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गुलाब के किसान से मुलाकात, जो वेलेंटाइन डे से उत्साहित हैं

गुलाब की कलियों की इतनी मांग बढ़ गई कि किसान पूरी नहीं कर पा रहे

देहरादून। वेलेंटाइन वीक में बड़ी संख्या में युवाओं और बाजार में उत्साह रहता है, पर किसान भी इस दौर में कम खुश नहीं हैं, हम बात कर रहे गुलाब की खेती करने वाले किसानों की। हमने एक किसान से बात की तो उनका कहना था, गुलाब की कलियों की इतनी डिमांड है कि हम पूरी नहीं कर पा रहे हैं। अन्य दिनों की तुलना में कम से कम पांच से छह गुना तक मांग बढ़ जाती है। गुलाब की कलियों (Rosebuds) के विक्रेताओं ने फरवरी महीने से पहले ही ऑर्डर कर दिया था, जितना भी उत्पादन होगा, वो सब हमारे पास भेज देना।

देहरादून जिले के थानो क्षेत्र में गोविंद सिंह नेगी गुलाब की खेती (Rose Farming) करते हैं। गोविंद सिंह लंबे तने वाली ताजमहल या टॉप सीक्रेट किस्म (Species of Rose) उगाते हैं, जिसकी बहुत अधिक मांग है। वैलेंटाइन वीक (Valentine week)  पर गुलाब की बढ़ती मांग (Demands of rosebuds on valentine week) को लेकर काफी उत्साहित हैं। बताते हैं, मांग अन्य दिनों की तुलना में छह गुना बढ़ गई है। स्थिति यह है कि हम मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं।

गोविंद सिंह बताते हैं, वैलेंटाइन डे के लिए लगभग 600 कलियां निकाल पाएंगे। यानी उनके पास जितनी कलियां इस समय उपलब्ध हैं, सभी वेलेंटाइन डे पर बिक जाएंगी। एक बंडल में 20 कलियां आती हैं, हम दो दिन में बाजार में तीस बंडल बेचने की स्थिति में हैं। एक पौधे से एक महीने में दो या तीन या फिर ज्यादा स्वस्थ पौधा चार फूल ही देता है। एक प्रतिशत पौधे खराब भी हो जाते हैं।

गोविंद सिंह, तीन साल से गुलाब की खेती कर रहे हैं, बताते हैं ये पौधे बेंगलुरू से लेकर आए हैं, एक बार में ही तीन हजार से अधिक पौधे लाए थे। वर्तमान में लगभग दस हजार से ज्यादा पौधे तीन पॉलीहाउस में लगे हैं।

देहरादून जिला के थानो में किसान गोविंद सिंह नेगी कर रहे हैं गुलाब की खेती। फोटो- राजेश पांडेय

उनके तीन पॉलीहाउस में डेढ़ हजार स्क्वायर मीटर में गुलाब की खेती है। इसको किसी भी मौसम में लगा सकते हैं। सर्दियों में यह कम खिलता है और इसकी मांग भी ज्यादा रहती है, जबकि इन दिनों बाहर से भी फूल नहीं पहुंचता। मांग ज्यादा होने और आपूर्ति कम होने पर इसका रेट बढ़ जाता है। सर्दियों में शादियों का सीजन भी होता है।

पांच सौ स्क्वायर मीटर में साढ़े तीन हजार पौधे लगे हैं। बेंगलुरू या पुणे से 10 से 12 रुपये का पौधा आता है। पौधा सहारनपुर में भी मिलता है, पर बेंगलुरू में हर तापमान पर फलने वाली प्रजाति मिल जाती है।

देहरादून जिला के थानो में किसान गोविंद सिंह नेगी ने गुलाब की कलमें तैयार करने के लिए पौध तैयार की हैं। फोटो- राजेश पांडेय

गुलाब का पौधा, तीन महीने में फूल देता है। एक पौधा पांच छह साल तक चलता है। आप खुद भी इसकी कलमें बना सकते हैं।

गुलाब के फूल के बंडलों का रेट 300 से 400 रुपये तक हो जाता है। पर, हमारे से 20 फूल या कलियों का एक बंडल, डेढ़ सौ रुपये में खरीदा जाता है, जो फिक्स किया गया है। हम ऋषिकेश, दिल्ली, देहरादून के बाजार में इसको बेचते हैं। वैसे, ऋषिकेश और देहरादून में ही ज्यादा खपत हो जाती है।

डेढ़ हजार स्क्वायर मीटर के तीन पॉली हाउस में एक दिन छोड़कर  20 से 25 बंडल यानी 400-500 पीस कलियां या फूल निकल जाते हैं। हमारे पास मौजूद पौधा तीन साल का है, पानी- खाद ठीक तरीके से मिल रही हो तो गुलाब का पौधा पांच से छह साल तक चल जाएगा।

पांच सौ स्क्वायर मीटर के पॉली हाउस की संरचना में लगभग छह लाख रुपये का खर्चा आया, जिसका रेट 1200 रुपये प्रति स्क्वायर मीटर है, जिसमें उद्यान विभाग 50 फीसदी तक अनुदान देता है। जबकि वर्तमान में सब्सिडी 80 फीसदी है। हमें विभाग से पौधे नहीं मिले थे, पर अब विभाग पौधे भी उपलब्ध करा रहा है। उद्यान विभाग से अनुदान मिलने पर हमें काफी फायदा है। एक साल में एक पॉलीहाउस से लगभग दो लाख रुपये तक की कमाई हो जाती है। लगभग पांच साल में इसकी लागत पूरी हो जाएगी।

गुलाब की किस्में, जिनकी ज्यादा मांग है
गुलाब का एक पौधे एक माह में कितने फूल देता है
एक बंडल या बंच में कितने फूल होते हैं
कहां मिलती हैं गुलाब की अच्छी पौध
कितने एरिया में गुलाब के पौधे लगाए जा सकते हैं

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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