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दुनियाभर में खाद्य प्रणालियां महिलाओं के श्रम पर निर्भर

दुनिया में जो भी कुछ खाद्य उपज होती है, उसके आधे यानी 50 फीसदी में महिलाओं के श्रम का योगदान है। दुनियाभर में खाद्य प्रणालियां महिलाओं के श्रम पर निर्भर करती है।

यूएन समाचार की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं फ़सलें उगाती हैं, उन्हें अनाज के लिये प्रसंस्कृत भी करती हैं और वितरण और बाज़ार में बिक्री का प्रबन्ध भी करती हैं। ये सब करके, महिलाएँ अपने परिवारों और समुदायों की ख़ुशहाली और रहन-सहन में योगदान करती हैं।

लेकिन, अक्सर इन्हीं महिलाओं को समुचित व पर्याप्त मात्रा में भोजन नहीं मिल पाता है, और उन्हें, पुरुषों की तुलना में  कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के ज़्यादा जोखिम का सामना करना पड़ता है।

लैंगिक भेदभावपूर्ण परम्पराओं के कारण, अक्सर महिलाएं, सबसे अन्त में भोजन करती हैं या फिर उन्हें सबसे कम मात्रा में भोजन मिलता है। ऐसे घरों में भी जहाँ वो ज़्यादा काम करती है, घरेलू देखभाल भी करती हैं और उन्हें उस कामकाज का कोई मेहनताना भी नहीं मिलता है।

इस वर्ष के अन्तरराष्ट्रीय दिवस, जो हर साल 15 अक्तूबर को मनाया जाता है, की थीम है – ग्रामीण महिलाएं – सभी के लिए अच्छा भोजन उत्पन्न करते हुए।

यूएन महिला संस्था ने, 15 अक्टूबर, शुक्रवार को मनाए गए अन्तरराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस पर, महिलाओं व लड़कियों के साथ इन हालात को ख़त्म किए जाने की पुकार लगाई है।

यूएन महिला संस्था का कहना है कि वैसे तो पृथ्वी पर इतना क्षमता मौजूद है कि हर किसी को अच्छा और भरपेट भोजन मिल सकता है, मगर ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, जिन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है। खासतौर से बढ़ते जलवायु और पर्यावरणीय संकट और कोविड-19 महामारी के हालात में, ये स्थिति और ज़्यादा गम्भीर हो गई है।

जिन लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता है, ऐसे लोगों की संख्या में वर्ष 2020 के दौरान लगभग 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह संख्या क़रीब दो अरब 30 करोड़ हो गई। इनमें ग्रामीण महिलाओं व लड़कियों की संख्या ज़्यादा है।

यूएन वीमैन ने, सततता और सामाजिक न्याय के लिए महिला केन्द्रित योजना प्रकाशित की है, जिसमें कमज़ोर पड़ चुकी वैश्विक खाद्य प्रणाली में फिर से जान फूंकने और विविधतापूर्ण व स्वस्थ फसल उत्पादन के समर्थन पर ध्यान दिया जाना भी शामिल है।

नई योजना में, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय, और सततता को, कोविड-19 महामारी से पुनर्बहाली और इस स्वास्थ्य संकट से निकल जाने के बाद के हालात में, वैश्विक पुनर्निर्माण प्रयासों के केन्द्र में रखा गया है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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