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Uttarakhand:देहरादून के भोगपुर क्षेत्र में क्यों गहरा रहा है पानी का संकट

क्या कृषि भूमि कम होने से प्रभावित होने लगे हैं बारह महीने बहने वाले जलस्रोत

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

रविवार की तपती दोपहर भोगपुर गांव के पास वर्षों पुराने जल स्रोत पर पानी भरने के लिए लाइन लगी है। लोगों का कहना है, दूसरा दिन हो गया बिजली नहीं है, इस वजह से नलों में पानी नहीं आ रहा। इसलिए स्रोत से पानी ले जाना पड़ रहा है। वैसे भी, इस स्रोत का पानी स्थानीय लोग खूब इस्तेमाल करते हैं। भोगपुर और आसपास के गांवों में सरकार की पेयजल योजना से पानी सप्लाई होता है। भोगपुर के लोगों का कहना है, जबसे नई पाइप लाइन बिछी है, उनके यहां पानी कम, नलों से हवा ज्यादा आ रही है। जबकि पुरानी लाइन से ऐसे कभी नहीं होता था।

भोगपुर में ही दुकानदार रमेश चंद, जिनकी आयु 72 साल है, बताते हैं बचपन से यहां रह रहे हैं। पहले भोगपुर क्षेत्र में पानी की कोई कमी नहीं थी। यहां की नहर खुली थी, जिसे कुछ साल पहले बंद कर दिया है। अब उससे भी पानी मिलने की कोई संभावना नहीं है। यहां से थोड़ा दूर ही, एक स्रोत था, जिसे हम स्थानीय बोली में ओगल कहते हैं, उसमें पानी की मोटी धार निकलती थी। अब गर्मियों में उसमें पानी नहीं आता। पास ही एक और स्रोत है, जिसमें इन दिनों काफी पानी रहता था, अब स्थिति यह है कि वहां लाइन लगानी पड़ती है, क्योंकि बर्तन भरने में काफी समय लगता है।

भोगपुर में दुकानदार रमेश चंद ने क्षेत्र में पेयजल की दिक्कतों पर विस्तार से बात की। फोटो- राजेश पांडेय

रमेश चंद कहते हैं, पहले सीधा स्रोतों का पानी पाइप लाइन से घरों तक पहुंच रहा था। वो पाइप लाइन लगभग छह-सात फीट गहराई में थी। पानी की कोई कमी नहीं थी और मीठा पानी मिल रहा था। पर, कुछ माह पहले सरकारी योजना में पाइप लाइन बदल दी गई, जो पहले की अपेक्षा अधिक चौड़ी है। हमें बताया गया, यहां दूसरे क्षेत्रों से पानी लाया जाएगा, जिसको मोटी पाइप लाइन से सप्लाई करेंगे, अब यहां पानी की कोई कमी नहीं रहेगी। पर, जबसे पाइप लाइन बदली गई है, नलों में केवल हवा ही पहुंच रही है, पता नहीं, पानी कहां जा रहा है।

ढाई रुपये बिल में भरपूर पानी था, अब सात सौ में भी तरसे

“मेरे पास पानी के पुराने बिल भी पड़े हैं, जो दो-ढाई रुपये के हैं। उस समय जब हम ढाई रुपये बिल दे रहे थे, हमारे यहां पानी की कोई कमी नहीं थी। अब जब हम सात सौ रुपये बिल दे रहे हैं, पानी की जगह हवा मिल रही है। हमारे घर चलकर आपको पानी के हालात पता चल जाएंगे। लैट्रीन तक के लिए पानी बाहर स्रोत या दूर नहर से लाना पड़ रहा है। पानी की रीडिंग के मीटर तेज आवाज करते हैं। ऐसा लगता है कि ये पानी की जगह हवा की रीडिंग नोट कर रहे हैं, ” रमेश चंद बताते हैं।

वो बताते हैं, बिजली रहे या नहीं, स्रोत का पानी तो पहले से ही आ रहा था। अब बिजली आने पर पहले टैंक भरेगा, तब पानी मिलेगा। भोगपुर के घरों में पानी इसलिए भी नहीं आ रहा है, क्योंकि नई लाइन से सारा पानी ढाल पर सीधा नीचे चला जाता है।

भोगपुर में सूख गया 68 साल से भी पहले का स्रोत

बागी गांव के रास्ते पर श्री शिव मंदिर से थोड़ा आगे स्थित वर्षों पुराना जल स्रोत है, जिसकी दीवार पर उसके 1954 से भी पहले के होने की जानकारी मिलती है। इन दिनों इस स्रोत पर पानी नहीं है। ग्रामीण जितेंद्र सिंह बताते हैं, यहां पहले सालभर पानी था, पहले गर्मियों में थोड़ा कम हो जाता था।

भोगपुर में बागी गांव के रास्ते पर श्री शिव मंदिर के पास स्थित वर्षों पुराना स्रोत सूख गया। बताया जाता है कि अब गर्मियों में यहां पानी नहीं मिलता। यह स्रोत 1954 से भी पहले का है। फोटो- राजेश पांडेय

इस बार तो स्रोत सूखा है। इसमें सर्दियों व बरसात में पानी आएगा। पास वाले स्रोत से पानी मिल रहा है, पर यह पहले की अपेक्षा कम है।

खेती कम हो गई तो स्रोत सूखने लगे

भोगपुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता सुधीर जोशी हमें इठारना रोड स्थित दो स्रोत दिखाते हैं, जिनमें से एक सूख चुका है, दूसरे में बहुत कम पानी आ रहा है। एक स्रोत को रीचार्ज करने के लिए थोड़ा ऊंचाई पर छोटे-छोटे जलाश्य बनाए गए हैं, ताकि इनमें बारिश का पानी इकट्ठा हो सके। वहीं एक जगह स्रोत का पानी इकट्ठा किया जा रहा है, ताकि पाइपों से नलों तक पहुंचाया जा सके। 56 वर्षीय जोशी बताते हैं, उनका बचपन यहीं बीता। उनकी जानकारी में, यहां कई स्रोत सूख चुके हैं, जो स्रोत रीचार्ज हैं, उनमें पानी पहले से बहुत कम आ रहा है।

भोगपुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता सुधीर जोशी। फोटो- राजेश पांडेय

जोशी, स्रोत सूखने या उनसे कम पानी मिलने की वजह, कृषि क्षेत्रफल कम होना मानते हैं। बताते हैं, लोगों ने खेती करना कम कर दिया है या लगभग छोड़ ही दिया है। खेती नहीं होने से वर्षा या सिंचाई का पानी खेतों में जमा नहीं हो रहा है, ऐसे में भूजल में वृद्धि नहीं हो रही है। बंजर भूमि पर गिरने वाला वर्षा जल बहकर नालों में जा रहा है।

पहले जिन खेतों में कृषि होती थी, उनमें से अधिकतर में भवन निर्माण हो गया है। कुछ वर्षों में जमीनों की बिक्री में तेजी आई है। जमीनों की प्लाटिंग हो रही है। पेड़ कम हो रहे हैं। एक की परमिशन लेकर दस पेड़ काटे जा रहे हैं। ऐसे में भूजल बढ़ेगा, इसकी संभावना नहीं है। आबादी बढ़ने के अनुरूप संसाधन नहीं बढ़ रहे हैं। वो अंदाजा लगाते हैं कि आने वाले दस से बीस वर्षों में इन बचे खुचे स्रोतों के भी रीचार्ज होने की संभावना नहीं होगी।

भोगपुर से करीब एक किमी. इठारना रोड पर पुराना जल स्रोत, जहां बहुत कम पानी आ रहा है। फोटो- राजेश पांडेय

श्री शिव मंदिर के पास स्रोत पर पानी भरने आए प्रवेश कुमार मियां का कहना है, इस स्रोत पर पहले से पानी कम आ रहा है। पास ही के, वर्षों पुराने स्रोत से गर्मियों में पानी नहीं मिलता। वो पानी के लिए कई चक्कर लगा चुके हैं। यहां और आसपास के स्रोतों पर महिलाएं, बच्चे, युवा, बुजुर्ग पानी लेने आ रहे हैं। बच्चे बोतलों में पानी इकट्ठा करके ले जा रहे हैं।

भोगपुर में बागी गांव के रास्ते पर श्री शिव मंदिर के पास स्थित एक स्रोत पर पानी भरने पहुंचे लोग। फोटो- राजेश पांडेय

युवा सौरभ रावत भी स्रोत पर पानी लेने पहुंचे हैं, बताते हैं इस स्रोत पर पहले की तरह पानी नहीं मिल रहा है। गर्मियों में ज्यादा दिक्कत है। सर्दियों में यहां पानी मिल जाता है। आसपास के कई स्रोतों पर पानी कम हो रहा है या वो सूख गए हैं।

बुजुर्ग रमेश चंद बताते हैं, अब तो उनके यहां रिश्तेदारों ने भी आना बंद कर दिया। वजह है, भोगपुर नहर को अंडरग्राउंड करने से क्षेत्र की सुंदरता कम होना है। पहले भोगपुर नहर खुली थी, जिससे हम समय ठंडी हवा चलती थी। बहुत सुंदर नजारा था यहां। कहा गया कि नहर को अंडरग्राउंड करने से सड़क चौड़ी होगी। नहर में लोग कबाड़ फेंकते हैं, इसलिए इसे बंद करना होगा। नहर बंद होने से हमें तो कहीं नहीं लगा कि सड़क चौड़ी हो गई। जिन लोगों की कहीं भी कबाड़ फेंकने की आदत है, वो आज भी वैसा ही कर रहे हैं।

भोगपुर में सरकारी पेयजल योजना की टूटी लाइन से निकलता फौव्वारा, ग्रामीणों ने योजना से निकलती लाइन से कई जगह पानी बहता दिखाया। फोटो- राजेश पांडेय

देहरादून जिला के कई पर्वतीय गांवों तक जाना है तो भोगपुर से ही रास्ता है। यहां तक कि यहां से होकर जाने वाले रास्ते टिहरी के गांवों को भी जोड़ते हैं, जिनमें कौल गांव, कोडारना, कलजौंठी सहित कई गांव शामिल हैं।

भोगपुर क्षेत्र में आबादी बढ़ रही है, यहां जमीनों की बिक्री बढ़ी है, जिस वजह से यहां से होकर जा रही अंग्रेजों के समय की नहर, जिसे भोगपुर नहर के नाम से जाना जाता है, पर भी प्रभाव पड़ रहा है। भोगपुर नहर से जुड़े खेत कम हो रहे हैं, इसी वजह से इसके रखरखाव पर पहले की तरह ध्यान नहीं है। नहर के अंतिम सिरे पर स्थित गांवों में पानी मुश्किल से ही पहुंचता है। वैसे भी, भोगपुर से लेकर डांडी और सड़क पार के झीलवाला गांव सहित कई इलाकों में जमीन कृषि से आवासीय में बदल रही है। जब खेती ही नहीं होगी तो स्रोत कहां से रीचार्ज होंगे, पानी कहां से मिलेगा।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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