बच्चों की पढ़ाई के लिए उफनती नदी को दिन में 16 बार पार करते धामन सिंह
Tehri Garhwal school children
राजेश पांडेय। देहरादून, 20 जुलाई 2025
Tehri Garhwal school children: दुबले पतले शख्स को उनकी पीठ पर बैठी बच्ची ने दोनों हाथों से कसकर पकड़ा हुआ है और कंधों पर बस्ता टांगे दूसरे बच्चे ने उनका हाथ पकड़ा है। इन शख्स का नाम धामन सिंह राणा है, जो टिहरी गढ़वाल के जामन काटल गांव के रहने वाले हैं। शनिवार सुबह धामन सिंह बच्चों को गवालीडांडा गवर्न्मेंट प्राइमरी स्कूल छोड़ने जा रहे हैं। पीठ पर बैठी छह साल की आंचल और बस्ता लेकर साथ चल रहा बच्चा क्लास चार में पढ़ने वाला कार्तिक है। घर से चिफल्डी गांव तक आने में इनको पैदल ही चार बार नदी पार करनी पड़ती है। यहां चिफल्डी में पुल बनाया जा रहा है, हालांकि ग्रामीणों में निर्माण की धीमी रफ्तार को लेकर नाराजगी है।
टिहरी गढ़वाल का जामन काटल गांव, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से लगभग 30 किमी. की दूरी पर भी नहीं होगा, पर यहां के धामन सिंह राणा को दो छोटे बच्चों को गवालीडांडा के प्राइमरी स्कूल लाने और ले जाने के लिए रोजाना 12 किमी. पैदल चलना पड़ता है, वो भी उफनती चिफल्डी को 16 बार पैदल ही पार करके। 2022 की आपदा के बाद से हालात इतने खराब हो गए कि धामन सिंह को नदी किनारे टूटे पहाड़ों के मलबे, जिसमें बड़ी चट्टानें और पत्थर हैं, को बच्चों को साथ लेकर पार करना पड़ रहा है।
Pahadi Pedallers के संस्थापक सॉफ्टवेयर इंजीनियर गजेंद्र रमोला के साथ शनिवार को न्यूज लाइव की टीम चिफल्डी गांव पहुंची। इस गांव में नदी के पास वाले दस के आसपास घर अगस्त, 2022 की आपदा में तहस नहस हो गए थे। गांव के घराट सहित कई घर तीन साल बाद अब या तो खंडहर बन गए या फिर नदी की रेत बजरी में दब गए। यहां रहने वाले परिवार नदी पार चिफल्डी के दूसरे हिस्से में शिफ्ट हो गए। आपदा से पहले गवालीडांडा के प्राइमरी स्कूल और रगड़गांव के इंटर कॉलेज जाने वाले बच्चे अब दुबड़ा और मालदेवता के स्कूलों में जाते हैं। चिफल्डी के आबाद हिस्से से दुबड़ा लगभग आठ किमी. और मालदेवता का इंटर कॉलेज इससे कहीं ज्यादा दूर है।
हां, तो हम बात कर रहे थे, धामन सिंह राणा की, जो 40 साल के हैं और धौलागिरी ग्राम पंचायत के जामन काटल गांव में रहते हैं। जामन काटल गांव धनोल्टी तहसील, जौनपुर ब्लॉक में है। यह इलाका उस चिफल्डी गांव से लगभग तीन किमी. दूर है, जहां 19 अगस्त 2022 की आपदा ने जमकर तबाही मचाई थी। जामन काटल में धामन सिंह राणा के घर के सामने और नदी पार की ऊंची पहाड़ियां भूस्खलन की चपेट में आ गईं। पहाड़ से गिरा मलबा, जिसमें बड़े बोल्डर और पत्थर हैं, चिफल्डी नदी में जमा हो गए। हालात यह हो गए कि धामन के घर से काफी नीचे बह रही नदी अब काफी ऊँचाई पर है। नदी पर बने पुल ध्वस्त हो गए।
अगस्त 2022 के बाद से मुश्किलें और बढ़ गईं, हालांकि धामन पहले भी नदी किनारे और वैकल्पिक रास्ते से बच्चों को स्कूल पहुंचा रहे थे। पर, अब नदी भारी चट्टानों और पत्थरों से भरी है और उसका प्रवाह तेज हो गया है। बरसात में तो हालात इतने खराब हो जाते हैं कि बच्चों की स्कूल से छुट्टी करना मजबूरी हो जाता है।
एक बार फिर, धामन सिंह के बच्चों की स्कूल तक की पैदल यात्रा और उनके संघर्ष पर बात करते हैं। धामन बताते हैं, “मेरे चार बच्चे हैं, जिनमें से सबसे बड़े बेटे को शेरा गांव भेजा है उसके ताऊजी के पास। वो वहीं पढ़ाई करता है। उससे छोटा बेटा कार्तिक और बिटिया आंचल को गवाली डांडा के राजकीय प्राइमरी स्कूल में भर्ती कराया है। सबसे छोटी बेटी अदिति को आंगनबाड़ी केंद्र में भर्ती कराना है, पर मैं तीन बच्चों को नदी के रास्ते स्कूल नहीं ले जा सकता, इसलिए वो घर पर ही है।”
धामन सिंह, इन दिनों सुबह सात बजे से पहले दोनों बच्चों को घर से स्कूल छोड़ने के लिए निकलते हैं और फिर वहां से वापस घर लौटते हैं। घर में पशुओं के लिए चारा जुटाने, बकरियों को चराने के बाद फिर करीब 12 बजे घर से स्कूल जाते हैं और बच्चों को लेकर वापस लौटते हैं। एक तरफ जाने में चिफल्डी नदी को चार बार पार करना पड़ता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि नदी कहीं आपदा में गिरे मलबे के बीच से होकर बह रही है और कहीं पहाड़ के ठीक किनारे से।
वो बताते हैं, वहां से लौटकर फिर पशुपालन व खेती में जुट जाते हैं। बताते हैं, इन कार्यों में पत्नी ममता, चाची कोसा देवी, चाचा की बेटी बहन प्रियंका भी हाथ बंटाते हैं।
उनका कहना है, बकरीपालन से सालभर में कुछ रकम मिल जाती है, वहीं गाय-भैंस से दूध मिल जाता है। बाकी खेतीबाड़ी से सालभर की सब्जियां और कुछ अनाज मिल जाता है। रही बात, गांव से पलायन करने की, वो नहीं करेंगे।












