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मां मेरे हाथ पर पेंसिल बांध देती थीं

स्कूल जाते समय पेंसिल मेरे बैग में नहीं होती, वो तो मेरे हाथ पर डोरी से लटक कर स्कूल जाती

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

मैं बहुत छोटा था और मुझे कॉपियों पर यूं ही पेंसिल चलाने में बहुत मजा आता था। स्कूल में एडमिशन हो गया था। दो-तीन कॉपियों, रंग बिरंगे चित्रों वाली एक किताब और पेंसिल के साथ स्कूल का पहला दिन। मेरी मां मुझे यह सबकुछ बताती हैं। थोड़ा बहुत मुझे याद है। जिस स्कूल में मेरा एडमिशन कराया गया था, वह दो कमरों वाला था।

नया-नया स्कूल था और बच्चे भी ज्यादा नहीं थे। आज जब भी वहां से होकर गुजरता हूं तो कभी कभार अपने पहले स्कूल की याद आ जाती है। स्कूल की जगह, अब वहां एक दुकान है।

खैर, अब आपको अपनी पढ़ाई के बारे में बताता हूं। मुझे शुरुआत से लेकर आज तक पढ़ाई में बहुत ज्यादा होशियार नहीं माना जाता था। बचपन में होमवर्क मेरे लिए सबसे जरूरी था। पहले दिन से ही होमवर्क के नाम पर कॉपी पर कुछ लकीरें खींचने को मिल गईं थीं। मुझे बिन्दुओं को मिलाकर सीधी, तिरछी लाइनें बनानी थीं। मां मेरा हाथ पकड़कर मुझे यह होमवर्क कराती थीं। कभी कभी यह काम पड़ोस में रहने वाली दीदी को सौंप दिया जाता था।

शुरुआत में मैंने कभी लाइन खींचने में रूचि नहीं ली, क्योंकि एक बिंदु से दूसरे बिंदु को मिलाने में मुझे लगता था कि यह होमवर्क तो मुझे बांध रहा है। मैं तो अपने मन की करना चाहता था। मेरा मन तो कॉपी पर कहीं भी पेंसिल चलाने में लगता था। अपनी बनाई बेवजह की आकृतियों में वजह तलाशने की कोशिश भी, मैं करता था। मैंने क्या बनाया, इसका आकलन केवल, मैं ही करता था। मुझे डांट भी पड़ती थी और डांट के बाद मां का स्नेह भी मिलता था।

समय के साथ मैं सीख गया कि कॉपी पर अपने मन से पेंसिल नहीं चलानी। आपको तो वहीं सबकुछ करना है, जो टीचर और मां चाहते हैं। पूरी पढ़ाई भर मैं कुछ नियमों में बंध गया। मुझे स्कूल, क्लास, होमवर्क के फ्रेम में जड़ सा दिया गया। अब मैं कुछ आजाद हूं और अपने मन की बात आपसे कर रहा हूं। बात करते करते कहां चला गया मैं।

एक बात बताऊं आपको… मैं पेंसिल बहुत खोता था। स्कूल से घर लौटता तो पेंसिल गायब। रोज-रोज पेंसिल खोने वाला मैं अकेला, कोई था स्कूल में। इसलिए पेंसिल खोने में मुझे अपनी कोई गलती नजर नहीं आती थी। मां मेरे लिए पेंसिल की अहमियत को समझती थीं। वो मुझे जिम्मेदार बनाना चाहती थीं। उन्होंने मेरी पेंसिल को दो टुकड़ों में बांट दिया। पहले से आधी हो चुकी पेंसिल में डोरी फंसाने की जगह बनाई और फिर पेंसिल को डोरी से मेरे हाथ पर बांध दिया।

स्कूल जाते समय पेंसिल मेरे बैग में नहीं होती, वो तो मेरे हाथ पर डोरी से लटक कर स्कूल जाती। बच्चे मेरे हाथ पर पेंसिल बंधी देखकर खूब हंसते। मैं भी क्या करता, मैं भी उन्हें देखकर मुस्करा देता। मुझे अपनी मां के इस अभिनव प्रयोग पर आज भी गर्व है। उस दिन के बाद कुछ और बच्चे भी हाथ पर पेंसिल बांधकर आने लगे।

सच बताऊं, उस दिन के बाद से मेरी पेंसिल कभी नहीं खोई। जब भी डोरी टूटी, मुझे पता चल गया और मैंने पेंसिल को खोने नहीं दिया। मैं अपनी पेंसिल की खूब चिंता करने लगा। स्कूल यूनीफॉर्म की तरह पेंसिल को खुद ही हाथ पर बांधने लगा। इस तरह मैं छोटी सी उम्र में जिम्मेदार बन गया। मैंने अपने बचपन का यह किस्सा साझा करके यह बताने की कोशिश की है कि उस समय कुछ बताने और अहसास कराने के तरीके बड़े अभिनव थे।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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