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खेतीबाड़ी में पिछड़ गया देहरादून के पास का यह गांव

आजीविका के अन्य विकल्पों पर काम कर रहे हैं रानीखेत गांव के लोग

राजेश पांडेय। न्यूज लाइव

देहरादून से लगभग 30 किमी. दूर रानीखेत गांव प्राकृतिक रूप से जितना सुंदर गांव है, आजीविका के प्रमुख स्रोत खेती के मामले में उतना ही पिछड़ा हुआ भी है। पथरीली जमीन में खास कुछ नहीं उग पाता, ऊपर से गांव में बारिश भी फसल के मुताबिक नहीं हो पा रही है। मंडुआ, झंगोरा, राजमा, मिर्च और सब्जियां उगाने वाले इस गांव में तीन चौथाई भूमि पर झाड़ियां उग आई हैं, खेत उजाड़ हो गए हैं।

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पेश है रानीखेत गांव पर दूसरी कहानी…

इस गांव में पशुपालन और थोड़ी बहुत खेती से आजीविका चलाने वाले स्थानीय निवासी प्रेम सिंह और कुसुम देवी बताते हैं, “उनके पास दस बकरियां हैं। पूरा दिन इन्हीं पशुओं की सेवा में निकलता है। बकरियां पास ही जंगल में चराने ले जाते हैं। गायों के लिए चारा पत्ती जंगल से लाते हैं और पास में ही जलागम परियोजना के अंतर्गत हाथी घास (नैपियर) बोया है, जो पशुओं को पसंद है। यहां खेतीबाड़ी पर निर्भर नहीं रह सकते।”

खेती में नुकसान पर कुसुम देवी बताती हैं, “चार-पांच साल से बारिश समय पर नहीं हो रही।”

हमने उनसे पूछा, “क्या जलवायु परिवर्तन, जो प्रदूषण, पेड़ों का कटान, बेतहाशा निर्माण, धरती का जरूरत से ज्यादा दोहन करने की वजह से होता है, से आपको नुकसान तो नहीं हो रहा है, जैसा कि समय पर बारिश नहीं होने से फसल बर्बाद हो रही है,” पर उनका कहना था, “ऐसा हो रहा होगा।”

किसान कुसुम देवी बताती हैं, “हम तो खेती में अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं, इससे थोड़ा बहुत फसल मिल रही है। पर बारिश नहीं होने से बड़ा नुकसान है। जो फसल हो भी रही है, उसे जंगली जानवर खत्म कर देते हैं।”

क्या पिछड़ती खेती को बकरीपालन का विकल्प बनाया जा सकता है, पर उनका कहना था, “हम तो बकरियां पाल ही रहे हैं। गाय भैंस पालकर अपना टाइम पास कर रहे हैं। पशुपालन से हमारे खर्चे निकल रहे हैं, पर, आजकल के बच्चे पशुपालन के लिए राजी नहीं हैं।”

एक्टीविस्ट मोहित उनियाल, जो रानीखेत गांव के दौरे पर डुग डुगी टीम में शामिल थे, का कहना है, “इस गांव की खेती पर जलवायु परिवर्तन का असर पड़ा है। यहां बकरीपालन, गाय-भैंस पालन, मुर्गी पालन आजीविका के स्रोत बन सकते हैं। जहां तक रोजगार का सवाल है तो आसपास हम देख रहे हैं कि इस पूरे पर्वतीय इलाके में जगह-जगह रिजॉर्ट, होटल, यहां तक कि यूनिवर्सिटी तक बन रही है, स्थानीय युवाओं को, हर घर से एक व्यक्ति को तो रोजगार दिया जा सकता है। इस गांव में लोग अपने घर के एक कमरे को होम स्टे के रूप में इस्तेमाल करें, सरकारी सिस्टम उनको प्रोत्साहित करे, तो आय का संसाधन विकसित होगा। यहां के स्थानीय व्यंजनों को प्रमोट किया जाए।”

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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