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मैं तैयार था उस कुश्ती के लिए, जिसका कोई दांव पेंच नहीं जानता था

बचपन की बातेंः स्कूल यूनीफार्म तो मैं हाथ में लेकर घर पहुंचता था

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

मैं जिस स्कूल में पढ़ता था, वहां इंटरवल में घर जाकर खाना खाने या फिर आसपास की दुकानों पर चीज खाने की छूट थी। उस समय कक्षा छह से आठ तक के इस सरकारी विद्यालय की बाउंड्रीवाल नहीं थी। विद्यालय का मैदान बहुत बड़ा था, जिस पर छुट्टियों के दिनों में क्रिकेट मैच होते थे। क्रिकेट टूर्नामेंट में आसपास के कई जिलों से टीमें आती थीं और हम लोग छुट्टियों में बतौर दर्शक इसी मैदान के इर्द गिर्द घूमते हुए देखे जा सकते थे।

इंटर स्कूल गेम्स भी यहीं होते थे, जिसमें आसपास के कई विद्यालयों के बच्चे आते थे। मुझे याद है,इस मैदान के एक कोने से दूसरे कोने तक सौ मीटर की दौड़ आसानी से हो जाती थी। मैं भी दौड़ा था इस ट्रैक पर, लेकिन कभी विजेता नहीं बन सका। जानते हो क्यों, मैंने बचपन से अब तक अपनी डाइट और स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। एक्सरसाइज नहीं करना, सुबह जल्दी नहीं उठना, रात को देर से सोना, तला-भुना, मसालेदार खाना पसंद करना, फास्ट फूड का दीवाना होगा, जरूरत से ज्यादा खाना, भोजन के लिए समय का निर्धारण नहीं करना… इन आदतों ने मुझको भरपूर आलसी बना दिया।

अब दिक्कतें झेल रहा हूं। मेरा तो सभी से कहना है कि अपने भोजन और स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा। पौष्टिक खाइए, उतना ही खाइए, जो शरीर के लिए आवश्यक है और पाचन योग्य हो। मैं आपको तो बता रहा हूं, पर मैं अपने में कब सुधार कर पाऊंगा, कह नहीं सकता।

आप भी कहोगे, मैं भटक जाता हूं। बात स्कूल की कर रहा था और यहां भोजन और सेहत पर पहुंच गया। इंटर स्कूल गेम्स में मुझे कुश्ती के लिए सेलेक्ट किया गया। सातवीं कक्षा में पढ़ता था और मैंने इससे पहले कुश्ती नहीं लड़ी थी। मैं न तो कुश्ती के नियम जानता था। हो सकता है कि मेरा चयन अन्य बच्चों की तुलना में मेरे भारी शरीर को देखकर कर लिया हो। बच्चा था, इधर उधर दौड़ता रहता था, इसलिए उनको फुर्तीला तो दिखता होगा। यह भी हो सकता है कि कोई बच्चा कुश्ती लड़ने के लिए तैयार ही नहीं हुआ होगा। आजकल की तरह उस समय कुश्ती के लिए मैट तो होता नहीं था। वहां तो मिट्टी में ही अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़ना था। कुश्ती में तो आपको पूरी तरह मिट्टी में सन जाना था, चाहे जीत जाओ या फिर हार जाओ।

मैं तैयार था उस कुश्ती के लिए, जिसके किसी दांव पेंच से मेरा कोई संबंध नहीं था। मुझे तो केवल इतना मालूम था कि तुम्हें जीतना है, सामने वाले पर हावी होना है। कुल मिलाकर मैं कुश्ती को उस भिड़ंत की तरह समझ रहा था, जो किसी भी नियम या अनुशासन में नहीं बंधी होती। मैं सौ फीसदी गलत था और अंततः हार का सामना करना पड़ा।

मेरा प्रतिद्वंद्वी पास के ही गांव में रहता था और वो कुश्ती के नियमों को जानता था। वो किसान परिवार से था और मिट्टी से उसका गहरा वास्ता था। मिट्टी से प्यार ने ही उसको विजेता बनने में भरपूर सहयोग दिया।

हम कुश्ती लड़ रहे थे, हमारे चारों तरफ दर्शकों की भीड़ थी। मैं दबाव बनाने के लिए उल्टे सीधे हाथ पैर चला रहा था, जिस पर रेफरी से डांट भी पड़ गई। कुछ देर में, हम दोनों जमीन पर थे मिट्टी में सने हुए। तालियां बज रही थी। ये तालियां मेरे लिए थी या उसके लिए, मुझे ज्ञान नहीं था। उसके एक दांव ने मुझे हरा दिया।

वो खुश था पर मैं भी कोई दुखी या निराश नहीं था। यह आज से करीब 35 साल पहले के बचपन की बात है, जिसमें किसी बच्चे के लिए हार या जीत के कोई मायने नहीं होते थे। मेरे शिक्षक ने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए कहा, तुम कुश्ती में बहुत अच्छा कर सकते हो। तुम्हें ट्रेनिंग लेनी होगी, किसी पहलवान से बात करते हैं।

मैं बहुत खुश था कि मुझे पहलवान से कुश्ती सिखाने की बात हो रही है। कुछ दिन बाद एक पहलवान जी, स्कूल पहुंचे और एक पीरियड में कुछ बच्चों को कुश्ती के दांव पेंच सिखाने लगे। उन्होंने हमें गारे ( गीली मिट्टी) में ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया।

ठीक इंटरवल से पहले पीरियड में कुश्ती सीखते। घर जाते हुए गीली मिट्टी लपेटे हुए शरीर पर सिर्फ अंडरवियर होती। स्कूल यूनीफार्म तो हाथ में लेकर चलता था। मुझे देखकर कोई हंसने लगता और कोई यह भी कह देता होगा कि यह बच्चा पढ़ने जाता है या किसी से लड़ने। क्या हाल बना रखा है इसने। पर बचपन में मुझ पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था, कि कोई क्या कह रहा है। मैं तो अपनी इस दशा में भी बहुत खुश था, क्योंकि इसमें मुझे अवसर दिखाई दे रहा था।

घर पहुंचता, मां को मुझ पर गुस्सा तो आता, पर वो भी क्या कर सकती थीं। उस समय मेरी शक्ल इतनी भोली नजर आती थी कि मां हंसकर कहती, जल्दी से नहा ले, तेरे लिए चाय बना देती हूं। कुछ दिन तक कुश्ती सीखता रहा, पर एक दिन हम पहलवान जी का इंतजार करते रहे, वो नहीं आए। कुछ दिन और इंतजार किया और फिर उम्मीदें छोड़ दीं। वो क्यों नहीं आए, हमें नहीं पता। न ही हमने यह जानने की कोशिश की। हमारे लिए मिट्टी से शुरू हुआ एक अवसर, एक दिन मिट्टी में ही मिल गया।

जिस स्कूल में 1985 से 1987 तक क्लास छह से आठ तक पढ़ाई की, वो अब इंटरमीडिएट तक हो गया। कुछ दिन पहले ही मैंने ऐसा सुना है। वहां मैदान को बिल्डिंग से कवर कर दिया गया है। पहले तो तीन क्लास के लिए तीन बड़े कमरे, हेड मास्टर सर के कार्यालय का एक छोटा सा कक्ष था। एक छोटा सा कमरा और था, जिसमें पानी के लिए नल लगा था। कुछ साल पहले नगर पालिका के इलेक्शन में वोट डालने गया था, इनमें से ही एक कमरे में।

Rajesh Pandey

राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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