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डोईवाला कोतवाली में लिए गए इन बच्चों के फोटो, कहां से आते हैं ये

कोतवाली परिसर में इनके साथ कुछ और लोग भी हैं, जिन्होंने इनको रेस्क्यू किया होगा, फोटो खिंचा रहे हैं

घर से दफ्तर आते समय कोतवाली डोईवाला परिसर में देखता हूं, कुछ बच्चों को एक लाइन में खड़ा करके उनके फोटो खींचे जा रहे हैं। बच्चे, यही कोई सात, आठ या दस साल तक होंगे। छोटे बच्चों को इस हालत में देखकर, सच मानो मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कि इनके बारे में वहां जाकर कुछ पूछा जाए कि ये बच्चे कहां से मिले, इनको अब कहां ले जाया जाएगा। अनुमान लगा रहा हूं कि इनको किसी एनजीओ ने डोईवाला या आसपास की स़ड़कों पर यूं ही घूमते हुए, लोगों से कुछ मांगते हुए या दुकानों पर काम करते हुए रेस्क्यू किया होगा। हां, रेस्क्यू…, किसी संगठन, चाहे वो सरकारी हो या फिर गैर सरकारी…उनकी भाषा में इसको रेस्क्यू कहा जाता है।

कोतवाली परिसर में इनके साथ कुछ और लोग भी हैं, जिन्होंने इनको रेस्क्यू किया होगा, फोटो खिंचा रहे हैं। ताकि यह सनद रहे कि इन्हीं बच्चों को रेस्क्यू किया गया था। हो सकता है, यह सरकारी नियम होगा कि रेस्क्यू किए गए बच्चों के फोटो कोतवाली परिसर में किए जाएं। मुझे नहीं मालूम यह कोई नियम है या नहीं।

पर डोईवाला कोतवाली में, आज बच्चों के फोटो लिए जा रहे थे, उसे सड़क से आते-जाते लोगों ने देखा होगा, जैसा कि उनको देखकर मैं रुक गया। मैं इन बच्चों के फोटो लिए जाने वाले वाकये के फोटो नहीं ले सका।

वैसे, मेरी जानकारी के अनुसार, कोतवाली, थाना या चौकी परिसर में खड़ा करके या बैठाकर कुछ इस तरह कि बैक ग्राउंड में फोटो उन लोगों के लिए जाने की परम्परा है (शायद नियम नहीं) , जिनको पुलिस ने किसी मामले में बतौर आरोपी पकड़ा है।

ये बच्चे हैं, निर्दोष हैं, माता-पिता, समाज की लापरवाही की वजह से सड़कों पर यूं ही घूम रहे हैं। कोई कुछ मांग रहा हैं, कोई कबाड़ चुग रहा है, कोई किसी दुकान पर काम कर रहा है।

इन बच्चों के परिवार के लोग, जिनमें महिलाएं ही थीं, शायद कोई इनकी मां होगी या कोई रिश्तेदार या फिर दादी, नानी। कोतवाली परिसर से बाहर सड़क किनारे खड़े थे। जब इन बच्चों को एक सफेद रंग की वैन में बैठाकर कोतवाली से बाहर ले जाया गया, देहरादून की ओर…तो पीछे से एक महिला ने अपने बच्चे का नाम पुकारते हुए आवाज लगाई…। वैन में सबसे पीछे बैठा बच्चा उस महिला को देख रहा था…, कुछ ही समय में वैन देहरादून की ओर तेजी से आगे बढ़ गई।

मेरे पास इस पूरी बात का एक भी फोटोग्राफ नहीं है। मैं इन हालात में बच्चों का फोटो खींचने का दुस्साहस नहीं कर सकता। उनकी स्थिति को लिख सकता हूं, वो भी उनकी पहचान जाहिर किए बिना। इतना जानता हूं कि बच्चे पुलिस के पास है, इसलिए सुरक्षित हैं। पर, उनकी इस तरह कोतवाली परिसर में फोटोग्राफी का विरोध करता हूं।

अब सवाल उठता है, ये बच्चे इन हालात में कैसे पहुंचे, जबकि सरकार उनकी शिक्षा पर ध्यान देने का दावा अक्सर करती है। सरकारी स्कूलों में फ्री एजुकेशन है, किताबें, यूनीफार्म फ्री हैं। बच्चे के अभिभावक को केवल इतना ही तो करना है कि उनको सुबह अच्छी तरह साफ सफाई के साथ तैयार करके स्कूल भेजें। उनकी पढ़ाई को लेकर शिक्षकों से मिलते रहें। छोटे बच्चों को तो मिड डे मील स्कूल में मिलता है।

कमी अभिभावकों की है और उस समाज की है, जिन्होंने इन बच्चों से हमेशा दूरी बनाई। दुकानों में छोटे बच्चों से काम कराने वाले दुकानदार को लगता है कि कम पैसे में काम हो जाएगा। पर, उसको अपने खुद के बच्चों की परवरिश की बहुत चिंता होती है, जो कि होनी भी चाहिए।

हो सकता है, वो घर में अपने बच्चों से शायद पानी भी नहीं मांगता होगा। उसे लगता है कि इससे उनकी पढ़ाई में हर्ज हो जाएगा। दूसरे का बच्चा है, जरूरतमंद है, मां बाप को जिस बच्चे की चिंता नहीं है, उसके बारे में महीने के अंत में या फिर आधा महीना गुजरने के बाद कुछ रुपये थमाना वाला, उसके बारे में क्यों सोचेगा। क्योंकि उसके लिए वो बच्चा नहीं है, नौकर है, जिसका मेहनताना वो दे रहा है।

वहीं कबाड़ चुगने वाले बच्चे, जो कबा़ड़ खरीदने वाले से कुछ पैसे पाकर बहुत खुश हो जाते हैं और समझते हैं कि यही जिंदगी है। वहीं कबाड़ खरीदने वाला बच्चों से इसलिए खुश है, क्योंकि वो कम पैसे देकर ज्यादा कमाने की इच्छा पाले है।

सुबह ही मेहनत मजदूरी के लिए घर से निकलने वाले मां-बाप इस बात पर ध्यान नहीं देते कि बच्चे दिनभर कहां भटक रहे हैं। समझ से परे है कि जागरूकता के इस युग में ये कौन से मां बाप है, जिनको बच्चों की पढ़ाई के बारे में जानकारी नहीं। सड़कों पर भटकते-भटकते अच्छे बुरे लोगों से मिलते हुए, इन बच्चों की जिंदगी में भटकाव आ रहा है, नशा सहित और भी बुरी आदतों के शिकार होने लगे हैं।

मैं यह बात इस आधार पर लिख रहा हूं, क्योंकि हमने इन बच्चों के बीच में काफी समय काम किया। इनको अक्षर ज्ञान कराने की कोशिश की, थोड़ा बहुत सफल हुए। इस बीच हमें इनकी जिंदगी से जु़ड़ी बहुत सी कहानियां मिलीं, जिसमें मां-बाप और समाज विलेन के रूप में सामने आए। कुछ बच्चे मां-बाप के बीच खराब रिश्तों के बीच पिसते मिले। बच्चा थोड़ा बड़ा हुआ नहीं कि उसको कुछ कमाने के लिए दुकान में लगा दिया।

गरीबी रेखा से नीचे जी रहे इन परिवारों के सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति में बदलाव के लिए कुछ हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इसमें एनजीओ, राजनीतिक, सामाजिक संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इन परिवारों की पहचान करना, खराब स्थिति के लिए जिम्मेदार कारकों को जानना और समाधान के लिए काउंसलिंग करना और कौशल विकास का प्रशिक्षण एवं कार्य उपलब्ध कराना।

यदि समस्या की जड़ में जाकर समाधान की ओर नहीं बढ़े तो इस तरह के रेस्क्यू चलते रहेंगे, फोटो क्लिक होते रहेंगे।

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राजेश पांडेय, देहरादून (उत्तराखंड) के डोईवाला नगर पालिका के निवासी है। पत्रकारिता में  26 वर्ष से अधिक का अनुभव हासिल है। लंबे समय तक हिन्दी समाचार पत्रों अमर उजाला, दैनिक जागरण व हिन्दुस्तान में नौकरी की, जिनमें रिपोर्टिंग और एडिटिंग की जिम्मेदारी संभाली। 2016 में हिन्दुस्तान से मुख्य उप संपादक के पद से त्यागपत्र देकर बच्चों के बीच कार्य शुरू किया।   बच्चों के लिए 60 से अधिक कहानियां एवं कविताएं लिखी हैं। दो किताबें जंगल में तक धिनाधिन और जिंदगी का तक धिनाधिन के लेखक हैं। इनके प्रकाशन के लिए सही मंच की तलाश जारी है। बच्चों को कहानियां सुनाने, उनसे बातें करने, कुछ उनको सुनने और कुछ अपनी सुनाना पसंद है। पहाड़ के गांवों की अनकही कहानियां लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।  अपने मित्र मोहित उनियाल के साथ, बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से डेढ़ घंटे के निशुल्क स्कूल का संचालन किया। इसमें स्कूल जाने और नहीं जाने वाले बच्चे पढ़ते थे, जो इन दिनों नहीं चल रहा है। उत्तराखंड के बच्चों, खासकर दूरदराज के इलाकों में रहने वाले बच्चों के लिए डुगडुगी नाम से ई पत्रिका का प्रकाशन किया।  बाकी जिंदगी की जी खोलकर जीना चाहते हैं, ताकि बाद में ऐसा न लगे कि मैं तो जीया ही नहीं। शैक्षणिक योग्यता - बी.एससी (पीसीएम), पत्रकारिता स्नातक और एलएलबी, मुख्य कार्य- कन्टेंट राइटिंग, एडिटिंग और रिपोर्टिंग

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