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चांद पत्थर को हिला तक नहीं पाए थे अंग्रेज

भोगपुर से करीब दो किमी. दूर है ऐतिहासिक धरोहर चांद पत्थर। हालांकि चांद पत्थर मान्यताओं में ही है और इसे लगभग भुला दिया गया है। गडूल ग्राम पंचायत में स्थित चांद पत्थर के पास से होकर भोगपुर नहर  बहती है। भोगपुर नगर जाखन नदी से वाया वसंतपुर, भोगपुर से होते हुए रानीपोखरी सहित कई गांवों की खेती को सींचती है।
डोईवाला से रानीपोखरी होते हुए करीब 15 किमी. दूर भोगपुर जा सकते हैं। भोगपुर से करीब डेढ़ किमी.आगे चांद पत्थर है, जिसके बारे में अब बहुत कम बात होती है। गर्मियों में भोगपुर नहर में नहाने के लिए आसपास के क्षेत्रों के युवा, बच्चे पहुंचते हैं।
कुल मिलाकर आसपास पिकनिक सा माहौल दिखता है। हमने वहां कुछ युवाओं से पूछा कि चांद पत्थर कहां है। उन्होंने एक गदेरे की ओर ओर इशारा करते हुए बताया, वहां है।
दरअसल. भोगपुर नहर  इस गदेरे के ऊपर बने एक पुल से होकर बहती है। हम बड़ी मुश्किल से इस गदेरे में उतरे तो पुल के ठीक नीचे चांद पत्थर दिखा, जिसके बारे में हमने काफी कुछ सुना है। पर, जो हमने सुना है, उसके अनुसार तो चांद पत्थर को सहेजने की जरा भी कोशिश नहीं दिखती। आसपास झाड़ियां, गंदगी ही दिखते हैं।
यहां तो किसी ऐतिहासिक स्थल जैसा कुछ भी नहीं, जबकि स्थानीय लोग बताते हैं कि अंग्रेजों ने इस पत्थर पर गोलियां बरसाईं थीं। इस पत्थर पर गोलियों के तीन निशान बताए जाते हैं, पर हमने इस पर ऐसे कई निशान देखे।
यह बात तो हम समझ गए कि इसको चांद पत्थर क्यों कहा जाता है। वो इसलिए, क्योंकि इस पर चांद जैसी गोलाकार बहुत सुन्दर आकृति बनी है। यह विशाल पत्थर वर्षों से एक ही जगह जमा है।

मैं वर्ष 2008 में यहां आया था, तब मुझे जानकारी मिली थी कि इस पत्थर के नीचे राजा का खजाना दबा है और अंग्रेज इस खजाने को निकालना चाहते थे। इसलिए इस पत्थर को हटाने के उन्होंने बहुत प्रयास किए, यहां तक उसको तोड़ने के लिए गोलियां तक चलाईं पर पत्थर हिला तक नहीं।
हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह कहना मुश्किल है। मान्यता ही सही या कहानी ही क्यों न हो, पर यह पत्थर स्वयं के ऐतिहासिक घटना से जुड़ने के साक्ष्य दिखा रहा है। हमें इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते।

चांद पत्थर को देखने के बाद हम नहर के किनारे पर चल रहे थे। प्रकृति के नजारों का आनंद उठाते हुए बेहद सुन्दर वसंतपुर गांव पहुंच गए। यह वसंतपुर गांव का निचला हिस्सा है।
शमशेर सिंह पुंडीर, निवासी वसंतपुर गांव
गडूल ग्राम पंचायत के इस गांव के ऊपरी और निचले हिस्से में लगभग 35 घर हैं। ग्रामीण शमशेर सिंह पुंडीर बताते हैं कि यहां खेती अच्छी होती है। पानी इस नहर से मिल जाता है।
गांव तक चौड़ी सड़क है, जो तमाम मुश्किलें दूर करती है। अस्पताल भोगपुर में है और हायर सेंटर हिमालयन अस्पताल। इस गांव में कृषि के साथ मुर्गीपालन भी आजीविका का माध्यम है।
चांद पत्थर के बारे में पुंडीर ने केवल वही जानकारी दीं, जो पहले से पता थीं। उनका कहना है कि यह सभी जानकारी अपने बुजुर्गों से सुनते आए हैं।
हमने वहां कुछ बच्चों से भी पूछा। उनको चांद पत्थर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता। कुल मिलाकर स्थानीय निवासियों के लिए चांद पत्थर कोई बड़ी बात नहीं है।

गडूल से बीडीसी मेम्बर नरदेव सिंह पुंडीर बताते हैं कि चांद पत्थर पर अंग्रेजों ने गोलियां चलाई थीं। पुंडीर एक नई जानकारी देते हैं, जब अंग्रेजों ने गोलियां चलाई थीं, तब पत्थर से दूध निकल रहा था।
नरदेव सिंह पुंडीर, बीडीसी मेम्बर, गडूल, डोईवाला
यह बात उन्होंने बुजुर्गों से सुनी थी। हालांकि पत्थर के नीचे खजाना दबे होने की बात उन्होंने नहीं सुनी। कहते हैं कि चांद पत्थर को सहेजा जाना चाहिए। पर्यटन विभाग को इसके लिए काम करना चाहिए। काफी लोग चांद पत्थर को देखने देहरादून, आसपास और दूरदराज से आते हैं।
कुल मिलाकर चांद पत्थर के बारे में संबंधित विभागों, विश्वविद्यालयों को शोध करना चाहिए, ताकि मान्यता और सच के बीच का फासला कम किया जा सके। चांद पत्थर अपने आकर्षण को बरकरार रखे, इसके लिए काफी काम करने की दरकार है।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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