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जब भीम नहीं खा पाए तो पहाड़ बनकर मंदाकिनी में खड़ा है सत्तू ढिंडा

2013 की आपदा में टस से मस नहीं हुई यह गोलाकार विशाल चट्टान

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

रुद्रप्रयाग जिले में श्रीकेदारनाथ हाईवे पर मंदाकिनी नदी में खड़ी चट्टान को देखकर जितना अचरज होता है, उतनी ही रोचक है इसकी कथाएं और मान्यताएं। इसकी कथा पांडवों से जुड़ी बताई जाती है। लोककथा के अनुसार, यह भीम का सत्तू है, जिसे वो खाए बिना ही श्रीकेदारनाथ की ओर आगे बढ़ गए थे। भीम सत्तू को क्यों नहीं खा पाए थे और सत्तू विशाल चट्टान जैसा कैसे बन गया, इस बारे में हमने पास के ही गांव गिंवाला में रहने वाले बुजुर्गों से बात की, जो बचपन से इसके बारे में एक कथा सुनते आए हैं।

रुद्रप्रयाग जिले के गिंवाला गांव के बुजुर्ग। फोटो- राजेश पांडेय

इसको स्थानीय बोली में सत्तू ढिंडा कहा जाता है। ढिंडा का मतलब गोला होता है, जैसे कि रोटी बेलने से पहले गूंथे हुए आटे का गोला या ढिंडा बनाया जाता है। सत्तू का ढिंडा रुद्रप्रयाग शहर से करीब 25 किमी. दूरी पर है और जब आप श्री केदारनाथ जाते हैं, तो यह सौड़ी गांव में मंदाकिनी नदी में दिखाई देता है।

राजकीय इंटर कालेज से प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त 77 वर्षीय शिवराज सिंह भंडारी बताते हैं, मेरे पिताजी इसे सत्तू ढिंडा कहते थे। इसके बारे में एक लोककथा प्रचलित है, जिसके अनुसार, महाभारत युद्ध में कौरवों के वध से पांडवों पर वंश हत्या का दोष लग गया था, वो दोष तभी दूर हो सकता था, जब पांडव भगवान शिव के दर्शन करते। भगवान शिव को ढूंढते हुए पांडव श्रीकेदारनाथ की ओर जा रहे थे।

पांडवों ने भीम के लिए सत्तू का ढिंडा बनाकर रखा था, जिसके बारे कहा जाता है कि इसको सिर्फ रात में खाया जा सकता था। सुबह होने तक यह पत्थर में बदल जाएगा। भीम उनसे काफी पीछे चल रहे थे। भीम जब तक सत्तू के ढिंडा तक पहुंचे, उस समय तक रात खुल गई थी। भीम ने समझ लिया कि यह मुझे खाने को नहीं मिल पाएगा तो उन्होंने इसको मुट्ठी से प्रहार करके दो हिस्सों में बांट दिया और आगे बढ़ गए। इस गोलाकार चट्टान को दो भागों में बंटा देखा जा सकता है।

रुद्रप्रयाग जिले के गिंवाला गांव निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शिवराज सिंह भंडारी। फोटो- राजेश पांडेय

2013 की बाढ़ में लग रहा था कि यह विशाल पत्थर भी बह जाएगा, क्योंकि बड़े पत्थर भी उस बाढ़ में इधर उधर हो गए थे। मंदाकिनी नदी में बाढ़ के समय इसका थोड़ा सा हिस्सा दिखाई दे रहा था, पर यह टस से मस नहीं हुआ।

“आजकल, यह ऐसा दिखाई दे रहा है कि इसके नीचे शायद कोई बड़ा पत्थर है और यह उस पर यह टिका है। हमें यह शिवलिंग जैसा भी लग रहा है। हो सकता है कि इसके आधार में जलहरी हो। बाढ़ में यह टस से मस नहीं हुआ, जबकि आसपास के बड़े पत्थर बह गए, इसलिए कहा जा सकता है कि कोई बड़ा पत्थर इसके आधार में स्थित है।

यह भी हो सकता हो कि यह कभी पहाड़ रहा हो, यहां नदी है। नदी के वेग से कटकर यह गोलाकार हो गया। इससे इसमें कई बड़े छेद भी हो गए हैं,” शिवराज सिंह भंडारी बताते हैं।

उन्होंने बताया, यहां भटवाड़ी के पंडित जी ने यज्ञ किया था और एक ध्वज भी फहराया था। उस समय यहां एक सांप भी दिखा था, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुट गए थे। अंत में वो सांप शायद बाहर आया था या मर गया था।

सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य भंडारी बताते हैं, इसको अंतिम सत्य भी कहा जाता है। कई गांवों के मृतकों का अंतिम संस्कार यहीं होता है। यह भी हो सकता है, सत्य शब्द से यह सत्तू ढिंडा का नाम से प्रसिद्ध हो गया हो।

भंडारी बताते हैं, जब भी यहां देवी मां की डोली आती है। देवी का रूप बहुत अलग हो जाता है। कहा जाता है कि यहां देवी का दैत्य से युद्ध होता है। युद्ध के बाद ही देवी यहां स्नान करती हैं।

इस पर बड़े पौधे उग गए हैं, लोग इन पौधों की टहनियों को पकड़कर इसके ऊपर चढ़ जाते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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