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एक थी रिस्पना… : देहरादून की प्रमुख नदी

  • जेपी मैठाणी

एक नदी थी ऋषिपर्णा, बाद में इसकाे रिस्पना कहा जाने लगा। अब तो नाम ही रह गया है, नदी तो कब की विदा हो गई। इसका रूप अब किसी को नहीं लुभाता। यह यूं ही नहीं दून की विरासत कही जाती थी, इसने दून को जीवन दिया है और लोगों को अपने आसपास बसने का मौका। रिस्पना दून की अाबोहवा के माफिक माहौल पैदा कर रही थी। इसके प्रवाह में कोई बाधा नहीं थी।

देहरादून स्थित रिस्पना नदी का 1992 का एक नजारा। उस समय रिस्पना में साफ पानी बहता था और इसको कूड़ा करकट का डंपिंग जोन नहीं बनाया गया था। आज रिस्पना दूषित और कूड़ाघर बन गई है।

अब देहरादून की इस खिलखिलाती, इठलाती सदानीरा को नजर लग गई। कभी लोग इसका दीदार करने आते थे, लेकिन अब रोजाना अपमान हो रहा है। पीड़ा सह सहकर यह अब नहीं खिलखिलाती। इसने बहना ही छोड़ दिया है। बढ़ती आबादी और कब्जों का सिलसिला कुछ इस तरह चला कि रिस्पना का दम घुटने लगा और आज यह सांसें गिन रही है।

सब इसकी ओर देख रहे हैं, रोजाना इसका नाम ले रहे हैं, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो पा रहा है, जिससे कहा जा सके कि जख्म सहते सहते बेजान हो गई रिस्पना को फर्स्ट एड तो मिल रही है। कभी सुना था कि इसको सरकारी देखरेख में साबरमती नदी की तरह इलाज मिलेगा और यह पुनर्जीवित होकर एक दिन फिर से अपने उसी अंदाज में नजर आएगी, जिसको देखने भर से ही पूरा दून खिल उठता था।

सुकून केवल इस बात का है कि रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रा गायत्री के संदेश का जिक्र करते हुए रिस्पना की व्यथा को देश के सामने रखा है। प्रधानमंत्री ने देशभर में स्वच्छता को लेकर अलख जगाई है और दुनियाभर में उनकी इस अभिनव पहल को सराहना मिल रही है। अब स्वच्छता नारों तक ही सीमित नहीं रह गई, बल्कि धरातल पर भी दिखने लगी है। वक्त के साथ-साथ स्वच्छता अभियान हम सभी की आदत में शुमार हो जाएगा।

सवाल उठता है कि क्या ऋषिपर्णा से रिस्पना और फिर शहर की बस्तियों का नाला बनी हमारी, आपकी और पूरे दून की रिस्पना का भी उद्धार हो पाएगा। पहले सुसुवा और फिर गंगा में मिलने वाली इस नदी को नई जिंदगी देने के लिए सरकार कुछ काम करेगी। क्या दून को जिंदगी देने वाली रिस्पना अपने दून के लोगों के सामने ही तड़प तड़पकर मर जाएगी।

हमें बताएं नदियों की व्यथा

उत्तराखंड का हृदयस्थल दून घाटी, जिसमें हम शिवालिक पर्वत श्रृंख्ला या कभी हरिद्वार से प्रवेश करते हैं, इसकी महत्वपूर्ण शिरायें और धमनियां हैं- इस शहर और आसपास की छोटी और बड़ी नदियां- चंद्रभागा, सुसुवा, जाखन, सौंग, राही, गूलर, दुल्हनी, टौंस, तमसा, रिस्पना, बिंदाल, बाण गंगा, सूखी नदी, गौतम कुंड नदी, घंट्टे खोला, काली गाढ, आसन नदी आदि। ये नदियां संकट के दौर से गुजर रही हैं। अगर शिरायें और धमनियां संकट में हैं तो हृदयाघात की आशंका बढ़ जाती है। दूनघाटी को हृदयाघात से बचाने के लिेए जरूरी है कि इस घाटी में रहने वाले जनमानस को इन नदी नालों और जल स्रोतों को बचाने, इनको पुराने स्वरूप में लाने, इनके प्राकृतिक प्रवाह को जारी रखने के लिए अपने हृदय में जगह बनानी होगी।  दून घाटी के हर व्यक्ति का कर्तव्य होगा कि वे अपने -अपने स्तर पर साेशल मॉनिटरिंग करे। इसकी जानकारी हमारे ईमेल, व्हाट्सएप नंबर पर दे सकते हैं।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन कर रहे हैं। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते हैं। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन करते हैं।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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