राजधानी से महज 20 किमी दूर डोमकोट: पुलिया टूटी, उफनते खाले को कैसे पार करें स्कूली बच्चे

Rajesh Pandey
टूटी पुलिया। यह फोटो डोमकोट गांव निवासी सोबन सिंह कठैत ने उपलब्ध कराई है।
देहरादून, 7 सितम्बर, 2026ः एक तरफ उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को स्मार्ट सिटी और विकास के आधुनिक मॉडल के रूप में पेश किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ शहर की चकाचौंध से महज 20-25 किलोमीटर दूर एक ऐसा गांव भी है, जहां के बाशिंदे 21वीं सदी में भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।

यह दास्तां है मसूरी विधानसभा क्षेत्र की न्याय पंचायत सरोना के अंतर्गत तोक/मजरा डोमकोट की। राज्य गठन के 26 वर्षों बाद भी डोमकोट तक न तो पक्की सड़क पहुंच पाई है, न स्वास्थ्य सुविधाएं और न ही शिक्षा का कोई साधन। हालात यह हैं कि गांव में एक आंगनबाड़ी केंद्र तक नहीं है। भारी बारिश ने ग्रामीणों की मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया है।

टूटी पुलिया। यह फोटो डोमकोट गांव निवासी सोबन सिंह कठैत ने उपलब्ध कराई है।

ग्रामीण सोबन सिंह कठैत ने बताया, एकमात्र पैदल मार्ग की पुलिया तेज बहाव में बहकर क्षतिग्रस्त हो गई है। इस टूटी पुलिया का सबसे बड़ा नुकसान गांव के बच्चों को झेलना पड़ रहा है। डोमकोट गांव के बच्चे पढ़ाई के लिए सरखेत स्थित स्कूल जाते हैं। डोमकोट से स्कूल जाते समय बच्चे सीधे घन्तू के सेरा की ओर जाने वाले रास्ते की ओर मुड़ जाते हैं। यह रास्ता उनकी स्कूल से दूरी को काफी कम कर देता है। इस रास्ते में बरसाती खाला है, जो बरसात में उफान पर होता है। इस पर बनी पुलिया पिछली बरसात में टूट गई थी, लेकिन आज तक नहीं बनी।

ग्रामीण सोबन सिंह कठैत बताते हैं, उन्होंने इस पुलिया के निर्माण के लिए संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई थी, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। पैदल रास्ते की पुलिया बह जाने और नीचे खाले (बरसाती गदेरे) के उफान पर होने के कारण बच्चों का स्कूल जाना पूरी तरह बंद हो चुका है। तेज बहाव को पार करना जान जोखिम में डालने जैसा है, और प्रशासन द्वारा कोई वैकल्पिक रास्ता तैयार नहीं किया गया है। बच्चों के स्कूल का दूसरा रास्ता काफी लंबा है, यह रास्ता भी ऊबड़ खाबड़ है और जोखिम भरा है। बरसात में हालात बेहद खराब रहते हैं।

ग्रामीण सोबन सिंह बताते हैं, “हमारे गांव के लिए आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा सब सपना हैं। अब तो पैदल रास्ते की पुलिया भी टूट गई। लोग रोजमर्रा के काम के लिए जाएं तो किस रास्ते से जाएं? सरकार पलायन रोकने के बड़े-बड़े दावे करती है, पर अगर सरकार जमीन पर बुनियादी सुविधाएं ही नहीं देगी, तो लोग पलायन न करें तो क्या करें?”

डोमकोट की त्रासदी केवल टूटे रास्तों तक सीमित नहीं है। गांव लंबे समय से पानी के गंभीर संकट से जूझ रहा है। आपदा के चलते पेयजल स्रोत तबाह हो चुके हैं। ग्रामीण महिलाएं, बुजुर्ग और युवा—अपनी जान हथेली पर रखकर 15 से 20 लीटर के जरीकैन पीठ पर लादकर डेढ़ से दो किलोमीटर दूर गहरी खाइयों, भूस्खलन प्रभावित पत्थरों और जंगली जानवरों के खौफ के बीच प्राकृतिक स्रोतों से पानी ढोने को विवश हैं।
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newslive24x7.com टीम के सदस्य राजेश पांडेय, उत्तराखंड के डोईवाला, देहरादून के निवासी और 1996 से पत्रकारिता का हिस्सा। अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे प्रमुख हिन्दी समाचार पत्रों में 20 वर्षों तक रिपोर्टिंग और एडिटिंग का अनुभव। बच्चों और हर आयु वर्ग के लिए 100 से अधिक कहानियां और कविताएं लिखीं। स्कूलों और संस्थाओं में बच्चों को कहानियां सुनाना और उनसे संवाद करना जुनून। रुद्रप्रयाग के ‘रेडियो केदार’ के साथ पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाईं और सामुदायिक जागरूकता के लिए काम किया। रेडियो ऋषिकेश के शुरुआती दौर में लगभग छह माह सेवाएं दीं। ऋषिकेश में महिला कीर्तन मंडलियों के माध्यम से स्वच्छता का संदेश दिया। जीवन का मंत्र- बाकी जिंदगी को जी खोलकर जीना चाहता हूं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता: बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक, एलएलबी संपर्क: प्रेमनगर बाजार, डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड-248140 ईमेल: rajeshpandeydw@gmail.com फोन: +91 9760097344
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