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उत्तराखंड चुनावः कांग्रेस में परिवारवाद को बढ़ावा, महिलाओं को टिकट से परहेज

प्रत्याशी बनाने के बाद दो महिलाओं के टिकट काटे, हरीश रावत की बेटी को टिकट दिया

देहरादून। उत्तर प्रदेश में लड़की हूं, लड़ सकती हूं, का नारा देने वाली कांग्रेस ने उत्तराखंड में दो महिलाओं के टिकट काट दिए, जबकि इनके नामों की घोषणा की जा चुकी थी। उत्तराखंड में महिलाओं को टिकट देने से परहेज करने के साथ ही कांग्रेस ने परिवारवाद को खूब बढ़ावा दिया है। हरिद्वार ग्रामीण से पूर्व मुख्यमंत्री  हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत को प्रत्याशी घोषित करना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

कांग्रेस ने केवल पांच महिलाओं को बनाया प्रत्याशी

उत्तराखंड में कांग्रेस ने यूपी में जोरशोर से गाए जा रहे प्रियंका गांधी के नारे को कोई तरजीह नहीं दी। यहां से केवल पांच महिलाओं मसूरी से गोदावरी थापली, भगवानपुर से ममता राकेश, रुद्रपुर से मीना शर्मा, लैंसडौन से अनुकृति गुसाईं, हरिद्वार ग्रामीण से अनुपमा रावत को टिकट दिया है।

बुधवार देररात पांच सीटों पर फेरबदल में दो महिलाओं ज्वालापुर से बरखा रानी और लालकुआं से संध्या डालाकोटी को प्रत्याशी घोषित करने संबंधी अपने ही निर्णय को वापस ले लिया है।

इससे पहले, महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक सरिता आर्य को भी नैनीताल से टिकट कटने की आशंका थी, जिस पर सरिता आर्य ने भाजपा ज्वाइन कर ली और नैनीताल से  प्रत्याशी भी घोषित हो गई हैं।

कांग्रेस में परिवारवाद को बढ़ावा

कांग्रेस ने नैनीताल सीट पर कुछ माह पहले भाजपा से आए संजीव आर्य को प्रत्याशी बनाया है।संजीव आर्य पूर्व कैबिनेट मंत्री यशपाल आर्य के पुत्र हैं। यशपाल आर्य बाजपुर सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं।

काशीपुर सीट पर पूर्व सांसद केसी सिंह बाबा के बेटे नरेंद्र चंद सिंह को टिकट दिया है। केसी सिंह बाबा कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा एवं लोकसभा के चुनाव लड़ चुके हैं।

कांग्रेस ने कुछ दिन पहले भाजपा से निष्कासित होकर कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत की पुत्रवधू अनुकृति गुसाईं को लैंसडौन से प्रत्याशी बनाया है।

हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत को हरिद्वार ग्रामीण से प्रत्याशी घोषित किया गया है। इस सीट पर पिछले चुनाव में हरीश रावत को भाजपा के यतीश्वरानंद ने हराया था।

भाजपा ने मात्र आठ महिलाओं को दिया टिकट

वहीं, उत्तराखंड में भाजपा ने अभी तक दस फीसदी से थोड़ा ज्यादा सीटों पर यानी आठ महिलाओं को प्रत्याशी घोषित किया है। जिनमें केदारनाथ से शैलारानी रावत, कोटद्वार ऋतु भूषण खंडूड़ी, देहरादून कैंट से सविता कपूर, खानपुर से कुंवरानी देवयानी, यमकेश्वर से रेणु बिष्ट,  पिथौरागढ़ से चंद्रा पंत, सोमेश्वर से रेखा आर्य, नैनीताल से सरिता आर्य शामिल हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी की बेटी ऋतु भूषण खंडूड़ी को कोटद्वार से प्रत्याशी घोषित किया गया, जबकि प्रत्याशियों की पहली लिस्ट में यमकेश्वर से विधायक ऋतु खंडूड़ी का नाम नहीं होने पर माना जा रहा था कि उनको पार्टी चुनाव नहीं लड़ाएगी। दूसरी लिस्ट में उनको शामिल किया गया है।

परिवारवाद को बढ़ावा देने में भाजपा भी पीछे नहीं

भाजपा ने कांग्रेस को हमेशा परिवारवाद को लेकर निशाना बनाया है, पर उत्तराखंड में भाजपा भी परिवारवाद को बढ़ावा देने में पीछे नहीं रही। उसने परिवारवाद को बढ़ावा देने के लिए नया फार्मूला तलाश किया है। भाजपा ने काशीपुर में विधायक हरभजन सिंह चीमा के बेटे त्रिलोक सिंह चीमा तथा खानपुर में विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन की पत्नी कुंवरानी देवयानी तथा देहरादून कैंट सीट पर स्वर्गीय हरबंश कपूर की पत्नी सविता कपूर को प्रत्याशी घोषित किया गया है।

महिलाओं के मुद्दों पर शोर पर प्रत्याशी बनाने से परहेज

चुनाव में महिलाओं से जुड़े तमाम मुद्दों पर जोर शोर से बात करने वाले दलों ने महिलाओं को प्रत्याशी बनाए जाने के मामले में कंजूसी की है और परिवारवाद को बढ़ावा दिया है।

उत्तराखंड में महिला मतदाता

2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में 75,92,996 में से महिला मतदाताओं की संख्या 36,02,801 है। वहीं, 2017 के चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या 47 फीसदी थी। पिछले चुनाव में उत्तराखंड की 70 सीटों में से मात्र 41 पर ही महिलाएं चुनाव मैदान में उतरीं। कुल 62 महिलाओं ने चुनाव लड़ा, जिनमें से रायपुर सीट पर सबसे अधिक मात्र चार महिलाएं उम्मीदवार थीं। भाजपा ने पांच, कांग्रेस ने आठ, बसपा ने तीन, सपा ने पांच सीटों पर महिलाओं को उम्मीदवार बनाया था। अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में 30 महिलाओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ा था। चुनाव में पांच महिलाओं ने विजय हासिल की, जिनमें भाजपा की तीन, कांग्रेस की दो प्रत्याशी शामिल हैं।

उत्तराखंड में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, महिलाओं की आबादी 49.48 लाख है, जबकि पुरुषों की संख्या 52.38 लाख है। वहीं राज्य की 71 फीसदी महिला आबादी गांवों में निवास करती है। राज्य की 65 फीसदी आबादी की आजीविका कृषि है। राज्य में 64 फीसदी महिलाएं कृषि करती हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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