ICAR-IISWC, देहरादून में ‘एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग एवं बेसिन प्रबंधन’ पर राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला
देहरादून, 07 सितम्बर, 2026ः भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR–IISWC), देहरादून में “माइक हाइड्रो बेसिन (MIKE HYDRO Basin) का उपयोग करते हुए एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग और बेसिन प्रबंधन” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला का उद्घाटन हुआ।
हाइब्रिड मोड में आयोजित इस कार्यशाला का आयोजन जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के INCCC से वित्त पोषित परियोजना “बूढ़ी गंडक बेसिन के जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव” तथा स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA), उत्तराखंड से वित्त पोषित “कमल गंगा नदी के पुनरुद्धार” प्रोजेक्ट के तहत किया जा रहा है।
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम ICAR–IISWC, देहरादून, स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA), उत्तराखंड और DHI इंडिया ने संयुक्त रूप से आयोजित किया। इस कार्यशाला की थीम “माइक हाइड्रो बेसिन का उपयोग कर बेसिन डेटा से जल प्रबंधन निर्णयों तक” है।
इस अवसर पर ICAR–IISWC, देहरादून के प्रभारी निदेशक डॉ. चरण सिंह ने मृदा एवं जल संरक्षण, वाटरशेड विकास और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के स्थायी प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया। साथ ही, देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञों व प्रतिभागियों को एक मंच पर लाने की इस पहल की सराहना की।
संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक, विभागाध्यक्ष एवं कार्यशाला निदेशक डॉ. अमरीश कुमार ने एकीकृत जल संसाधन मॉडलिंग और बेसिन-स्तरीय प्रबंधन में वैज्ञानिक व तकनीकी क्षमता विकसित करने के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह कार्यशाला शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, छात्रों और संबंधित विभागों के पेशेवरों को यह समझने का अवसर देती है कि कैसे बेसिन डेटा और मॉडलिंग टूल्स को व्यावहारिक जल-प्रबंधन निर्णयों में बदला जा सकता है, विशेष रूप से SARRA के ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर’ (एक जिला-एक नदी) कार्यक्रम के संदर्भ में।
उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम को देशभर से काफी प्रतिक्रिया मिली है और लगभग 400 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। इस प्रशिक्षण में NIH रुड़की, CSSRI करनाल और DHI के वरिष्ठ विशेषज्ञ संसाधन व्यक्ति (रिसोर्स पर्सन) के रूप में भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम में 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व है, जो इसकी व्यापक राष्ट्रीय पहुंच को दर्शाता है। पंजीकृत प्रतिभागी देश भर के 98 जिलों, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों और अन्य एजेंसियों से हैं, जिनमें महाराष्ट्र, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, केरल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य प्रमुखता से शामिल हैं।
उन्होंने जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखते हुए खंडित वाटरशेड-स्तरीय प्रयासों के बजाय एकीकृत बेसिन-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जलप्रपात प्रबंधन निदेशालय, उत्तराखंड के संयुक्त निदेशक डॉ. ए.के. डिमरी ने हाल ही में आई फ्लैश फ्लड (आकस्मिक बाढ़) और वाटरशेड विकास गतिविधियों से जुड़ी जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने नदी-बेसिन स्तर पर वाटरशेड कार्यों को लागू करने पर जोर दिया।
मुख्य वक्ता डॉ. आर.पी. पांडे, पूर्व विभागाध्यक्ष एवं वैज्ञानिक-जी, राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की ने नदी पुनरुद्धार में अपने व्यावहारिक अनुभवों को साझा किया, जिसमें देहरादून की रिस्पना नदी पुनरुद्धार कार्य से जुड़े अनुभव भी शामिल थे।
विशिष्ट अतिथि डॉ. डी.एस. रावत ने जल संसाधनों और नदी प्रणालियों की चुनौतियों से निपटने के लिए ICAR–IISWC और SARRA के बीच संस्थागत सहयोग के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, नदी पुनरुद्धार के लिए वैज्ञानिक मूल्यांकन, व्यावहारिक हस्तक्षेपों और समन्वित योजना के साथ नदी और उसके जलग्रहण क्षेत्र की समग्र समझ आवश्यक है।



