Actinidia indica discovery: अरुणाचल प्रदेश में जंगली कीवी की नई प्रजाति “Actinidia indica” की खोज
Actinidia indica discovery: नई दिल्ली, 23 मार्च, 2026ः भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (BSI) के वैज्ञानिकों ने जैव विविधता के मामले में समृद्ध अरुणाचल प्रदेश में जंगली कीवी की एक नई प्रजाति “Actinidia indica” की खोज की है। यह खोज न केवल भारत की पादप संपदा में विस्तार करती है, बल्कि पूर्वी हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिक विशिष्टता को भी विश्व पटल पर पुन: स्थापित करती है।
Actinidia indica discovery: इस नई प्रजाति को अरुणाचल प्रदेश की प्रसिद्ध ज़ीरो वैली (Ziro Valley) के पास एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र में चिह्नित किया गया है। यह मुख्य रूप से समुद्र तल से लगभग 1,725 मीटर की ऊंचाई पर पाई जाती है। यह क्षेत्र समशीतोष्ण (Temperate) और उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) वनों का संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone) है, जो दुर्लभ वनस्पतियों के पनपने के लिए आदर्श माना जाता है।
Actinidia indica discovery: वैज्ञानिक दृष्टि से Actinidia indica की बनावट इसे अन्य प्रजातियों से भिन्न बनाती है। यह एक बहुवर्षीय काष्ठीय लता (Perennial Climbing Shrub) है, जो आमतौर पर 2 से 4 मीटर तक ऊंची होती है। सकी युवा शाखाएं घनी और कोमल रोयेंदार (Tomento-villous) होती हैं। पत्तियां आकार में बड़ी और अंडाकार होती हैं। इसमें सफेद से क्रीम रंग के आकर्षक फूल लगते हैं, जिनका व्यास 4 से 6 सेंटीमीटर तक होता है।
इस प्रजाति के फल की बनावट ही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। फल गोलाकार (Globose) और जैतूनी हरे (Olive Green) रंग का होता है। फल की सतह पर एक विशिष्ट जालीनुमा लेंटिसल पैटर्न (Reticulate Lenticel Pattern) पाया जाता है। यही वह मुख्य विशेषता है जो इसे कीवी की अन्य ज्ञात प्रजातियों से अलग श्रेणी में खड़ा करती है।
इस नई खोज के साथ ही वैश्विक स्तर पर Actinidia वंश (Genus) की कुल प्रजातियों संख्या बढ़कर 56 हो गई है। भारत में इस वंश की प्रजातियां अत्यंत दुर्लभ हैं, इसलिए यह खोज राष्ट्रीय वनस्पति डेटाबेस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह खोज सिद्ध करती है कि हिमालयी ‘हॉटस्पॉट’ में अभी भी कई अज्ञात प्रजातियां मौजूद हैं। यह इन नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों के त्वरित संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
Actinidia indica की खोज यह स्पष्ट करती है कि भारत की प्राकृतिक विरासत अभी भी कई रहस्यों को समेटे हुए है। वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता ही इन दुर्लभ संपदाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकती है।







