब सपना हैं। अब तो पैदल रास्ते की पुलिया भी टूट गई। लोग रोजमर्रा के काम के लिए जाएं तो किस रास्ते से जाएं? सरकार पलायन रोकने के बड़े-बड़े दावे करती है, पर अगर सरकार जमीन पर बुनियादी सुविधाएं ही नहीं देगी, तो लोग पलायन न करें तो क्या करें?”



